Thursday, October 20, 2011

भारत में अंग्रेजी शिक्षा

जब भारत को एक ब्रिटिश उपनिवेश बना लिया गया तो सुचारु रूप से शासन तथा व्यवस्था चलाने के लिए अंग्रेजों को बड़ी संख्या में अधिकारियों तथा कर्मचारियों, विशेषकर क्लर्कों, की आवश्यकता महसूस हुई। अधिकारी नियुक्त करने के लिए तो वे ब्रिटेन से अंग्रेजों को, अच्छी कमाई का प्रलोभन देकर, भारत ले आते थे किन्तु वहाँ से क्लर्कों को भी लाना उनके लिए बहुत कठिन और खर्चीला कार्य था। अतः उन्होंने भारतीय लोगों को क्लर्क के रूप में नियुक्त करने का निश्चय किया। चूँकि उनके समस्त कार्य अंग्रेजी में ही होते थे, भारतीय क्लर्कों को अंग्रेजी को ज्ञान होना अत्यावश्यक था। इस बात को ध्यान में रखते हुए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1813 में भारतीयों को अंग्रेजी सिखाने के लिए कुछ धन का प्रावधान रखा ताकि उन्हें भारत से ही क्लर्क तथा अनुवादक प्राप्त हो सकें। 1833 के चार्टर एक्ट के पश्चात् भारत में अंग्रेजी अधिकारिक रूप से कार्यालयीन भाषा बन गई। सन् 1844 में लॉर्ड हॉर्डिंग्ज ने घोषणा की कि अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी। इस घोषणा के पीछे क्लर्क और अनुवादक प्राप्त करने के साथ ही निम्न उद्देश्य भी थे जैसे किः
  • वे समझते थे कि अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय ब्रिटिश उपनिवेश के प्रति अधिक निष्ठावान रहेंगे।
  • इस घोषणा से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करने वाली मिशनरियों को फायदा मिलेगा क्योंकि उन्हें लगता था कि अंग्रेजी पढ़ा-लिखा व्यक्ति, चाहे वह प्रभावशाली भारतीय परिवार का ही क्यों न हो, आसानी के साथ अपना धर्म त्यागकर ईसाई धर्म अपना लेगा।
यहाँ पर यह बताना अनुपयुक्त नहीं होगा कि उन दिनों भारत की अपनी एक अलग शिक्षा-व्यवस्था हुआ करती थी। अध्यापन का कार्यभार ब्राह्मणों पर होता था और वे अपने घरों में विद्यार्थियों को शिक्षा दिया करते थे। शिक्षा के लिए किसी प्रकार की फीस नहीं होती थी, जहाँ धनी वर्ग के लोग अपनी सन्तानों की शिक्षा के एवज में ब्राह्मणों को पर्याप्त से भी अधिक धन-धान्य तथा जमीन-जायजाद तक दान में दे देते थे वहीं निर्धनों की सन्तान मुफ्त में शिक्षा पाते थे। गाँवों की ग्राम पंचायतों के नियन्त्रण में भी पाठशालाओं का संचालन हुआ करता था। उच्च संस्कृत-साहित्य की शिक्षा हेतु नगरों में विद्यापीठ हुआ करते थे। उर्दू-फारसी की शिक्षा के लिए बहुत सारे मक़तब और मदरसे भी कायम थे।

अंग्रेजों ने भारत में अपना उपनिवेश स्थापित तो कर लिया था पर उसे कायम रखने में भारत की यह शिक्षा व्यवस्था बहुत बड़ी बाधा थी। कुछ उदारवादी भारतीयों ने, यह सोचकर कि अंग्रेजी शिक्षा से पाश्चात्य संस्कृति, दर्शन तथा साहित्य का ज्ञान होगा, अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ कर दिया किन्तु उनकी संख्या नगण्य थी। किन्तु अंग्रेज तो चाहते थे कि अधिक से अधिक संख्या में भारतीय अंग्रेजी के भक्त बन जाएँ इसलिए उन्होंने मक्कारी से काम लिया और सरकारी नौकरी का प्रलोभन देना शुरू किया। मध्यम वर्गीय भारतीयों के लिए, जिनकी स्थिति उन दिनों बहुत अच्छी नहीं थी, यह एक बहुत बड़ा प्रलोभन था क्योंकि सरकारी नौकरी में वेतन तो अच्छा था ही और 'ऊपर की कमाई' भी होती थी। 'ऊपर की कमाई' को भारत में एक प्रकार से अंग्रेजों की ही देन ही कहा जा सकता है क्योंकि अंग्रेजों ने ऐसे-ऐसे सरकारी नियम-कानून बना रखे थे जिससे कि भारतीयों को येन-केन-प्रकारेन लूटा जा सके। अब यदि अंग्रेज अधिकारियों को भारतीयों को लूटने का भरपूर अवसर प्राप्त था तो भला सरकारी नौकरी करने वाले स्थानीय लोगों को भला लूट का थोड़ा-बहुत हिस्सा 'ऊपर की कमाई' के रूप में कैसे न मिलता। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भारतीयों को अंग्रेजों के साथ अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय सरकारी नौकर भी लूटने लगे। भारतीय शिक्षा जहाँ लोगों मे संतोष, त्याग और परमार्थ की भावना उत्पन्न करती थी वहीं अंग्रेजी शिक्षा उनमें लोभ और स्वार्थ की भावना ही पैदा करती थी, अंग्रेजी शिक्षा-व्यवस्था का आधार लूट-खसोट जो था। अंग्रेजों की लूट का आलम यह था कि तंग आकर किसानों ने किसानी छोड़ दी, पुराने खानदान गारत कर दिए गए, ग्राम पंचायतों को नष्ट कर डाला गया और उनके द्वारा संचालित पाठशालाओं को तोड़ डाला गया, न्याय प्रक्रिया को ऐसा जटिल बना दिया गया कि केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग ही न्यायालय से कुछ उम्मीद रख पाते थे, गरीब जनता के लिए न तो कानून था और न ही इन्साफ। पुलिस के चक्कर में जो फँस जाता था उसका तो बेड़ा ही गर्क हो जाता था। भारत के अत्यन्त कुशल कारीगरों को अयोग्य और असहाय बना दिया गया ताकि हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्थान पर अंग्रेजों के यंत्र निर्मित वस्तुएँ बेची जा सकें।

अस्तु, अंग्रेजी पढ़े लोगों की कमाई और रुतबा देखकर भारतीयों का अंग्रेजी के प्रति रुझान बढ़ता ही चला गया। अंग्रेज समझ रहे थे कि अंग्रेजी शिक्षा का असर भारतीयों पर वैसा ही पड़ रहा है जैसा वे चाहते थे। यह उनकी एक बहुत बड़ी सफलता थी। अपनी इस सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने समस्त भारतीयों को तन से भारतीय किन्तु मन से अंग्रेज बनाने की वृहत् योजना बना डाली जिसके तहत सन् 1835 में "मैकॉले के मिनट" का सूत्रपात किया गया। "मैकॉले का मिनट" अंग्रेजों की एक बहुत बड़ी मक्कारी थी किन्तु भारतीय उस मक्कारी को समझ नहीं पाए क्योंकि उसे भारत में शिक्षा के विकास तथा लोककल्याण का मुखौटा पहना दिया गया था। भारतीयों को इसके विषय में लच्छेदार भाषा में बताया गया कि इसका उद्देश्य "साहित्य का पुरुद्धार करना तथा साहित्य को बढ़ावा देना, भारत के शिक्षित निवासियों को प्रोत्साहन देना तथा विज्ञान का परिचय तथा बढ़ावा देना" है। ("For the revival and promotion of literature and the encouragement of the learned natives of India, and for the introduction and promotion of a knowledge of the sciences among the inhabitants of the British territories.")

उपरोक्त मिनट के पीछे छुपी हुई मक्कारी धूर्त मैकॉले के उस स्पष्टीकरण में स्पष्ट नजर आती है जिसमें उसने कहा था, "हमें एक ऐसा वर्ग बनाने की पुरजोर कोशिश करनी ही होगी जो हमारे और उन करोड़ों के बीच में, जिन पर हमें शासन करना है, दुभाषिए का काम करें; जिनके खून तो हिन्दुस्तानी हों, पर रुचि, खयाल और बोली अंग्रेजी हो।" ("We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern, a class of persons Indian in blood and color, but English in taste, in opinions, words and intellect.")

मक्कार मैकॉले भारतीयों के मनो-मस्तिष्क में अंग्रेजी भाषा को कूट-कूट कर भर देना चाहता था ताकि भारतीयों के दिलो-दिमाग से अंग्रेज और अग्रेजी विरोधी भावना ही खत्म हो जाए, और, हमारे दुर्भाग्य से, वह अपने इस उद्देश्य में न केवल सफल हुआ बल्कि बुरी तरह से सफल हुआ। हम शिक्षा में रमकर अपनी संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, रीति-रिवाज आदि सब को भूलते चले गए।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दुर्भाग्य ने हमारा साथ नहीं छोड़ा क्योंकि सत्ता की बागडोर अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भारतीय अंग्रजों के हाथ में आ गया और उन्होंने भारत में विदेशियों के बनाए शिक्षा-नीति और व्यवस्था को जारी रहने दिया जिसका परिणाम आज यह देखने को मिलता है कि हमारे अपने बच्चे ही हमसे पूछते हैं कि 'चौंसठ याने सिक्सटी' फोर ही होता है ना? हिन्दी गिनती, हिन्दी माह, हिन्दी वर्णमाला क्या होते हैं, उन्हें मालूम ही नहीं है।

Tuesday, October 18, 2011

साँप जो घोसला बनाता है

किंग कोबरा ही एक मात्र साँप है जो कि घोसला बनाता है और उसकी रक्षा भी करता है। किन्तु नर किंग कोबरा घोसले नहीं बनाते, घोसला सिर्फ मादा किंग कोबरा बनाती है अपने अण्डों के लिए।


किंग कोबरा विषैले साँपों में सबसे लम्बे साँप होते हैं, प्रायः इनकी लम्बाई 18 फुट (5.5 मीटर) तक पाई जाती है। सामना करने की स्थिति में किंग कोबरा अपने शरीर के एक तिहाई भाग को जमीन से ऊपर उठा सकता है और वैसी ही स्थिति में आक्रमण करने के लिए आगे सरक भी सकता है। क्रोधित किंग कोबरा की फुँफकार बड़ी भयावनी होती है। किंग कोबरा का विष इतना अधिक खतरनाक होता है कि उसकी मात्र 7 मि.ली. मात्रा 20 आदमी या 1 हाथी तक की मृत्यु का कारण बन सकती है। वैसे किंग कोबरा साँप आदमियों से भरसक बचने के प्रयास में रहते हैं किन्तु विषम परिस्थितियों में फँस जाने पर प्रचण्ड रूप से आक्रामक हो जाते हैं।

किंग कोबरा साँप प्रायः भारत के अधिक वर्षा वाले जंगली तथा मैदानी क्षेत्र, दक्षिणी चीन तथा एशियाई के सुदूर दक्षिणी क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा अलग-अलग क्षेत्रों में इनका रंग भी अनेक प्रकार के होते हैं। वृक्षों पर, जमीन पर और पानी में ये सुविधापूर्वक रह सकते हैं। किंग कोबरा का मुख्य आहार अन्य जहरीले तथा गैर-जहरीले साँप ही होते हैं, वैसे ये छिपकिल्लियों, अण्डों तथा कुछ अन्य छोटे जन्तुओं को भी खा जाते हैं।

Thursday, October 13, 2011

मुश्किलें होती हैं आसान बड़ी मुश्किल से

महानायक अमिताभ बच्चन के लिए आज भला कौन सा काम ऐसा होगा जो मुश्किल होगा? हो सकता है कि उनके लिए भी कुछ काम मुश्किल वाले हों किन्तु आम लोग तो यही सोचते हैं कि शोहरत और दौलत वाले लोगों के लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। अस्तु, आज अमिताभ जी के लिए भले ही कोई काम मुश्किल न हो पर एक समय ऐसा भी था जबकि उनके सामने मुश्किलें ही मुश्किलें थीं। हम सभी जानते हैं कि मुश्किलों को आसान करना सबसे बड़ा मुश्किल काम है पर अमिताभ बच्चन ने दृढ़ संकल्प और पुरुषार्थ का साथ कभी नहीं छोड़ा और मुश्किलें आसान होती चली गईं।

मेरे हिन्दी वेबसाइट के कुछ पाठक कभी-कभी अपनी पसंद की पोस्ट लिखने की फरमाइश भी कर देते हैं। कल ही मेरे एक स्नेही पाठक ने मुझसे चैट में आकर अमिताभ बच्चन पर पोस्ट लिखने के लिए कहा तो मैनें जवाब दिया था कि उनके विषय में तो पहले ही इतना लिखा जा चुका है कि अब मैं क्या लिखूँ? फिर भी कोशिश करूँगा। और उस चैट के परिणाम के रूप में यह पोस्ट आपके सामने है।

सन् 1969 में जब अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ प्रदर्शित हुई थी तो उस समय मेरी उम्र 19 साल की थी और उस जमाने के अन्य तरुणों के समान ही मुझमें भी सिनेमा के प्रति रुझान उन्माद की सीमा तक थी। दोस्तों के साथ हर प्रदर्शित होने वाली फिल्म को देखना उन दिनों एक शान सा लगता था इसलिए यह सुन लेने के बाद भी कि ‘सात हिन्दुस्तानी’ एक फ्लॉप फिल्म है, मैने दोस्तों के साथ रायपुर के श्याम टॉकीज में वह फिल्म देखी। यद्यपि फिल्म मुझे बहुत पसंद आई थी, दोस्तों ने उस फिल्म को नापसंद ही किया क्योंकि, उन दिनों सिनेमा का जादू अपनी चरम पर होने के बावजूद भी, अधिकतर रोमांस और मारधाड़ वाली फिल्में ही पसंद की जाती थीं। ‘सात हिन्दुस्तानी’ ख्वाज़ा अहमद अब्बास की फिल्म थी जिन्होंने कमर्शियल सिनेमा कभी बनाया ही नहीं। सो पत्र-पत्रिकाओं आदि में तो फिल्म की बहुत तारीफ हुई और अमिताभ के अभिनय को भी खूब सराहा गया पर फिल्म को जैसी चलनी थी, चली नहीं या सही माने में कहा जाए तो फिल्म बुरी तरह से पिट गई। अमिताभ बच्चन की आवाज से प्रभावित होकर मृणाल सेन ने उन्हें 1969 में ही प्रदर्शित अपनी फिल्म ‘भुवन सोम’ में‘नरेटर’ (पार्श्व उद्घोषक) का कार्य दिया याने किफिल्म में उनकी आवाज अवश्य थी पर उन्हें परदे पर कहीं दिखाया नहीं गया था। मुझे आज भी याद है कि ‘सात हिन्दुस्तानी’ फिल्म तो थोड़ी बहुत चली भी थी पर ‘भुवन सोम’ बिल्कुल ही नहीं चली थी।

इस प्रकार फिल्म पाने के लिए अमिताभ बच्चन का संघर्ष जारी हो गया। फिल्मी पत्र-पत्रिकाओं में कभी-कभी अमिताभ बच्चन के बारे में भी जानकारी छपती रहती थी। अपनी भी हालत उन दिनों ऐसी थी कि पत्र-पत्रिकाएँ खरीदने के लिए तो दूर, कोर्स की पुस्तकें तक खरीदने के लिए पैसे नहीं होते थे अपने पास, इसलिए पठन के अपने शौक को पूरा करने के लिए प्रत्येक दिन का तीन से चार घण्टे "किशोर पुस्तकालय", जो कि पुस्तकालय के साथ वाचनालय भी था, में बीतते थे। सो पढ़ने को मिलता था कि अमिताभ को फिल्में नहीं मिल रहीं थी, हाँ मॉडलिंग के ऑफर जरूर मिल रहे थे पर मॉडलिंग वे करना नहीं चाहते थे। जलाल आगा की विज्ञापन कम्पनी में, जो विविध भारती के लिए विज्ञापन बनाती थी, वे अपनी आवाज अवश्य दे देते थे ताकि जीवन-यापन के लिए सौ-पचास रुपये मिलते रहें, आखिर सात हिन्दुस्तानी फिल्म के मेहनताने के रूप में मिले पाँच हजार रुपये कब तक चलते?

फिर सुनील दत्त की फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ (1971) में उन्हें काम मिला। उस फिल्म में उन्होंने एक गूँगे का का किरदार अदा किया। विचित्र सा लगता है कि फिल्म भुवन सोम में अमिताभ की आवाज थी तो वे स्वयं नहीं थे और रेशमा और शेरा में अमिताभ थे तो उनकी आवाज नहीं थी। 1971 में ही प्रदर्शित उनकी अन्य फिल्में थीं संजोग, परवाना और आनंद। संजोग चली ही नहीं, परवाना कुछ चली किन्तु उसमें अमिताभ का रोल एंटी हीरो का था, इसलिए फिल्म के चलने का श्रेय हीरो नवीन निश्चल को अधिक मिला, आनन्द खूब चली किन्तु फिल्म का हीरो उन दिनों के सुपर स्टार राजेश खन्ना के होने से अमिताभ बच्चन को फिल्म का फायदा कम ही मिला पर इतना जरूर हुआ कि अमिताभ बच्चन दर्शकों के बीच और भी अधिक स्थापित हो गए।

ऋषि दा ने अपनी फिल्म गुड्डी में भी अतिथि कलाकार बनाया पर इससे अमिताभ को कुछ विशेष फायदा नहीं मिला। फिर उन्हें रवि नगाइच के फिल्म प्यार की कहानी (1971) में मुख्य भूमिका मिली। नायिका तनूजा और सह कलाकार अनिल धवन के होने के बावजूद भी फिल्म चल नहीं पाई और अमिताभ के संघर्ष के दिन जारी ही रहे। उन दिनों अमिताभ बच्चन को जैसा भी रोल मिलता था स्वीकार कर लेते थे।

सन् 1972 में आज के महानायक की फिल्में थीं – बंशी बिरजू, बांबे टू गोवा, एक नजर, जबान, बावर्ची (पार्श्व उद्घोषक) और रास्ते का पत्थर। बी.आर. इशारा की फिल्म एक नजर में उनके साथ हीरोइन जया भादुड़ी थीं। फिल्म के संगीत को बहुत सराहना मिली पर फिल्म फ्लॉप हो गई। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि फिल्म एक नजर के गाने आज भी संगीतप्रेमियों के जुबान पर आते रहते हैं खासकर ‘प्यार को चाहिये क्या एक नजर…….’, ‘पत्ता पत्ता बूटा बूटा…….’, ‘पहले सौ बार इधर और उधर देखा है…….’ आदि। इसी फिल्म से अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी एक दूसरे को चाहने लगे। ये जया भादुड़ी ही थीं जिन्होंने संघर्ष के दिनों में अमिताभ को संभाले रखा।

सन् 1973 में अमिताभ जी की फिल्में बंधे हाथ, गहरी चाल और सौदागर विशेष नहीं चलीं। पर प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर की अपूर्व सफलता और उनके एंग्री यंगमैन के रोल ने उन्हें विकास के रास्ते पर ला खड़ा किया। फिल्म जंजीर के बाद अमिताभ बच्चन सफलता की राह पर ऐसे बढ़े कि फिर उन्होंने मुड़कर पीछे कभी नहीं देखा।

तो मित्रों जीवन के संघर्ष को अमिताभ जी के जैसे ही दृढ़ संकल्प शक्ति और पुरुषार्थ से ही जीता जा सकता है क्योंकि मुश्किलें होती हैं आसान बड़ी मुश्किल से।

Tuesday, October 11, 2011

शरद रैन उजियारी - सुधा वृष्टि सुखकारी

रात्रि में शीतलता का सुखद अनुभव तथा दिवस में भगवान भास्कर के किरणों की प्रखरता में ह्रास इस बात का द्योतक है कि पावस के पंक से मुक्ति प्राप्त हुए पर्याप्त समय व्यतीत हो चुका है। सरिता एवं सरोवरों का यौवन, उनके जल के सूखने से, क्षीण होते जा रहा है। असंख्य उड्गनों से युक्त घनविहीन निर्मल नभ सुशोभित होने लगा है। वाटिकाएँ अनेक प्रकार के पुष्पों से सुसज्जित होने लगी हैं तथा मधुकरों के गुंजन से गुंजायमान होने लगी हैं। यद्यपि शीत ऋतु की शुरुवात अभी नहीं हुई है किन्तु प्रातः काल की बेला में पुष्प-पल्लवों एवं तृणपत्रों पर तुषार के कण मोती के सदृश दृष्टिगत होने लगे हैं। तृणों की हरीतिमा पर, पारिजात के पल्लवों पर, कदली के पत्रों पर, चहुँ ओर मोती ही मोती बिखरने लगे हैं। कितने प्यारे लगते हैं पत्तों और बूटों पर बिखरे शबनम के ये कतरे! इन्हें देखकर प्रतीत होने लगता है कि धरा मुक्तामय बन चुकी है!  ओस की इन्हीं बूँदों के सौन्दर्य से प्रभावित होकर राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है -

है बिखेर देती वसुन्धरा मोती सबके सोने पर
रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर
और विरामदायिनी अपनी सन्ध्या को दे जाता है
शून्य-श्याम-तनु जिससे उसका नया रूप छलकाता है!

नवरात्रि पर्व समाप्त हो चुका है। असत्य पर सत्य के विजय के रूप में अहंकारी रावण का पुतला दहन हो चुका है। और हिन्दू पंचांग के हिसाब से आश्विन माह की पूर्णिमा अर्थात् शरद् पूर्णिमा का आगमन हुआ है। शरद् पूर्णिमा को हिन्दू मान्यताओं में विशिष्ट स्थान प्राप्त है क्योंकि इस विशिष्ट पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का संयोग, समस्त नक्षत्रों में प्रथम नक्षत्र, अश्वनी नक्षत्र से होता है। अश्वनी नक्षत्र के स्वामी आरोग्यदाता अश्वनीकुमार हैं। शरद् पूर्णिमा को भारत में एक त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। महिलाएँ इस दिन कौमुदी व्रत, जिसे कि कोजागर व्रत के नाम से भी जाना जाता है, धारण करती हैं।

शरद पूर्णिमा
(चित्र देशीकमेंट.कॉम से साभार)


शरद पूर्णिमा को गुरु-शिष्य परम्परा का भी एक विशिष्ट दिन माना जाता है तथा इस रोज शिष्य अपने गुरु से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि राधा ने कृष्ण को शरद पूर्णिमा से ही नृत्य की शिक्षा देना प्रारम्भ किया था, तभी तो "चन्द्रप्रभा" लिखते हैं -

जमुना पुलिन निकट वंशीवट
शरद रैन उजियारी हरि को नचन सिखावैं राधा प्यारी।

शरद पूर्णिमा की रात को रास की रात भी कहा जाता है क्योंकि श्री कृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात्रि को रासलीला रचाया था।

पौराणिक मान्ताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से युक्त होता है और इस रात्रि में चन्द्र की शुभ्र ज्योत्सना शीतलता के साथ सुधा की वृष्टि करती है, इसीलिए शायद चन्द्रमा का एक नाम 'सुधाकर' भी है। चन्द्रमा के अन्य नाम हैं - चन्द्र, शशि, शशी, शशांक, सुधांशु, शुभ्रांशु, हिमांशु, निशापति, कलानिधि, इन्दु और सोम। हिन्दू मन्दिरों में शरद पूर्णिमा की अर्धरात्रि को देवी-देवताओं के पूजन के पश्चात् पायस (खीर) का प्रसाद वितरण किया जाता है। शरद पूर्णिमा की सन्ध्या में लोग अपने अपने घरों में खीर बनाकर उसे ऐसे स्थान में रखते हैं जहाँ पर उस पर चन्द्रमा की किरणें पड़ती रहें ताकि वह खीर अमृतमय हो जाए। अर्धरात्रि में उस अमृतमय खीर का सेवन किया जाता है।

आप सभी को शरद् पूर्णिमा की शुभकामनाएँ देते हुए मैं कामना करता हूँ कि इस शरद ऋतु के साथ ही साथ यह पूरा वर्ष आपके लिए मंगलमय हो!

Friday, October 7, 2011

भारतीय फिल्मों में गीतों का चलन

बिरला ही कोई व्यक्ति होगा जो फिल्मी गीतों का दीवाना न हो। भारतीय फिल्मों के गीत न केवल भारत में अपितु संसार भर के देशों में भी लोकप्रिय होते रहे हैं। एक जमाना था जब रूस में तो राज कपूर की फिल्मों के गीतों की तूती बोलती थी, रशियन लोग हिन्दी गाने गुनगुना कर खुश होते थे। फिल्मी गीतों पर आधारित रेडियो प्रोग्राम बिनाका गीतमाला ने कई दशकों तक रेडियो श्रोताओं को सम्मोहित कर के रखा था। रेडियो सीलोन, विविध भारती, आल इण्डिया रेडियो आदि का अस्तित्व ही फिल्मी गीतों से था।

भारत में सिनेमा के आने के पहले नाटक और नौटंकियों का चलन था। उस जमाने में बहुत सी नौटंकी कम्पनियाँ हुआ करती थीं जो कि पूरे भारत में अपना ताम-झाम लेकर घूम-घूम कर नाटक-नौटंकी दिखाया करती थीं, भारत में जगह-जगह लगने वाले मेलों में तो इन नौटंकी कम्पनियों की धूम हुआ करती थी। फिल्म "तीसरी कसम" की नायिका तो ऐसी ही एक नौटंकी कम्पनी की हीरोइन ही थी तथा फिल्म "गीत गाता चल" में भी नौटंकी कम्पनियों का बहुत अच्छा सन्दर्भ है। इन नाटकों तथा नौटंकियों में संवाद के साथ गीत गाने का भी चलन था, वास्तव में लोग नाच-गाना देखने के लिए ही नौटंकियों में जाया करते थे। बाद में सिनेमा का चलन हो जाने पर शनैः-शनैः नौटंकी कम्पनियाँ समाप्त हो गईं तथा सिनेमा को ही नाटक-नौटंकियों का एक नया रूप माना जाने लगा। यही कारण है कि फिल्मों में गानों का रिवाज चल निकला।

सिनेमा के प्रारम्भिक दिनों में फिल्म में काम सिर्फ उन्हीं कलाकारों को काम मिलता था जिन्हें गायन तथा संगीत का बी ज्ञान हो क्योंकि उन्हें अपना गाना खुद ही गाना पड़ता था। फिर सन् 1935 में न्यू थियेटर ने अपनी फिल्म "धूप छाँव" में प्लेबैक गायन का सिस्टम शुरू किया और इस नये सिस्टम ने भारतीय फिल्म संगीत के स्वरूप को ही पूरी तरह से बदल डाला। प्रभात पिक्चर्स ने केशवराव भोले को, जिन्हें कि पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा का पर्याप्त अनुभव था, गानों में पियानो, हवायन गिटार और वायलिन जैसे पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के प्रयोग के लिए नियुक्त किया जिसके परिणामस्वरूप शान्ता आप्टे, जिसके ऊपर फिल्म "दुनिया ना माने" (1937) में एक पूर्ण अंग्रेजी गाना फिल्माया गया, प्रभात पिक्चर्स की अग्रणी कलाकार बन गईं। सन् 1939 में व्ही. शान्तारम ने फिल्म "आदमी" में एक बहुभाषी गाना रखा। प्लेबैक सिस्टम का प्रयोग शुरू हो जाने पर ऐसे गायकों को भी फिल्मों में गाने का मौका मिलने लगा जिन्हें अभिनय में रुचि नहीं थी। पारुल घोष, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अम्बालावाली, राजकुमारी, अरुण कुमार आदि शरू-शुरू के प्लेबैक सिंगर थे।

के.एल. सहगल, पंकज मलिक, के.सी. डे आदि के समय में गाने सिर्फ शास्त्रीय संगीत के आधार पर बनाये जाते थे और उनमें बहुत कम वाद्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता था किन्तु प्लेबैक सिस्टम आने के बाद गानों में लोक-संगीत तथा पाश्चात्य संगीत का भी पुट आने लगा। भारत के अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रकार के लोक-संगीत होने का बहुत बड़ा फायदा फिल्म संगीत को मिलने लगा। फिल्मी गीतों की धुनों में बंगाली, पंजाबी आदि लोक-संगीतों का प्रयोग करके गानों को मधुरतर से मधुरतम रूप दिया जाने लगा और लोग उन धुनों पर थिरकने लगे। लोगों में उन दिनों फिल्मी गानों के प्रति उन्माद का कैसा आलम था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सन् 1925 में बनी फिल्म इन्द्रसभा में 71 गाने थे।

कालान्तर में नौशाद, सी. रामचंद्र, चित्रगुप्त, हेमंत कुमार, रोशन, एस.डी. बर्मन, खय्याम, जयदेव, सलिल चौधरी, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैयर, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर.डी. बर्मन जैसे तीव्र कल्पनाशील संगीतकारों और मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, महेन्द्र कपूर, लता मंगेशकर, सुमन कल्याणपुर, आशा भोंसले जैसे प्रतिभावान गायक गायिकाओं के संगम से फिल्म संगीत दिन-प्रतिदिन निखरता ही चला गया।

सन् 1950 से 1975-80 तक भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णकाल रहा। फिर उसके बाद मैलोडियस संगीत ह्रास के दिन आने लगे, फिल्मी गानों में मैलोडी के स्थान पर हारमोनी बढ़ने लग गई और फिल्म संगीत का एक नया रूप आया जिसका चलन अभी भी है।