Saturday, October 2, 2010

जय जवान! जय किसान!



शत् शत् नमन!

Friday, October 1, 2010

अपनी पसंद की फिल्में मुफ्त आनलाइन देखें

कुछ दिनों पहले सतीश पंचम जी ने फिल्म "पिया का घर" पर एक पोस्ट प्रकाशित किया था। इस बात में तो दो मत हो ही नहीं सकता कि "पिया का घर" एक स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म है। सतीश जी के पोस्ट की टिप्पणियों से पता चलता है कि बहुत सारे लोगों ने इस लाजवाब फिल्म को नहीं देखा है। इसलिए हमें इस पूरी फिल्म के नेट में उपलब्ध व्हीडियो को अपने "हिन्दी वेबसाइट" में उपलब्ध करवाना उचित लगा। आप इसे यहाँ देख सकते हैं

फिल्म "पिया का घर" पूरी फिल्म देखें

आज नेट में खोजने पर प्रायः अपनी पसंद की पूरी फिल्में मिल जाती हैं अतः हमें नेट में जहाँ कहीं भी अच्छी फिल्में उपलब्ध मिलेंगी, उन फिल्मों को हम अपने "हिन्दी वेबसाइट" में उपलब्ध करवाते रहेंगे। फिलहाल तो फिल्म "पिया के घर" के साथ ही हमारा एक और पसंदीदा फिल्म "बावर्ची" वहाँ पर उपलब्ध है जिसे देखने के लिए आप निम्न लिंक को क्लिक कर सकते हैं

फिल्म "बावर्ची" पूरी फिल्म देखें

Thursday, September 30, 2010

इलाहाबाद हाई कोर्ट का साइट नहीं खुल रहा

लखनऊ जिला मजिस्ट्रेट श्री अनिल कुमार सागर के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार फैसलों को अदालत की वेबसाइट पर भी लगाया जाएगा। इन फैसलों का सभी को बेसब्री से इंतजार है।  बजने बाद से ही अदालत की वेबसाइट को लोग खोलने का प्रयास कर रहे हैं किन्तु वेबसाइट खुल ही नहीं रहा है, वेबप्रॉक्सी साइट के माध्यम से भी नहीं। ट्विटर पर तो अदालत की वेबसाइट के क्रैश हो जाने की शंका वाले ट्वीट् तक आ रहे हैं।

लोगों की उत्सुक्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पूरा का पूरा गूगल सर्च अयोध्याविवादमय हो रहा है। इस पोस्ट के लिखते समय तक गूगल इंडिया ट्रेंड्स में हाट टॉपिक्स में पहले और दूसरे नंबर पर क्रमशः india ayodhya और high court allahabad हैं जबकि गूगल यूएसए ट्रेंड्स में इनका नंबर क्रमशः दूसरा और तीसरा है।





इलाहाबाद हाईकोर्ट के वेबसाइट के बनने के बाद यह पहला मौका है जबकि देश विदेश के करोड़ों लोग एक साथ उस पर हिट कर रहे हैं। अब देखना यह है कि अदालत की वेबसाइट कितने समय बाद खुलता है।

आज जरूरत है भारत में सदियों से चली आ रही धार्मिक उदारता को बनाए रखने की

भारत में सदियों से धार्मिक उदारता की परम्परा रही है। भारतवासी सदा ही एक दूसरे की आस्थाओं तथा धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते रहे हैं। भारत के हिन्दुओं और मुस्लिमों में परस्पर इतनी धार्मिक उदारता रही है कि वे आपस में दूध और पानी की तरह से मिल गए थे। मुहम्मद पैगम्बर साहब ने सातवीं शताब्दी के आरम्भ में इस्लाम की शिक्षा देना आरम्भ किया था किन्तु उसके पहले ही दक्षिण भारत में अरबों की अनेक बस्तियाँ बस चुकी थीं। ये समस्त अरब व्यापारी थे और भारतीयों से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। पैगम्बर साहब की शिक्षा का प्रभाव भारत में बसे इन अरबों पर भी पड़ा था और वे मुसलमान बन गए थे। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत में मुस्लिमों के आक्रमण होने के बहुत पहले ही से इस्लाम भारत में आ चुका था। उन दिनों भी इस्लाम, जो कि भारत के लिए एक नया धर्म था, के विपरीत किसी प्रकार की घृणा की भावना नहीं थी। तत्कालीन भारत के वैष्णव, शाक्त, तान्त्रिक, वाममार्गी, कापालिक, शैव और पाशुपत आदि अनेक धर्मों के जैसे ही इस्लाम को भी भारत का एक धर्म मान लिया गया था। यहाँ तक कि नवीं शताब्दी के आरम्भ ही में मलाबार के राजा ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और भारत में इस्लाम की प्रतिष्ठा बढ़ी।

उन दिनों भारत में जो भी मुसलमान फकीर और विद्वान अरब तथा ईरान से आकर भारत में बसते जाते थे, उनका आदर-सत्कार किया जाता था, सैकड़ों हिन्दू उनके चेले भी बन जाया करते थे। बहुत सारे फकीर इतने प्रसिद्ध हो गए थे कि हिन्दू और मुसलमान सभी उनके भक्त बन गए थे। धीरे-धीरे करके इस्लाम कोंकण, काठियावाड़ और मध्य भारत में भी जा पहुँचा। उस समय के ये इस्लाम के प्रचारक अपनी सच्चरित्रता और त्याग के कारण लोगों में अपना प्रभाव जमा चुके थे।

तेरहवीं शताब्दी के अन्त से सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक, जब तक कि मुसलमान भारत में अपने साम्राज्य-स्थापना के प्रयत्न करते रहे, कभी भी हिन्दू-मुस्लिम के बीच वैमनस्य कभी देखने में नहीं आया। इस काल में अरब के इस नये मत का प्रभाव न केवल उन लाखों भारतीयों पर ही नहीं पड़ा, जिन्होंने इस्लाम ग्रहण कर लिया था, अपितु भारतीयों के आम विचार, धर्म, साहित्य, कला और विज्ञान पर भी पड़ा था; कहना चाहिए कि समूची भारतीय सभ्यता ही भारत में मुग़ल-साम्राज्य की स्थापना से पहले ही इस्लाम के प्रभावित हो चुकी थी।

अकबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना धार्मिक उदारता की आधार शिला पर ही की थी। अकबर, जहांगीर और शाहजहां के काल में मुग़ल सम्राटों के दरबार में हिन्दू और मुसलमान दोनों के मुख्य त्यौहार समान उत्साह और वैभव से मनाए जाते थे। शाही दरबार के अलावा सामान्य जन भी एक दूसरे के त्यौहारों में प्रसन्नता के साथ शरीक हुआ करते थे। यहाँ तक कि मुस्लिम लोग तो अपने त्यौहारों में आने वाले हिन्दू अतिथियों की भावना का सम्मान करते हुए उनके भोजन के लिए अलग से भोजन पकाने वाले ब्राह्मणों की व्यवस्था किया करते थे तथा होली, दिवाली जैसे हिन्दुओं के त्यौहारों को स्वयं भी बड़े धूम-धाम के साथ मनाया करते थे। सभी भारतीय, चाहे वह हिन्दू हो चाहे मुसलमान, हर बात को एक ही दृष्टिकोण से देखते और घटनाओं को एक ही ढंग से अपनाते थे जिसके परिणामस्वरूप कभी भी किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक झगड़े कभी होते ही नहीं थे।

भारत में अंग्रेजों ने अपने कदम जमाने के उद्देश्य से ही उन दिनों के राजा-महाराजाओं तथा नवाबों के बीच फूट डालने के साथ ही साथ हिन्दू और मुसलमानों के बीच वैमनस्यता के बीच बोना आरम्भ किया। उनका बोया हुआ वह बीज जड़ पकड़ता गया और भारत के हिन्दू-मुसलमानों के बीच खाई बनने लगी। आज जरूरत है अंग्रेजों के लगाए इस वैमनस्यता के पेड़ को जड़ से उखाड़ फेंकने की और भारत में सदियों से चली आ रही धार्मिक उदारता को बनाए रखने की!

Wednesday, September 29, 2010

सातवीं से अठारहवीं शताब्दी तक का भारत (2)

औरंगजेब के समय तक भारत के अन्दर अंग्रेज व्यापारियों की स्थिति लगभग वैसी ही थी, जैसी हींग बेचने वाले काबुलियों की आपने देखी होगी। औरंगजेब की अनुदार नीति ने चारों ओर छोटी-छोटी परस्पर प्रतिस्पर्धा करने वाली रियासतें भारत में पैदा कर दी, जिससे केन्द्रीय शक्ति निर्बल हो गई और हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य खण्डित हो गया। औरंगजेब की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही मद्रास और बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के षड्यन्त्र चलने लगे, जिनके फलस्वरूप औरंगजेब की मृत्यु के पचास वर्ष बाद प्लासी का युद्ध हुआ। उस समय अंग्रेजों का हित इस बात में था कि औरंगजेब की अनुदार नीति के कारण जो अव्यवस्था और अनैक्य भारत के हिन्दू-मुसलमानों में स्थापित हो चुका था, वह कायम ही रखा जाए और उन्होंने यही अपनी नीति बना ली।

इस समय भी सभ्यता, शक्ति और व्यवस्था में भारतीय अंग्रेजों से श्रेष्ठ थे। परन्तु उनमें एक बात की कमी थी। वह थी राष्ट्रीयता या देश-भक्ति, जो जनोत्थान और उद्योग-क्रान्ति से प्रभावित थी। अंग्रेजों और दूसरी यूरोपियन जातियों ने यह बात जान ली और उन्होंने इससे लाभ उठाकर एक शक्ति को दूसरी शक्ति से लड़ाने का धन्धा आरम्भ कर दिया। दिखाने के लिए उन्होंने अपना रूप निष्पक्ष का रखा, परन्तु भीतर ही भीतर भाँति-भाँति की साजिशों और चालों को चलकर उन्होंने बिखरी हुई भारतीय शक्तियों में ऐसा संग्राम खड़ा कर दिया कि वे शक्तियाँ स्वयं ही एक-दूसरे से टकराकर चकनाचूर होने लगीं।

इंगलैंड के पीछे किसी जातीय सभ्यता का इतिहास न था। किसी प्राचीन संस्कृति की छाप न थी। यद्यपि वह ईसाई धर्म स्वीकार कर चुका था, पर इस समय वह धर्मतंत्र भी साम्प्रदायिक कलह का रूप धारण कर रहा था। पाप-पुण्य, धर्माधर्म, नीति-अनीति के सांस्कृतिक आदर्श जैसे भारत में प्राचीन वैदिक, बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म के वेद, श्रुति, स्मृति, दर्शन और आचारशास्त्र के आधार पर भारतीय जनता में सहस्रों वर्षों से उनकी पैतृक सांस्कृतिक सम्पत्ति के रूप में चले आते थे, वैसा इंगलैंड में एक भी सांस्कृतिक सूत्र न था। इंगलैंड अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक घोर दरिद्रता, निरक्षरता और अन्धविश्वासों का दास बना हुआ था। नैतिक आदर्शों  पर सुसभ्य जीवन का इंगलैंड में जन्म ही हुआ था।

भारत जैसे समृद्ध देश के धन, सम्पदा, वैभव और जाहो-जलाली का हाल जब अंग्रेजों के कानों में पहुँचा तो उनकी लोलुप दृष्टि भारत की ओर गई और उनकी आवारा और साहसिक प्रकृति सत्रहवीं शताबदी के आरम्भ में उन्हें भारत तक खींच लाई। सौ वर्ष तक वे भारत की गलियों में कंधे पर बोझें का थैला लादे माल बेचते, व्यापार करते और धन कमाते फिरते रहे। बंदर की भाँति लाल-लाल चेहरेवाले फिरंगी के मुँह से उनकी अटपटी भाषा सुनने को बालक और स्त्रियाँ आतुर रहते, उनके आने पर उनके काँच के सस्ते सामान को हँसी उड़ाते और उन्हें तंग करते थे।

अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ ही में औरंगजेब की मृत्यु हुई और एकबारगी ही महान मुग़ल-तख्त डगमगा गया। इन सौ वर्षों में इन फिरंगियों की लालस बेहद बढ़ चुकी थी। किसी प्रकार के न्याय-अन्याय और धर्माधर्म का उन्हें विचार-संस्कार था ही नहीं। अब उनकी इच्छापूर्ति में बाधक कोई शक्ति भारत में नहीं थी। उन्होंने तिजारती कोठियों के बदले जगह-जगह किलेबंदियाँ करनी आरम्भ कर दीं। दुर्भाग्य से अपने ही में सीमित भारतीय राजाओं ने इस बात की कुछ परवाह नहीं की। उन्हें अनुमतियाँ और सुविधाएँ मिलती ही गईं। उनका बल बढ़ता गया। वे उचित-अनुचित उपायों से धन कमाते गए और सेना रखते गए। इस सेना के बल पर उन्होंने मद्रास और बंगाल के राजाओं के आपसी झगड़ों में पैर फँसाकर कभी इसका और कभी उसका पक्ष लेना आरम्भ कर दिया। कूटनीति और साजिशों द्वारा इनका बल बढ़ता गया। दिल्ली का दुर्बल साम्राज्य-केन्द्र अब इस योग्य न था कि वह केन्द्रीय शक्ति के रूप में इस स्थिति को समझे और उसपर नियन्त्रण करे। अतः उन्होंने भारतीय नरेशों को एक-दूसरे से लड़ाकर इलाके दखल करने आरम्भ कर दिए।

एक ही शब्द में यह कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने आँखें बंद करके भारत को हाथ में लिया।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास "सोना और खून" से लिया गया अंश)