Monday, August 15, 2011

भ्रष्टाचार करके दौलत कमाते रहो, भ्रष्टाचार को ही गाली सुनाते रहो

क्या  अगस्त  को हमें वास्तव में स्वतन्त्रता मिली थी?

क्या आज हम वाकइ स्वतन्त्र हैं?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों की हालत इतनी बदतर हो चुकी थी कि उन्हें अपने कई उपनिवेशों, जिनमें से भारत भी एक था, को छोड़ देने की मानसिकता बनानी पड़ गई। भारत से चले जाना उनकी मजबूरी बन गई थी, वैसे भी उन्होंने अपने लम्बे शासनकाल में भारत को पूरी तरह से चूस डाला था और यहाँ बने रहने से उन्हें आगे कुछ भी नहीं मिलने वाला था, उल्टे क्रान्तिकारियों से उन्हें अधिक से अधिक नुकसान होने की ज्यादा सम्भावना थी। देखा जाए तो अंग्रेजों के भारत छोड़ने का श्रेय न तो किसी नेता को दिया जा सकता और न ही किसी राजनैतिक दल को, वे सिर्फ अपनी मजबूरी के कारण यहाँ से गए थे। जाते-जाते भी अंग्रेजों की कुटिल बुद्धि ने भारत को और भी गारत करने सोच लिया था इसीलिए एक लम्बे अरसे से षड़यन्त्र पूर्वक इस देश में में नफरत फैलाना शुरू कर दिया था। धर्मेन्द्र गौड़ की पुस्तक "मैं अंग्रेजों का जासूस था" उनके द्वारा भारत छोड़ने के नफरत फैलाने का साक्ष्य है। भारत को विभाजन की आग में झोंकने की कुटिल योजना पहले से ही उन्होंने बना रखी थी।

अस्तु, अंग्रेज चले गए किन्तु गुलामी हमारे देश से नहीं गई। अंग्रेजों के जाने के बाद भ्रष्टाचारियों की गुलामी करने लगे। पहले अंग्रेज हमें लूटते थे और उनके जाने के बाद अंग्रेजों की लीक पर चलने वाले हमारे देश के भ्रष्टाचारी हमें लूटने लगे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी विभिन्न घोटालों के रूप में हमें लूटने का सिलसिला जारी रहा। फूड घोटाला (तत्कालीन खाद्य मंत्रालय), जीप घोटाला (तत्कालीन रक्षा मंत्रालय), बीमा घोटाला (तत्कालीन वित्त मंत्रालय), नागरवाला काण्ड, तमिलनाडु और पांडिचेरी के फर्मों को नाजायज तरीके से लाइसेंस जारी करने का मामला जिसकी वजह से ललित नारायण मिश्र को बम से उड़ा दिया गया ताकि पोल न खुल पाए, बोफोर्स घोटाला........... कहाँ तक गिनाया जाए, बहुत लम्बी सूची है। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार, और सरकार चाहे किसी भी राजनैतिक दल का हो, भ्रष्टाचार सभी जगह व्याप्त है। यदि भ्रष्टाचार न करें तो पार्टी फंड में रुपये कहाँ से भेजें? आला कमान का जेब कैसे भरें? और इतना रुपया गवाँ कर चुनाव जीते हैं तो क्या सिर्फ जनता की सेवा करने के लिए? क्या हमें खुद को नहीं कमाना है? इतना कमाना है कि आने वाली सात पीढ़ियों को कमाने की जरूरत न पड़े।

कल प्रधानमन्त्री लालकिले की प्राचीर से भ्रष्टाचार के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त कर रहे थे, भ्रष्टाचार को गाली दे रहे थे जबकि उनके ही मन्त्रीगण विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे हुए हैं -

भ्रष्टाचार करके दौलत कमाते रहो, भ्रष्टाचार को ही गाली सुनाते रहो

लगता है कि सदैव गुलामी करते रहना और शोषित होते रहना ही इस देश की जनता कि नियति है क्योंकि यदि कोई भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसे कुचल दिया जाता है, उसकी आवाज को दबा दी जाती है, यहाँ तक कि उसके पिछले पूरे जीवन की छान-बीन करके, गड़े मुर्दे उखाड़कर, येन-केन-प्रकारेण उसकी कुछ न कुछ कमजोरी निकाल कर स्वयं उसे भ्रष्टाचार में लिप्त सिद्ध कर दिया जाता है। आखिर सत्ता की शक्ति जो उनके हाथ में होती है! "समरथ को नहि दोस गुसाईँ"!

Wednesday, August 10, 2011

काश! भारतीयों की विलक्षण बुद्धि के अनुरूप शिक्षा नीति एवं व्यवस्था भी होती

अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा कह रहे हैं कि 'अमेरिकियों पढ़ो, नहीं तो भारत से पिछड़ जाओगे'

उनका यह कथन निश्चित रूप से सिद्ध करता है कि भारतीय, जिन्होंने किसी काल में नालन्दा, तक्षशिला आदि जैसे विश्वविद्यालयों की थी और जो विश्व गुरु कहलाते थे, आज भी विलक्षण बुद्धि के स्वामी हैं। आज भारतीय शिक्षा नीति और व्यवस्था पूरी तरह से पाश्चात्य देशों की शिक्षा नीति और व्यवस्था पर आधारित है, आधारित क्या बल्कि उनकी नकल ही है, तो भी भारतीय प्रतिभाएँ इस प्रकार से उभर कर आ जाती हैं कि अमेरिका के राष्ट्रपति को अपने देश के पिछड़ जाने का भय सताने लगे तो जरा सोचिए कि यदि भारत में अपने देश की सभ्यता और संस्कृति पर आधारित पूर्णतः मौलिक शिक्षा नीति और व्यवस्था होती, जो आत्म निर्भरता और चरित्र निर्माण के साथ ही जीवन के परम सत्य का साक्षात्कार कराने वाली आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती, तो क्या हाल होता!

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही भारतवर्ष में ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में संसार का अग्रणी रहा है। वैदिक काल से भी पूर्व से ही हमारे देश में ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजा जाता रहा है। पुरातन काल से ही भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परम्परा समस्त विश्व में विख्यात रही है तथा भारत में अत्यन्त विकसित शिक्षा के अनेक केन्द्र रहे हैं। भारतीय गुरु जहाँ आयुर्वेद, कृषि, वास्तुशास्त्र जैसे विषयों का ज्ञान दान करके न केवल भारतीयों को आत्म निर्भर बनाते थे बल्कि वे दर्शन शास्त्र, न्याय शास्त्र, नीति शास्त्र, तर्क शास्त्र जैसे विषयों में शिष्यों को पारंगत करके चरित्रवान शासकों तथा उनके मन्त्रियों के शासन का निर्माण भी करते थे। जहाँ व्याकरण, साहित्य इत्यादि की शिक्षा प्रदान करके भाषा तथा साहित्य को विकसित करना उन गुरुओं का कार्य था वहीं गणित, खगोल शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र का ज्ञान प्रदान कर के विचारक, गणितज्ञ, खगोलज्ञ तथा वैज्ञानिकों का प्रादुर्भाव करना भी उन्हीं का उत्तरदायित्व होता था। इसके अतिरिक्त आत्मानुशासन, नैतिकता, अध्यात्म, धर्म, योग, साधना आदि की शिक्षा देकर वे अपने शिष्यों को आध्यात्मिक बल तथा मनोबल भी बढ़ाये रखते थे।

भारत में मुसलमानों के आधिपत्य हो जाने पर मुस्लिम शासकों ने अनेक मक़तबों तथा मदरसों का निर्माण तो अवश्य ही किया किन्तु उन्होंने हिन्दू शिक्षा व्यवस्था में कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया जिससे भारतीय शिक्षा का प्राचीन रूप अठारहवी शताब्दी तक कमोबेस अपने मूल रूप में ही चलती रही। सत्रहवी शताब्दी तक भारत शिक्षा के प्रचार में यूरोप के सभी देशों से आगे था और हमारे देश में पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिशत अन्य देशों की अपेक्षा बहुत अधिक था। उस समय तक सहस्त्रों की संख्या में ब्राह्मण अध्यापक अपने-अपने घरों में लाखों शिष्यों को मुफ्त शिक्षा प्रदान किया करते थे। डा-वेल नामक एक प्रसिद्ध मिशनरी, जो मद्रास में पादरी रह चुके थे, ने तो यहाँ की शिक्षा-व्यवस्था से प्रभावित होकर इंग्लिस्तान में भी भारतीय प्रणाली के अनुसार शिक्षा देना आरम्भ कर दिया था।

लॉर्ड मैकॉले को भारत की यह शिक्षा-प्रणाली चुभने लग गई। उसने सन् 1833 में चार्टर पर पार्लियामेंट में भाषण देते हुए कहा था, “मैं चाहता हूँ कि भारत में यूरोप के समस्त रीति-रिवाजों को जारी किया जाए, जिससे हम अपनी कला और आचारशास्त्र, साहित्य और कानून का अमर साम्राज्य भारत में कायम करें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हम भारतवासियों की एक ऐसी श्रेणी उत्पन्न करें जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम दें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि अंग्रेजी हो। संक्षेप में अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय तन से भारतीय, पर मन से अंग्रेज हो जाएँ, जिससे अंग्रेजों का विरोध करने की उनकी भावना ही नष्ट हो जाए।”

और उसने एक ऐसी शिक्षा-प्रणाली बनाकर, जो कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता से दूर ले जाए और उनमें राष्ट्रीय भावना पैदा ही ना होने दे, अंग्रेजी शासन को भेज दिया। अंग्रेजी शासन ने उस शिक्षा-प्रणाली को सहर्ष स्वीकार कर लिया और भारत में मैकॉले की वह शिक्षा-प्रणाली सन् 1835 से लागू हो गई। यह वह शिक्षा-प्रणाली थी जो कि भारतीयों में आत्मानुशासन, नैतिकता, अध्यात्मिकता, आत्म-सम्मान की भावना, राष्ट्रीयता इत्यादि का नाश करके स्वार्थपरता और पद-लोलुपता सिखाती थी।

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद हमारे तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं ने मैकॉले की उसी शिक्षा प्रणाली को न केवल अपनाया बल्कि उसमें ऐसे परिवर्तन भी कर दिए कि भारत की जनता उन तथाकथित राष्ट्रनिर्माताओं को और भी महान समझने लगे, उनके द्वारा किए गए देशवासियों के शोषण को जरा भी न समझ पाए, भ्रष्टाचार के द्वारा उनकी कमाई को जनता अनदेखी करती रहे। और सौ बात की एक बात कि वे अनन्तकाल तक अपने पदों पर विराजमान होकर जनता के द्वारा पूजे जाते रहें।

Monday, August 8, 2011

मेरी पसंद के कुछ दोहे

रहिमन चुप व्है बैठिये, देख दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

रहिमन निज मन की ब्यथा, मन ही राखो गोय।
सुन इठलइहैं लोग सब, बाँट न लइहैं कोय॥

रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहाँ करै तलवारि॥

.निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुहाय॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा ना कोय॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरहुं को शीतल करै, आपहु शीतल होय॥

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब।
पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब्ब॥

छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
कहि रहीम हरि का गयो, जो भृगु मारेव लात॥

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे होय॥

एकहि साधै सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहि सींचिबो, फूलहि फलहि अघाय॥

बड़े काम ओछे करे, तौ न बड़ाई होय।
ज्यों­ रहीम हनुमंत को, गिरिधर कहै ना कोय।

रहिमन वे नर मर गये, जिन कछु मांगन जाहि।
उन ते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसति नाहि॥

खीरा सिर ते काटिये, मलिये लोन लगाय।
रहिमन कड़ुये मुखन को, चहियत यही सजाय॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित-अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

मन मोती और दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फटे ते फिर ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
पारब्रम्ह को पाइये, मन ही की परतीत॥

खैर खून खाँसी खुसी बैर प्रीत मदपान।
रहिमन दाबे ना दबे जानत सकल जहान॥

आवत ही हरसे नहीं नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ ना जाइए कंचन बरसे मेह॥

Thursday, August 4, 2011

सावन का पावन प्रणय-मास!

मूसलाधार वर्षा की टिपर-टिपिर...

तेज गति से चलती हुई पुरवाई की साँय-साँय...

बादलों की गड़गड़ाहट...

दादुरों की टर्राहट...

इन समस्त ध्वनियों का आपस में गड्डमड्ड हो जाने की प्रक्रिया एक विचित्र किन्तु मनभावन हारमोनी उत्पन्न कर देती हैं जिसके संगीत में डूबकर मन विभोर हो जाता है।

रात के सन्नाटे में मूसलाधार वर्षा के मध्य दामिनी की दमक और मेघों की कड़क एक ऐसी विचित्र अनुभूति का अनुभव होने लगता है जिसे कि शब्दों में बयान करना बहुत ही मुश्किल कार्य लगने लगता है। ऐसे में यदि दूर किसी रेडियों से  "मनमोर हुआ मतवाऽऽला ये किसने जादू डाला रे..." जैसे फिल्मी गीत के बोल सुनाई दे जाय तो कहना ही क्या है!

भगवान भास्कर द्वारा श्यामल-उज्ज्वल मेघों के लिहाफ को नख से शिख तक ओढ़ लेना, भरी दुपहरी का घटाटोप अंधेरे के आभास के कारण तिमिरमय रात्रि जैसा प्रतीत होना, इस तिमिर के बीच चपला की चमक से सम्पूर्ण धरा का चौंधिया जाना और उसके बाद मेघों के गगनभेदी गर्जन से उसका काँप जाना ही तो पावस का अपूर्व सौन्दर्य है!

पावस में कभी मूसलाधार तो कभी हल्की फुहार से नदी-नाले अपनी उफान पर आ जाते हैं। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि उफनती हुई सरिताएँ सम्पूर्ण धरा को अपने भीतर समेट लेना चाह रही हैं। उनकी वेगवती प्रचण्ड धाराएँ चट्टानों से टकरा कर उन्हें चूर-चूर कर डालने के लिए आतुर हैं। वेगवती धाराओं का विशाल शिलाओं पर प्रहार से उत्पन्न धवल फेन की शुभ्रता नयनाभिराम प्रतीत होने लगती हैं।

पावस की ऋतु वह ऋतु है जो -

बाल हृदय को उल्लासित कर देता है...

युवा प्रेमी-युगलों के हृदय में मधुर मिलन के लिये तड़प उत्पन्न कर देता है...

विरहातुरों को संतप्त कर देता है...

वृद्ध हृदय को अतीत का स्मरण कराता है।

पावस में कवि-हृदय नव सृजन के लिए बरबस व्याकुल हो उठता है। जहाँ गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बरबस ही गुनगुना उठते हैं "वृष्टि पड़े टापुर-टुपुर ..." वहीं रामेश्ववर शुक्ल 'अंचल' कह "पावस गान" में कह उठते हैं 'सावन का पावन प्रणय-मास!' हम मनुष्यों की तो बिसात ही क्या, देवाधिदेव श्री राम के मुख से बरबस निकल पड़ता है -

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

पोस्ट के अन्त यह भी बता देना चाहता हूँ कि लिखने को तो इतना सब कुछ लिख गया हूँ पर इन सारी अनुभूतियों पर भारी पड़ रहा है यह विचार कि -

सामने हैं सावन के सारे त्यौहार
जिस पर है भयंकर मँहगाई की मार
कहीं से लेना पड़ेगा उधार
नहीं तो काम चलाना हो जाएगा दुश्वार
लटक रही है ऐसी तलवार
जिसने कर दिया है "सौन्दर्य अनुभूति" को तड़ीपार
अब ऐसे में भला क्या पोस्ट लिखें यार?

Saturday, July 30, 2011

कई काम हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उस काम को दूसरों ने भी किया है

आज छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी मकानों के दरवाजों पर नीम की पत्तियों वाली टहनियाँ खुँसी हुई दिखाई पड़ रही हैं। भोर होते ही घरों के दरवाजों में नीम पत्ती लगाने का सिलसिला शुरू हो गया था। रायपुर में तो ऑटोरिक्शा, बस आदि वाहनों में भी नीम की टहनियाँ खुँसी हुई दिखाई दे रही हैं। अभी कुछ देर पहले मैं जिस ऑटो रिक्शा में था उस के सामने भी नीम की टहनी लगी हुई थी। ऑटो में बैठे एक सवारी ने, जो कि शायद छत्तीसगढ़ से बाहर से आया हुआ था, ऑटो वाले से पूछ लिया कि उसने यह नीम की टहनी क्यों लगा रखी है तो ऑटो वाले ने जवाब दिया कि अन्य वाहनों में नीम की टहनी लगी है इसलिए उसने भी अपने ऑटो में नीम की टहनी लगा लिया है। याने कि उसे स्वयं नहीं पता कि उसने नीम की टहनी लगाने का काम क्यों किया है। प्रायः होता यह है कि कई काम हम सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि उस काम को दूसरों ने भी किया है।

नीम की टहनी लगाने के पीछे वास्तविक कारण यह है कि आज छत्तीसगढ़ का एक विशिष्ट त्यौहार हरेली है जिसके विषय में मान्यता यह है कि आज का दिन विभिन्न प्रकार की शक्तियों के जागृत करने का दिन है और किसी प्रकार की तन्त्र-मन्त्र जनित बुरी शक्ति से नीम की टहनी रक्षा करती है। कहा जाता है कि हरेली, दीवाली, होली तथा हर महीने की अमावस्या और पूर्णिमा तान्त्रिकों तथा जादू-टोना करने वालों के लिए विशेष दिन होते हैं और इन्ही दिनों में उनकी विद्या का सफलतम प्रयोग होता है। उल्लेखनीय है कि हरेली का त्यौहार श्रावण माह की अमावस्या को मनाया जाता है।

यद्यपि आज छत्तीसगढ़ में टोनही की अवधारणा तो समाप्तप्राय हो चुकी है किन्तु टोनही की अवधारणा से जनित भय आज भी बाकी है। यही कारण है कि आज प्रत्येक घर के दरवाजों में नीम की पत्तियों वाली छोटी-छोटी डंगाले टंगी हुई दिखाई दे रही हैं। वास्तव में हम अंध-विश्वास को तो दूर कर लेते हैं किन्तु अंध-विश्वास जनित भय को अपने भीतर से नहीं भगा पाते। अज्ञात का डर मनुष्य को आरम्भ से ही सताता रहा है और शायद अन्त तक सताता ही रहेगा।

हरेली को छत्तीसगढ़ में एक विशिष्ट त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह हिन्दू वर्ष (चैत्र-फाल्गुन) का प्रथम त्यौहार है जबकि होली अन्तिम! हरेली के दिन छत्तीसगढ़ में गाँव का बैगा गाँव की रक्षा करने के लिए ग्राम-देवता की पूजा करता है जिसके आयोजन के प्रत्येक ग्रामवासी सहयोग-राशि प्रदान करता है। दिन में त्यौहार की खुशियाँ मनाई जाती है किन्तु रात्रि को अत्यन्त भयावह माना जाता है।