Tuesday, August 1, 2017

अंग्रेजी के कैपिटल्स का प्रयोग


यह तो आप सभी जानते हैं कि अंग्रेजी में अक्षरों को दो प्रकार से लिखा जाता है; कैपिटल और स्माल। पर क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजी के कैपिटल लेटर का प्रयोग कहाँ-कहाँ पर होता है?

तो आइये जानें कि अंग्रेजी के कैपिटल लेटर का प्रयोग कहाँ-कहाँ पर होता है।

अंग्रेजी के कैपिटल लेटर का प्रयोग

  • प्रत्येक वाक्य का पहला अक्षर (The first letter of every sentence.)

  • पुस्तकों तथा व्यक्तियो के टाइटिल के पहले अक्षर (The title of a book or person; as, My First Book, Ramayan, Mahabharat, His Excellency, Maharaja, Rai Bhahadur etc.)

व्यक्तिवाचक संज्ञा का पहला अक्षर (Proper nouns; as, William Shakespeare, Kalidas, Washington, London, Avanti, Varanasi etc.)

  • व्यक्तिवाचक संज्ञा से बनाये गए प्रायः विशेषणों का पहला अक्षर (Most adjectives derived from Proper nouns; as Indian, English, Pakistani etc.)


  • (The first word of a quotation; as, you told, In my opinion Ramayan, written by Maharshi Valmiki is the greatest epic.)


  • (The personal pronoun I is always written in Capitals.)


  • (The names of the Deity and the Persons that refer to Him; as, God, the Almighty, Lord Rama, Goddes Durga, it was His will etc.)


  • (Every line of poetry.)


  • (Single letters forming abbreviations; as, M.A., B.Sc., Ph.D.)


Tuesday, July 25, 2017

गिरिधर की कुण्डलियाँ


सुप्रसिद्ध कवि गिरिधर ने अनेक कुण्डलियाँ लिखी हैं।

प्रस्तुत है गिरिधर कवि रचित गिरिधर की कुण्डलियाँ।

बिना विचारे जो करै

बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हंसाय॥
जग में होत हंसाय, चित्त चित्त में चैन न पावै।
खान पान सन्मान, राग रंग मनहिं न भावै॥
कह 'गिरिधर कविराय, दु:ख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय मांहि, कियो जो बिना बिचारे॥

गुनके गाहक सहस नर

गुनके गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबे सुहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब भये अपावन॥
कह गिरिधर कविराय, सुनौ हो ठाकुर मन के।
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुनके॥

साँईं सब संसार में

साँईं सब संसार में, मतलब को व्यवहार।
जब लग पैसा गांठ में, तब लग ताको यार॥
तब लग ताको यार, यार संगही संग डोलैं।
पैसा रहा न पास, यार मुख से नहिं बोलैं॥
कह 'गिरिधर कविराय जगत यहि लेखा भाई।
करत बेगरजी प्रीति यार बिरला कोई साँईं॥

बीती ताहि बिसारि दे

बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥
ताही में चित देइ, बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हंसे न कोइ, चित्त मैं खता न पावै॥
कह 'गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।
आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती॥

साँईं अवसर के परे

साँईं अवसर के परे, को न सहै दु:ख द्वंद।
जाय बिकाने डोम घर, वै राजा हरिचंद॥
वै राजा हरिचंद, करैं मरघट रखवारी।
धरे तपस्वी वेष, फिरै अर्जुन बलधारी॥
कह 'गिरिधर कविराय, तपै वह भीम रसोई।
को न करै घटि काम, परे अवसर के साई॥

साँईं अपने चित्त की

साँईं अपने चित्त की भूलि न कहिये कोइ।
तब लगि मन में राखिये जब लगि कारज होइ॥
जब लगि कारज होइ भूलि कबहु नहिं कहिये।
दुरजन हँसै न कोय आप सियरे ह्वै रहिये।
कह 'गिरिधर' कविराय बात चतुरन के र्ताईं।
करतूती कहि देत, आप कहिये नहिं साँईं॥

साईं ये न विरुद्धिए

साईं ये न विरुद्धिए गुरु पंडित कवि यार।
बेटा बनिता पौरिया यज्ञ करावनहार॥
यज्ञ करावनहार राजमंत्री जो होई।
विप्र पड़ोसी वैद आपकी जो तपै रसोई॥
कह 'गिरिधर' कविराय जुगन ते यह चलि आई।
इन तेरह सों तरह दिये बनि आवे साईं॥

झूठा मीठे वचन कहि

झूठा मीठे वचन कहि, ॠण उधार ले जाय।
लेत परम सुख उपजै, लैके दियो न जाय॥
लैके दियो न जाय, ऊँच अरु नीच बतावै।
ॠण उधार की रीति, मांगते मारन धावै॥
कह गिरिधर कविराय, जानी रह मन में रूठा।
बहुत दिना हो जाय, कहै तेरो कागज झूठा॥

कमरी थोरे दाम की

कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।
खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।
बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥
कह 'गिरिधर कविराय', मिलत है थोरे दमरी।
सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥

राजा के दरबार में

राजा के दरबार में, जैसे समया पाय।
साँई तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय॥
जहँ कोउ देय उठाय, बोल अनबोले रहिये।
हँसिये नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिये॥
कह 'गिरिधर कविराय', समय सों कीजै काजा।
अति आतुर नहिं होय, बहुरि अनखैहैं राजा॥

सोना लादन पिय गए

सोना लादन पिय गए, सूना करि गए देस।
सोना मिले न पिय मिले, रूपा ह्वै गए केस॥
रूपा ह्वै गए केस, रोर रंग रूप गंवावा।
सेजन को बिसराम, पिया बिन कबहुं न पावा॥
कह 'गिरिधर कविराय लोन बिन सबै अलोना।
बहुरि पिया घर आव, कहा करिहौ लै सोना॥

पानी बाढो नाव में

पानी बाढो नाव में, घर में बाढो दाम।
दोनों हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
परमारथ के काज, सीस आगै धरि दीजै॥
कह 'गिरिधर कविराय, बडेन की याही बानी।
चलिये चाल सुचाल, राखिये अपनो पानी॥

जाको धन धरती हरी

जाको धन धरती हरी ताहि न लीजै संग।
ओ संग राखै ही बनै तो करि राखु अपंग॥
तो करि राखु अपंग भीलि परतीति न कीजै।
सौ सौगन्धें खाय चित्त में एक न दीजै॥
कह गिरिधर कविराय कबहुँ विश्वास न वाको।
रिपु समान परिहरिय हरी धन धरती जाको॥

Saturday, July 15, 2017

आयो सखि सावन.....

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥

- सेनापति

Thursday, July 13, 2017

प्रसिद्ध रोमांचक रचनाएँ

एक रोमांचक रचना (Adventure Book) मानव मन को हिलोर कर रख देती है। यही कारण है कि प्रायः लोग रोमांचक रचनाओं (Adventure Books) के दीवाने रहते हैं। प्रस्तुत है विश्व प्रसिद्ध रोमांचक रचनाओं (Famous Adventure Books) से संबंधित जानकारी।

लुई स्टीवेंसन (Louis Stevenson) रचित ट्रेजर आइलैंड (Treasure Island)

रोमांचक उपन्यासों में यह सबसे अधिक जाना जाने वाला उपन्यास है। यह लुई स्टीवेंसन की सर्वश्रेष्ठ कृति है। समुद्री डाकुओं और गड़े सोने की खोज पर लिखी गई यह कथा प्रति पल पाठक के मन में रोमांच पैदा करता है।
   

जोहान डेविड विस (Johann David Wyss) रचित स्विस फैमिली राबिंसन (Swiss Family Robinson)

यह विनाशकारी जहाज़ की तबाही के परिणामस्वरूप एक रेगिस्तानी द्वीप में फँसे परिवार की कहानी है जिसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए केवल प्राकृतिक रूप से उपलब्ध संसाधनों पर गुजारा करना पड़ता है। अत्यंत रोचक पुस्तक है।
   

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling) रचित कैप्टन करेजियस (Captains Courageous) 

यह एक धनाड्य उद्योगपति के बेटे हार्वे चीने के कारनामों की कहानी है जिसे यात्रा के दौरान पानी में फेंक दिया गया था और मछुआरों द्वारा बचा लिया गया था। अंततः उस बच्चे का संघर्ष उस एक सच्चा नाविक बना देता है।
   

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित शी (She)

कॉलेज के एक प्रोफेसर और उनके युवा शिष्य एक प्राचीन पेटी में मिले दस्तावेज के निर्देशों का पालन करते हुए अफ्रीका के जंगलों में पहुँच जाते हैं, जहाँ उनकी भेंट उस क्षेत्र में शासन करने वाली एक अमर महिला शासिका से होती है। हर पल रोमांच पैदा करने वाली कहानी है।
   

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित अयेशाः द रिटर्न आफ शी (Ayesha: The Return of She)

यह उपरोक्त कहानी का ही दूसरा भाग हैं जिसकी पृष्ठभूमि हिमालय का एक गुप्त दुर्गम स्थल है। यह कहानी भी अत्यंत रोचक है।
   

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

एच. राइडर हैगर्ड (H. Rider Haggard) रचित किंग सालोमंस माइंस (King Solomon’s Mines)

एलन क्वाटारेमेन को एक खोज और बचाव दल के साथ अफ़्रीका के अज्ञात क्षेत्र में जाता है और प्राचीन सभ्यता की खोज करता है। अफवाहों में प्रचलित राजा सुलैमान की खानों के स्थान की खोज के विषय में यह एक अत्यंत रोमांचक कथा है।
   

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

आर्थर कॉनन डायल (Arthur Conan Doyle) रचित द लोस्ट वर्ल्ड (The Lost World)

आर्थर कॉनन डायल की यह कालातीत रचना है। इस क्लासिक ने अनगिनत युवावों की कल्पना को प्रेरित किया है। कथा का नायक, प्रोफेसर चैलेंजर, दक्षिण अमेरिका में एक अनदेखे पठार के दौरे पर जाता है जो डायनासोर और अन्य रहस्यमय प्राणियों से भरी हुई है।
   

टीपः उपरोक्त लिंक अंग्रेजी पुस्तक की है।

माइकल क्रिचटन (Michael Crichton) रचित जुरासिक पार्क (Jurassic Park)

जॉन हैमोंड का "जैविक संरक्षण" जुरासिक पार्क के रूप में जाना जाता है, जहां डायनासोर, एक बार फिर धरती पर घूमते हैं। अत्यंत रोमांचक कहानी जिस पर फिल्म भी बन चुकी है।
 

Monday, July 10, 2017

भारत में कृषि से संबंधित सामान्य ज्ञान


रबी की फसलों की बुआई अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर में की जाती है।

गेहूँ, जौ, चना मटर, सरसों व आलू आदि रबी की फसलों के अंतर्गत आती हैं।

खरीफ की फसलों की बुआई जून-जुलाई में की जाती है।

धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल, मूँगफली, अरहर आदि खरीफ की फसलों के अंतर्गत आती हैं।

जायद की फसलों को मार्च से जुलाई के मध्य बोया जाता है।

तरबूज, खरबूज, ककड़ी तथा पशुचारा जायद की फसलों के अंतर्गत आती हैं।

कपास, गन्ना, तिलहन, चाय, जूट तथा तंबाकू व्यापारिक या नकदी फसलें हैं।

भारत में सर्वाधिक मात्रा में चावल का उत्पादन होता है।

भारत में नाइट्रोजन उर्वरकों का सबसे अधिक उपयोग होता है।

विश्व में भारत मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देश है।

रबड़ के उत्पादन में भारत का विश्व में चौथा स्थान है।

रबड़ की प्रति हेक्टेयर उत्पादक में भारत का विश्व में पहला स्थान है।

हरित क्रांति से गेहूँ के उत्पादन में सबसे अधिक वृद्धि हुई।

अंगूर की प्रति हेक्टेयर उपज में भारत का विश्व में पहला स्थान है।

ट्रैक्टर्स के उपयोग की दृष्टि से भारत का विश्व में चौथा स्थान है।

भारत काली चाय का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है।

भारत का विश्व दुग्ध उत्पादन में पहला स्थान है।

अंडों के उत्पादन में भारत का विश्व में तीसरा स्थान है।

भारत विश्व का सबसे बड़ा चमड़ा उत्पादक देश है।

‘ऑपरेशन फ्लड’ कार्यक्रम सन् 1970 में शुरू किया गया था।

‘ऑपरेशन फ्लड’ कार्यक्रम का संबंध दूध के उत्पादन में बढ़ोतरी से है।

‘ऑपरेशन फ्लड’ कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ. वर्गीज कूरियन थे।

विश्व में समुद्री मत्स्य उत्पादन में भारत का छठा स्थान है।

विश्व में अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन में भारत का दूसरा स्थान है।

मोती देने वाली मछलियाँ मन्नार की खाड़ी में पकड़ी जाती हैं।

गुजरात में सबसे अधिक समुद्री मछलियाँ पकड़ी जाती हैं।

ताजे पानी की सर्वाधिक मछलियाँ पश्चिम बंगाल में पकड़ी जाती है।

मछली उत्पादन में पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर है।

Saturday, July 1, 2017

अंतरराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग दिवस - टिप्पण्यानन्द जी लिखेंगे पावस पर पोस्ट!

“नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!”

“नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!”

“सुना है लिख्खाड़ानन्द जी, १ जुलाई, याने कि आज अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस मनाया जा रहा है।”

“जी हाँ टिप्पण्यानन्द जी, ताऊ रामपुरिया जी/ ने इसका आगाज किया है, और खुशदीप सहगल जी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस के लिए टैग का चुनाव करने हेतु खून पसीना एक कर रहे हैं।”

“तो अब तो हिन्दी ब्लॉगरों की बल्ले बल्ले हो गई”

“होगी क्यों नहीं भइ! आप टिपियाने वालों को भी तो टिपयाने बहुत चांस मिलेता। तो टिप्पण्यानन्द जी, हिन्दी ब्लॉग दिवस के इस शुभ अवसर पर आप क्या करेंगे? मेरा तो सुझाव है कि आप अब टिपियाने के साथ जोरदार पोस्ट लिखना भी शुरू कर दें। कहिये कैसा रहेगा?”

“सुझाव तो आपका बहुत बढ़िया है लिख्खाड़ानन्द जी! पर हम लिखें क्या? हमें तो कुछ सूझता ही नहीं। क्या लिखें और किस पर लिखें?”

“अरे बरसात का मौसम शुरू हो है टिप्पण्यानन्द जी। आप वर्षा ऋतु पर ही पोस्ट लिख डालिए।”

“चलिए, मैं सुझाता हूँ आपको। पर पोस्ट आपको ही लिखना होगा।”

“ऐसा है, मैं जरूर लिखूँगा जी।”

“तो अपने पोस्ट में पहले आप यह बताएँ कि हमारा देश भारत ही विश्व में ऐसा देश है जहाँ तीन ऋतुएँ (ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु और शीत ऋतु) होती हैं, अन्य देशों में केवल ग्रीष्म ऋतु और शीत ऋतु होती है, वर्षा ऋतु नहीं होती। उन देशों में वर्षा या तो ग्रीष्म ऋतु के दौरान होती है या फिर शीत ऋतु के दौरान। इसक मतलब यह हुआ कि वर्षा ऋतु का आनन्द हम भारतवासी है ले सकते हैं, विश्व के अन्य देशों के लोग इसका आनन्द नहीं उठा सकते।”

“वाह! वाह!! लिख्खाड़ानन्द जी। यह तो हमें पता ही नहीं था कि वर्षा ऋतु सिर्फ भारत में होती है।”

“अब तो पता चल गया ना! तो फिर अपने पोस्ट के माध्यम से यह जानकारी और लोगों को भी दीजिए।

ग्रीष्म ऋतु के अंतिम दिनों में लोग जब भगवान भास्कर के प्रकोप से त्राहि-त्राहि करने लगते हैं तो वे सिर्फ यही चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी बारिश हो जाये और इस भीषण गर्मी से निजात मिले।”

“हाँ यह तो होता है।”

“किसान की आँखें आसमान को तकती रहती हैं कि कब बादल बरसे और कब वह अपनी खेती बाड़ी का काम शुरू करे।”

“जी हाँ, बरसात के बिना तो खेती हो ही नहीं सकती”

“अच्छा बताइये कि वर्षा ऋतु को हिन्दी में और क्या कहते हैं?”

“शायद पावस कहते हैँ।”

“शायद नहीं, पावस ही कहा जाता है वर्षा ऋतु को। आदिकवि वाल्मीकि से लेकर आज के आधुनिक कवि, सभी पावस के दीवाने रहे हैं। रामायण महाकाव्य में महर्षि वाल्मीकि ने राम के मुख से कहलाया है -

क्वचिद् वाष्पाभिसंरुद्धान वर्षागमसमुत्सुकान्।
कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु।
माम शोकाभिभतस्य कासंदीपनान् स्थितान्॥
(सामायण - 4-28-14)

अर्थ - हे सौमित्र, देखो! इस पर्वत के शिखरों पर खिले हुए कुटज कैसी शोभा पाते हैं। कहीं पहली बार वर्षा होने पर भूमि से निकले हुए भाप व्याप्त हो रहे हैं, तो कहीं वर्षा के आगमन से अत्यंत उत्सुक दिखाई देते हैं। मैं तो प्रिया-विरह के शोक से पीड़ित हूँ और ये कुटज मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।

वर्षा ऋतु के विषय में राम यह भी कहते हैं - 'हे लक्ष्मण! देखो इस वर्षा ऋतु में प्रकृति कितनी सुन्दर प्रतीत होती है। ये दीर्घाकार मेघ पर्वतों का रूप धारण किये आकाश में दौड़ रहे हैं। इस वर्षा ऋतु में ये मेघ अमृत की वर्षा करेंगे। उस अमृत से भूतलवासियों का कल्याण करने वाली नाना प्रकार की औषधियाँ, वनस्पति, अन्न आदि उत्पन्न होंगे। इधर इन बादलों को देखो, एक के ऊपर एक खड़े हुये ये ऐसे प्रतीत होते हैं मानो प्रकृति ने सूर्य तक पहुँचने के लिये इन कृष्ण-श्वेत सीढ़ियों का निर्माण किया है। शीतल, मंद, सुगन्धित समीर हृदय को किस प्रकार प्रफुल्लित करने का प्रयत्न कर रही हैं, किन्तु विरहीजनों के लिये यह अत्यधिक दुःखदायी भी है। उधर पर्वत पर से जो जलधारा बह रही है, उसे देख कर मुझे ऐसा आभास होता है कि सीता भी मेरे वियोग में इसी प्रकार अश्रुधारा बहा रही होगी। इन पर्वतों को देखो, इन्हें देखकर लगता है जैसे ब्रह्मचारी बैठे हों। ये काले-काले बादल इनकी मृगछालाएँ हों। नद-नाले इनके यज्ञोपववीत हों और बादलों की गम्भीर गर्जना वेदमंत्रों का पाठ हो। कभी कभी ऐसा प्रतीत होता है कि ये बादल गरज नहीं रहे हैं अपितु बिजली के कोड़ों से प्रताड़ित हो कर पीड़ा से कराहते हुये आर्तनाद कर रहे हैं। काले बादलों में चमकती हुई बिजली ऐसी प्रतीत हो रही है मानो राक्षसराज रावण की गोद में मूर्छित पड़ी जानकी हो। हे लक्ष्मण! जब भी मैं वर्षा के दृश्यों को देख कर अपने मन को बहलाने की चेष्टा करता हूँ तभी मुझे सीता का स्मरण हो आता है। यह देखो, काले मेघों ने दसों दिशाओं को अपनी काली चादर से इस प्रकार आवृत कर लिया है जैसे मेरे हृदय की समस्त भावनाओं को जानकी के वियोग ने आच्छादित कर लिया है।

“इस वर्षा ऋतु में राजा लोग अपने शत्रु पर आक्रमण नहीं करते, गृहस्थ लोग घर से परदेस नहीं जाते। घर उनके लिये अत्यन्त प्रिय हो जाता है। राजहंस भीमानसरोवर की ओर चल पड़ते हैं। चकवे अपनी प्रिय चकवियों के साथ मिलने को आतुर हो जाते हैं और उनसे मिल कर अपूर्व प्राप्त करते हैं। किन्तु मैं एक ऐसा अभागा हूँ जिसकी चकवी रूपी सीता अपने चकवे से दूर है। मोर अपनी प्रियाओं के साथ नृत्य कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि बगुलों की पंक्तियों से शोभायमान, जल से भरे, श्यामवर्ण मेघ मानो किसी लम्बी यात्रा पर जा रहे हैं। वे पर्वतों के शिखरों पर विश्राम करते हुये चल रहे हैं। पृथ्वी पर नई-नई घास उग आई है और उस पर बिखरी हुई लाल-लाल बीरबहूटियाँ ऐसी प्रतीत होती हैं मानो कोई नवयौवना कामिनी हरे परिधान पर लाल बूटे वाली बेल लगाये लेटी हो। सारी पृथ्वी इस वर्षा के कारण हरीतिमामय हो रही हैं। सरिताएँ कलकल नाद करती हुईं बह रही हैं। वानर वृक्षों पर अठखेलियाँ कर रहे हैं। इस सुखद वातावरण में केवल विरहीजन अपनी प्रियाओं के वियोग में तड़प रहे हैं। उन्हें इस वर्षा की सुखद फुहार में भी शान्ति नहीं मिलती। देखो, ये पक्षी कैसे प्रसन्न होकर वर्षा की मंद-मंद फुहारों में स्नान कर रहे हैं। उधर वह पक्षी पत्तों में अटकी हुई वर्षा की बूँद को चाट रहा है। सूखी मिट्टी में सोये हुये मेंढक मेघों की गर्जना से जाग कर ऊपर आ गये हैं और टर्र-टर्र की गर्जना करते हुये बादलों की गर्जना से स्पर्द्धा करने लगे हैं। जल की वेगवती धाराओं से निर्मल पर्वत-शिखरों से पृथ्वी की ओर दौड़ती हुई सरिताओं की पंक्तियाँ इस प्रकार बिखर कर बह रही हैं जैसे किसी के धवल कण्ठ से मोतियों की माला टूट कर बिखर रही हो। लो, अब पक्षी घोंसलों में छिपने लगे हैं, कमल सकुचाने लगे हैं और मालती खिलने लगी है, इससे प्रतीत होता है कि अब शीघ्र ही पृथ्वी पर सन्ध्या की लालिमा बिखर जायेगी।'

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में श्री राम के मुख से कहलाया है -

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥

ऋतु वर्णन में पारंगत 'सेनापति' ने वर्षा ऋतु का वर्णन इस प्रकार से किया है -

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥”

“लिख्खाड़ानन्द जी! हमारे फिल्मी गीतकारों ने भी तो वर्षा ऋृतु और सावन पर अनेक सुन्दर गीत लिखे हैं, जैसे -

बरसात में हम से मिले तुम सजन तुम से मिले हम...

छाई बरखा बहार पड़े अँगना फुहार सैंया आ के गले लग जा...

गरजन बरसत सावन आयो रे...

पड़ गए झूले सावन रुत आई रे...

ओ सजना बरखा बहार आई रस की फुहार लाई...

रिमझिम के तराने ले के आई बरसात...

काली घटा छाए मेरा जिया तरसाये...

ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी बरसात की रात...

सावन का महीना पवन करे शोर...

मेघा छाये आधी रात बैरन बन गई निंदिया...

रिमझिम गिरे सावन...

काली घटाओं ने ठंडी हवाओं ने साजन को नटखट बना दिया...

बादल यूँ बरसता है डर कुछ ऐसा लगता है...”

“देखा! अब आपको भी सूझने लगा ना! तो फिर देर क्या है? जल्दी से लिख डालिये पावस पर पोस्ट”

“अच्छा, आपका हुकम सर आँखों पर, जा रहा हूं पोस्ट लिखने।”

“अरे चाय तो पीकर जाइये।”

“जी नहीं, मुझे पोस्ट लिखने की जल्दी है। नमस्कार!”

“नमस्कार”

Saturday, October 3, 2015

ज्ञान को आत्मसात करना ही श्रेयस्कर है

एक बार राजा भोज के दरबार में एक शिल्पकार आया और उसने राजा से कहा, "हे राजन्! मैंने यह तीन मूर्तियाँ बड़े परिश्रम से बनाई हैं। इन तीनों मूर्तियों में कुछ न कुछ अन्तर है। उन अन्तरों के आधार पर आप मुझे इन मूर्तियों की कीमत दे दें।"

राज भोज तथा उनके सभी दरबारियों ने पत्थर की उन मूर्तियों को गौर से देखा, वे शिल्पकला की उत्कृष्ट कलाकृति थीं। तीनों हू-ब-हू एक जैसी! रत्ती भर भी कहीं कोई फर्क नहीं। लाख कोशिश करने पर भी वे उन मूर्तियों में किसी प्रकार का कोई अन्तर न निकाल पाये।

राजा भोज विचार करने लगे कि काश! इस समय यहाँ पर कालिदास मौजूद होते। वे जरूर इन मूर्तियों में फर्क ढूँढ लेते। उसी समय कालिदास वहाँ पधारे। राजा ने मूर्तियाँ उनके हाथों में दे दीं। पहले तो कालिदास को भी उन मूर्तियों में किसी प्रकार का अन्तर नजर नहीं आया किन्तु बहुत गौर से देखने पर उन्हें उन मूर्तियों के कानों में छेद दिखाई पड़ा। वे सोचने लगे कि फर्क अवश्य ही कान के इन छेदों के कारण ही होगा।

कालिदास ने सोने का बहुत पतला तार मँगवाया और एक मूर्ति के कान में उस तार को डाला। तार अन्दर घुसते चला गया और अन्त में तार का सिरा दूसरे कान से बाहर निकल आया। दूसरी मूर्ति के कान में तार डालने पर उसका सिरा मुँह से बाहर निकला। पर तीसरे मूर्ति के कान में तार डालने पर तार घुसता ही चला गया, कहीं से भी बाहर नहीं निकला।

यह देखकर कालिदास के मुख पर सन्तुष्टि की मुस्कान आ गई। वे राजा भोज से बोले, "महाराज जिस मूर्ति के दूसरे कान से तार का सिरा निकला उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है क्योंकि वह उन लोगों का प्रतीक है जो ज्ञान की बातों को एक कान से सुनते हैं और दूसरे कान से बाहर निकाल देते हैं। दूसरी मूर्ति जिसके मुँह से तार का सिरा निकला वह अवश्य कुछ मूल्यवान है क्योंकि वह ऐसे लोगों को इंगित करती है जो ज्ञान की बातों को सुनते हैं और सुनकर दूसरों को भी बताते हैं, उन बातों को आत्मसात करते हैं या नहीं यह कहा नहीं जा सकता किन्तु ज्ञान की बातों को सुनकर दूसरों को भी बताने का अवश्य कुछ न कुछ मूल्य होता है। और तीसरी मूर्ति जिसके भीतर तार घुसता ही चला गया, कहीं से बाहर नहीं निकला उन लोगों का प्रतीक है जो ज्ञान की बातों को सुनकर आत्मसात कर लेते हैं। इस तीसरी मूर्ति का मूल्य कोई भी नहीं दे सकता, यह अनमोल है।"

कथा का सार यही है कि ज्ञान की बातों को आत्मसात कर लेना और उनका जगत तथा स्वयं के हित में सदुपयोग करना ही श्रेयस्कर है।

Monday, April 20, 2015

मुझ बुड्ढे की भगवान से प्रार्थना

हे सर्वशक्तिमान परमात्मा!

आप जानते ही हैं कि मेरी उम्र साठ साल को पार कर गई है और मैं अब बूढ़ा हो चला हूँ।

मुझे अत्यधिक वाचाल याने कि बातूनी होने से बचाने की कृपा करें। ऐसी कृपा करें कि मैं अपने पुराने चुटकुले सुना-सुनाकर, अपने अतीत के किस्से बता-बता कर और लोगों को बिना माँगी सलाह दे-देकर पकाने की कोशिश करने से हमेशा बचूँ।

यह भी कृपा करें कि मैं लोगों के समक्ष अपनी बातों को, अन्तहीन विस्तार न देकर, संक्षेप में रख सकूँ। मेरी बुद्धि में यह बात सदा बनी रहे कि अपनी बात को अनावश्यक विस्तार देकर लोगों के समय बर्बाद करने वाले वृद्धजनों को लोग और कुछ नहीं, बल्कि एक खूँसट बुड्ढा ही समझते हैं।

अपनी ही हाँकने के बजाय लोगों की बात को सुनने और समझने की क्षमता मुझे प्रदान करने की कृपा करें।

मुझे ऐसा आशीर्वाद दें कि इस उम्र में भी मैं लोगों के सुख-दुःख में साथ दे पाऊँ।

मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं लोगों के सामने अपने परिजनों की निन्दा करने से हमेशा बचा रहूँ।

मेरे मन में कदापि यह विचार न बना रहे कि 'चूँकि मैं अन्य लोगों से उम्र में बड़ा हूँ ड़सलिए, मैं अन्य लोगों से अधिक बुद्धिमान और ज्ञानी हूँ', मेरे भीतर सदा आभास बना रहे कि यह जरूरी नहीं है कि उम्रदराज आदमी दूसरों से अधिक विवेकी हो।

मेरी इस पूरी प्रार्थना का सार यही है कि हे भगवान! आप मुझ ऐसी कृपा करें कि मैं इस वय में भी अपने अवगुणों से अवगत रह पाऊँ ताकि लोग मुझे सठियाया हुआ बुड्ढा, सनकी बुड्ढा, झक्की बुड्ढा, खूँसट बुड्ढा जैसी उपाधि प्रदान करने से परहेज करें।

Saturday, March 21, 2015

हिन्दू नववर्ष

  • हिन्दू नववर्ष (Hindu New Year) का आरम्भ प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से होता है। आज भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन है और आज से हिन्दू नव संवत्सर 2072 का आरम्भ हो रहा है।

  • हिन्दू मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन से सृष्टि की रचना का पहला दिन है। ब्रह्मा जी ने आज से लगभग एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 111 वर्ष पूर्व आज के दिन ही से सृष्टि की रचना शुरू की थी।

  • रावण का वध करके लंका से अयोध्या वापस आने के बाद भगवान श्री राम का राज्याभिषेक आज ही के दिन, अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के ही दिन, हुआ था।

  • चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से ही चैत्र नवरात्रि का आरम्भ होता है।

  • आज से लगभग 5113 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ था, जिसकी स्मृति में युगाब्द संवत्सर आरम्भ किया गया।

  • भारत के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा चलाये गये विक्रम संवत का आरम्भ भी आज से 2072 वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही से हुआ था।

  • आज से 1937 वर्ष पूर्व आज ही के दिन से शालिवाहन शक संवत का आरम्भ हुआ था। उल्लेखनीय है कि शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित किया था।

  • सिख परम्परा के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को गुरु अंगद देव प्रकटोत्सव मनाया जाता है। गुरु अंगद देव सिखों के द्वितीय गुरु हैं।

  • आर्य समाज की स्थापना भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही हुई थी।

  • सिंध प्रान्त के सुप्रसिद्ध समाज रक्षक संत झूलेलाल, जिन्हें भगवान वरुण का अवतार माना जाता है, भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही प्रकट हुए थे।

  • उल्लास और उमंग प्रदान करने वाला ऋतुराज वसन्त का आरम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही होता है।
  • अंग्रेजी नववर्ष रात्रि के बारह बजे नीरव अन्धकार में आता है जबकि हिन्दू नववर्ष प्रातः सूर्योदय के समय पक्षियों के मधुर कलरव के साथ आता है; अंग्रेजी नववर्ष आने के समय पतझड़ का मौसम होता है जिसके कारण प्रकृति का सौन्दर्य फीका रहता है जबकि हिन्दू नववर्ष आने के समय वसन्त ऋतु होता है जो कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में हर्ष, उल्लास और उमंग को उद्दीप्त करती है; अग्रेजी नववर्ष मादक पदार्थों का सेवन करके हो-हल्ला मचा कर मनाया जाता है जबकि हिन्दू नववर्ष शान्ति के साथ पूजा-पाठ करके मनाया जाता है।

Friday, March 20, 2015

परिवर्तन

इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, परिवर्तन (variance) ही संसार का नियम है। समय बदलने के साथ ही साथ अनेक प्रकार के उलट-फेर (somerset) होना स्वाभाविक बात है। इस सत्य को समस्त विद्वानों ने स्वीकारा है।

किसी ने सच ही कहा है - सदा न जोबन थिर रहे, सदा न जीवै कोय।

रावण का वंश बहुत विशाल था पर हुआ क्या? यही ना -

इक लख पूत सवा लख नाती,
ता रावण घर दिया ना बाती।

यह तो समय बदल जाने की ही बात है।

महाभारत के शान्ति पर्व (80/8) में परिवर्तन (variance, somerset) को लक्ष्य करते हुए वेदव्यास जी लिखते हैं -

असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः।
अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति॥

भावार्थः असाधु अर्थात दुष्ट मनुष्य साधु अर्थात भला व्यक्ति बन जाता है और साधु अर्थात भला व्यक्ति दारुण अर्थात दुष्ट बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और मित्र शत्रु।

सच पूछा जाय तो मनुष्य बलवान नहीं होता, समय ही बलवान होता है, इसीलिए तो कहा गया है

पुरुष बली नहि होत है समय होत बलवान।
भीलन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान॥

मलिक मोहम्मद जायसी अपनी सुप्रसिद्ध रचना पद्मावत में कहते हैं -

मोतिहि जौं मलीन होइ करा। पुनि सो पानि कहाँ निरमरा॥

भावार्थः एक बार मोती की कान्ति मलिन हो जाने पर उसे फिर से वही कान्ति नहीं मिलती।

समय के साथ परिवर्तन कैसे होता है यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं -

तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन॥

भावार्थः तुलसीदास जी कहते हैं कि पावस ऋतु अर्थात बरसात का मौसम आने पर कोयल मौन धारण कर लेती है, क्योंकि मेढकों के टर्राने की आवाज के बीच कोयल की आवाज कौन सुनेगा?

नरोत्तमदास अपनी प्रसिद्ध खंडकाव्य "सुदामाचरित" में कहते हैं -

कै वह टूटि सी छानी हुती कहँ
कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग मे पनही न हुती कहँ
लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ
कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदो सवाँ, प्रभु
कै परताप ते दाख न भावत॥

भावार्थः कृष्ण के सखा सुदामा का कभी टूटी छत वाली झोपड़ी थी तो अब विशाल भवन है जिसे सारे कमरे सोने से सुसज्जित हैं। कभी सुदामा के पैरों में पनही तक नहीं होती थी और अब उनके लिए हाथी लेकर महावत खड़े रहते हैं। कभी कठोर भूमि पर सोकर रात कटती थी तो अब कोमल शय्या पर भी नींद नहीं आती और कभी मोटा-झोटा अन्न तक भी नहीं मिल पाता था और आज मेवे भी सुदामा को भाते नहीं हैं।

समय के बारे में कवि बिहारी लिखते हैं -

समै पलटि पलटै प्रकृति, को न तजै निज चाल।

भावार्थः समय बदलने पर प्रकृति भी पलट जाती है, इस संसार में भला ऐसा कौन है जो समय के साथ अपनी चाल न बदलता हो।

जयशंकर प्रसाद अपने नाटक "स्कन्दगुप्त" में लिखते हैं -

परिवर्तन ही सृष्टि है, जीवन है। स्थिर होना मृत्यु है, निश्चेष्ट शान्ति मरण है। प्रकृति क्रियाशील है।

सुमित्रानन्दन पंत जी अपनी रचना "पल्लव" में कहते हैं -

आज बचपन का कोमल गात जरा का पीला पात।
चार दिन सुखद चाँदनी रात और फिर अंधकार अज्ञात॥

भावार्थः बचपन में जो कोमल शरीर था वह आज वृद्धावस्था में पीला और झुर्रीदार हो गया है। चार दिन की सुखद चाँदनी होती है फिर अंधेरा ही रह जाता है।

"भारत भारती" में मैथिलीशरण गुप्त जी बताते हैं -

संसार में किसका समय है एक सा रहता सदा,
है निशि-दिवा सी चूमती सर्वत्र विपदा-सम्पदा।
जो आज राजा बन रहा है रंक कल होता वही,
जो आज उत्सव-मग्न है कल शोक से रोता वही॥

भावार्थः इस संसार में भला किसका समय एक सा रहता है! रात और दिन की तरह विपत्ति और सम्पत्ति आते-जाते रहते हैं। जो आज अमीर है वही कल गरीब हो जाता है और जो आज उत्सव मना रहा है उसी को कल शोक से रोना भी पड़ता है।

"चित्रलेखा" उपन्यास में भगवतीचरण वर्मा जी लिखते हैं -

संसार क्या है? शून्य है। और परिवर्तन उस शून्य की चाल है।

बन्धुओं समय कभी भी एक जैसा नहीं होता, आपने ये लोकोक्तियाँ अवश्य ही सुनी होंगी

"सब दिन जात न एक समान"

"कभी दिन बड़े तो कभी रात बड़ी"

"कभी नाव गाड़ी पर, कभी गाड़ी नाव पर"

"चार दिनों की चांदनी फिर अंधियारी रात"

"घूरे के भी दिन फिरते हैं"

अतः समय के अनुसार स्वयं को ढालने में ही बेहतरी है।

Friday, March 13, 2015

कलम-दवात और काले हाथ


कल एक व्यापारी मित्र ने अनुरोध किया कि मैं उनका बैंक अकाउंट खोलने का फॉर्म भर दूँ। फॉर्म तो मैंने भर दिया किन्तु फॉर्म भरने के लिए पेन निकालते समय विचार आया कि न जाने कितने दिनों से मैंन कुछ लिखने के लिए पेन का प्रयोग नहीं किया है। आजकल पेन तो सिर्फ हस्ताक्षर करने के लिए ही निकलता है, या फिर कभी कोई फॉर्म भरने के लिए। कुछ, सार्थक या निरर्थक ही सही, लिखने के लिए मैंने पेन का प्रयोग कब किया था, बहुत सोचने पर भी याद नहीं आया। अब लिखना होता ही कहाँ है? अब तो सिर्फ कम्प्यूटर में टाइप करना ही होता है।

विचारों के सागर में गोते लगाता हुआ मैं धीरे-धीरे बीते हुए समय की ओर जाने लगा। आज जेल पेन, उसके पहले बॉल पेन, बॉल पेन के पहले फाउंटेन पेन और उसके भी पहले कलम-दवात।



दवात को धो-पोंछ कर उसमें स्याही भरना...

स्याही भरते समय हाथ, कभी-कभी कपड़ों, का काला हो जाना...

लिखते समय कलम का निब टूट जाने पर परेशान होना...

लिखावट सुन्दर न होने के कारण गुरुजी से डाँट पड़ना और कभी-कभी मार खाना...

पर यह सब मैं लिख क्यों रहा हूँ? शायद इसलिए कि अतीत में जीते रहना वृद्धों का स्वभाव बन जाता है।

वैसे भी प्रेमचंद जी ने अपने उपन्यास 'गोदान' में लिखा है -
बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दु:खों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।


Monday, March 9, 2015

औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी...


साहिर लुधियानवी

औरत ने जनम दिया मर्दों को
मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला
जब जी चाहा दुत्कार दिया

तुलती है कहीं दीनारों में
बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है
ऐय्याशों के दरबारों में
ये वो बेइज़्ज़त चीज़ है जो
बँट जाती है इज़्ज़तदारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ
औरत के लिये रोना भी खता
मर्दों के लिये लाखों सेजें
औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक़
औरत के लिये जीना भी सज़ा
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

जिन होठों ने इनको प्यार किया
उन होठों का व्यौपार किया
जिस कोख में इनका जिस्म ढला
उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोपल बन कर
उस तन को ज़लील-ओ-ख़ार किया
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

मर्दों ने बनायी जो रस्में
उनको हक़ का फ़रमान कहा
औरत के ज़िन्दा जलने को
कुर्बानी और बलिदान कहा
इस्मत के बदले रोटी दी
और उसको भी एहसान कहा
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

संसार की हर एक बेशर्मी
गुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ के रुकती है
फ़ाकों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर
औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

औरत संसार की क़िस्मत है
फ़िर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जनती है
फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदक़िस्मत माँ है जो
बेटों की सेज़ पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को...

Friday, March 6, 2015

मोहे रहि रहि मदन सतावै....



टेसू और सेमल के लाल-लाल फूल...

बौराये हुए आम के पेड़...

पीले फूलों वाले सरसों के खेत...

गेहूँ की लहलहाती बालियाँ...

मादक सुगंध लिए हुए शीतल मंद बयार...

किस रसिक का मन मदमस्त नहीं हो उठेगा यह सब देख कर!

भला किसकी कोमल भावनाएँ उद्दीप्त न हो उठेंगी फागुन के इस महीने में!

ऐसे में किसी विरहणी, जिसका प्रिय परदेस में जा बसा हो, के मन की हालत क्या होगी?

क्या वह विरह में कह न उठेगी ...



नींद नहि आवै पिया बिना नींद नहि आवै

मोहे रहि रहि मदन सतावै
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि फागुन मस्त महीना
सब सखियन मंगल कीन्हा
अरे तुम खेलव रंगे गुलालै
मोहे पिया बिना कौन दुलारै
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि लागत मास असाढ़ा
मोरे प्रान परे अति गाढ़ा
अरे वो तो बादर गरज सुनावै
परदेसी पिया नहीं आवै
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि सावन मास सुहाना
सब सखियाँ हिंडोला ताना
अरे तुम झूलव संगी सहेली
मैं तो पिया बिना फिरत अकेली
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि भादो गहन गंभीरा
मोरे नैन बहे जल नीरा
अरे मैं तो डूबत हौं मँझधारे
मोहे पिया बिना कौन उबारे
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि क्वार मदन तन दूना
मोरे पिया बिना मंदिर सूना
अरे मैं तो का से कहौं दुःख रोई
मैं तो पिया बिना सेज ना सोई
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि कातिक मास देवारी
सब दियना बारैं अटारी
अरे तुम पहिरौ कुसुम रंग सारी
मैं तो पिया बिना फिरत उघारी
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि अगहन अगम अंदेसू
मैं तो लिख लिख भेजौं संदेसू
अरे मैं तो नित उठ सुरुज मनावौं
परदेसी पिया को बुलावौं
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि पूस जाड़ अधिकाई
मोहे पिया बिना सेज ना भायी
अरे मोरा तन मन जोबन छीना
परदेसी गवन नहिं कीन्हा
पिया बिना नींद नहि आवै

सखि माघ आम बौराये
चहुँ ओर बसंत बिखराये
अरे वो तो कोयल कूक सुनावै
मोरे पापी पिया नहि आवै
पिया बिना नींद नहि आवै

Monday, March 2, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 9 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • यदि मुक्ति की कामना करते हो तो समस्त विषय-वासनाओं को विष की भाँति त्यागक दया, पवित्रता, नम्रता और क्षमाशीलता को अपनाओ।

  • दूसरों के दोषों को उजागर करने वाले नीच व्यक्ति उसी प्रकार से नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार से साँप के घर में रहने वाला दीमक।

  • प्रतीत होता है कि सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा जी को किसी ने यह सलाह नहीं दी कि वे सोने को सुगन्ध, ईख को फल, चन्दन वृक्ष को फूल, विद्वान को धन और राजा को दीर्घायु प्रदान करते।

  • औषधियों में अमृत, इन्द्रिय सुखों में भोजन, इन्द्रयों में नेत्र एवं शरीर के अंगों में सिर प्रधान होते हैं।

  • जो ब्राह्मण सूर्य तथा चन्द्रग्रहण की सटीक भविष्यवाणी करता है वह वास्तव में विद्वान होता है; क्योंकि आकाश में न तो कोई दूत जा सकता है और न ही वहाँ से कोई संदेश लाया जा सकता है।

  • विद्यार्थी, सेवक, पथिक, भूखा आदमी, भयभीत व्यक्ति, कोष का रक्षक और द्वारपाल यदि सो जाएँ तो उन्हें तत्काल जगा देना चाहिए।

  • सर्प, राजा, सिंह, बर्र, बालक, दूसरे का कुत्ता और मूर्ख व्यक्ति को कभी भी सोते से नहीं जगाना चाहिए।

  • धन कमाने के लिए वेदपाठ करने वाला और शूद्रों का अन्न खाने वाला ब्राह्मण शक्तिहीन होते हैं; वे उस सर्प के समान हैं जिनमें विष नहीं; वे न तो शाप दे सकते हैं और न ही वरदान।

  • जिसके क्रोध से भय नहीं उत्पन्न नहीं होता, जिसकी प्रसन्नता से लाभ नहीं होता और जिनमें दण्ड देने का सामर्थ्य नहीं हो ऐसा व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता।

  • साँप के विष से अधिक उसका फुँफकारना भय उत्पन्न करता है अतः विषहीन होने के बावजूद भी सर्प को फुँफकारना चाहिए।

  • स्वयं के द्वारा गूथे हार को स्वयं पहनने से, स्वयं के द्वारा घिसे चंदन को स्वयं लगाने से और स्वयं के द्वारा रचित स्त्रोत को स्वयं पढ़ने से वैभव का नाश होता है।

  • ईख, तिल, क्षुद्र स्त्री, स्वर्ण, धरती, चंदन, दही, और पान पान को जितना अधिक मथा जाता है, उनसे उतनी ही अधिक प्राप्ति होती है।
  • दरिद्रता में भी धैर्य रखना चाहिए, नये वस्त्र न होने पर पुराने वस्त्रों को भी स्वच्छ रखना चाहिए, बासी हो जाने पर अन्न को गरम करके खाना चाहिए और कुरूप होने पर सद्व्यवहार से लोगों को प्रभावित करना चाहिए।

Saturday, February 28, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 8 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • निम्न वर्ग के लोग धन की कामना करते हैं और मध्यम वर्ग के लोग धन तथा यश दोनों की; किन्तु उच्च वर्ग के लोग सिर्फ यश की ही कामना करते हैं क्योंकि यश धन से श्रेष्ठ है।

  • जिस प्रकार दीपक अन्धकार को खाकर कालिख बनाता है अर्थात् काली वस्तु को खाकर काली वस्तु ही बनाता है, उसी प्रकार से मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही विचार बनाता है।

  • बुद्धिमान पुरुष के लिए यही उचित है कि वह अपना धन गुणी तथा योग्य व्यक्ति को दे, किसी अन्य को नहीं क्योंकि समुद्र का जल मेघो के मुँह में जाकर मीठा हो जाता है तथा पृथ्वी के चर-अचर जीवों को जीवनदान देकर कई करोड़ गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है।

  • तत्वदर्शियों ने कहा है कि एक मलेच्छ हजारों चाण्डालों से भी अधिक नीच होता है, मलेच्छ से बढ़कर नीच अन्य कोई भी नहीं है।

  • शरी पर तेल लगाने के बाद, शरीर पर चिता का धुआँ लग जाने के बाद, स्त्री संभोग करने के बाद और बाल कटवाने के बाद मनुष्य तब तक चाण्डाल (अशुद्ध) रहता है जब तक कि वह स्नान न कर ले।

  • अपच की अवस्था में जल पीने पर जल औषधि के समान है; भोजन पच जाने के पश्चात जल पीने पर जल शक्तिवर्धक है; भोजन करते समय बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा जल पीने पर जल अमृत के समान है किन्तु भोजन समाप्त करने के तत्काल बाद जल पीने पर जल विष के समान है।

  • ज्ञान को कर्म का रूप न देने पर ज्ञान व्यर्थ हो जाता है; ज्ञान से हीन व्यक्ति मृतक के समान है; सेनापति न होने पर सेना नष्ट हो जाती है; और पति के बिना पत्नी पतित हो जाती है।

  • बुढ़ापे में पत्नी की मृत्यु हो जाना, धन-सम्पदा का बंधु-बांधवों के हाथों चले जाना और भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर होना व्यक्ति के लिए दुर्भाग्य है।

  • यज्ञ कर्मों को न करके केवल वेद मंत्रों का उच्चारण करना व्यर्थ है; दान किये बिना यज्ञ करना व्यर्थ है; और भाव (प्रेम) न होने पर सिद्धि व्यर्थ है।

  • सोने, चांदी, तांबे, पीतल, लकड़ी, पत्थर इत्यादि से बनी मूर्ति में देवता को विद्यमान मानकर उसकी पूजा करनी चाहिए। मनुष्य जिस भाव से पूजा करता है, ईश्वर उसे वैसी ही सिद्धि प्रदान करते हैं।

  • संयम के समान कोई तप नहीं है; संतोष के समान कोई सुख नहीं है; लोभ के समान कोई रोग नहीं है; और दया के समान कोई गुण नहीं है।

  • क्रोध साक्षात यमराज है; लोभ साक्षात वैतरणी (नरक में बहने वाली नदी) है; ज्ञान साक्षात कामधेनु है; और संतोष साक्षात नन्दनवन (देवराज इन्द्र की वाटिका) है।

  • रूप की शोभा गुण में है; कुल की शोभा शील में है; विद्या की शोभा सिद्धि में है; और धन की शोभा भोग में है।

  • गुण न होने पर रूप व्यर्थ है; दुष्ट स्वभाव होने पर कुल का नाश हो जाता है; लक्ष्य न होने पर सिद्धि व्यर्थ है; और सदुपयोग न करने पर धन व्यर्थ है।

  • भूमि के भीतर का जल पवित्र होता है; परिवार को समर्पित पतिव्रता स्त्री पवित्र होती है; लोककल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है; और सन्तोष करने वाला ब्राह्मण पवित्र होता है।

  • असन्तोषी ब्राह्मण, सन्तोषी राजा, लज्जाशील वेश्या और निर्लज्ज कुलीन स्त्री का नाश जल्दी ही हो जाता है।

  • उच्च कुल में जन्मे अज्ञानी एवं मूर्ख का कोई सम्मान नहीं करता जबकि नीच कुल में जन्मे विद्वान का सभी देवता के समान सम्मान करते हैं।

  • विद्वान ही सर्वत्र सम्मान पाता है; विद्या ही श्रेष्ठ है; विद्या की सर्वत्र पूजा होती है।

  • विद्या से हीन सुन्दर, युवा और कुलीन व्यक्ति पलाश के फूल के समान होता है जिसमें सुन्दरता तो होती है किन्तु सुगन्ध नहीं होती।

  • मांस-मदिरा का सेवन करने वाले तथा विद्या से हीन व्यक्ति मनुष्य के रूप में पशु और धरती के लिए बोझ होते हैं।
  • यज्ञ के पश्चात भोजन न करवाने पर यज्ञ राजा को जलाता है; अशुद्ध मंत्रोच्चार करने पर यज्ञ ऋत्विज (यज्ञ सम्पन्न करने वाला ब्राह्मण) को जलाता है; और यज्ञ के पश्चात दान न करने पर यज्ञ यजमान को जलाता है।

Tuesday, February 24, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 7 (Chanakya Neeti in Hindi)

  • बुद्धिमान व्यक्ति धन के नाश, मन के संताप, पत्नी के दोष, स्वयं के द्वारा खाये जाने वाले धोखा और स्वयं के अपमान को किसी को नहीं बताते।

  • वही व्यक्ति सुखी होता है जो धन सम्बन्धी व्यवहार करने में, ज्ञानर्जन में, भोजन करने में और ईमानदारी से काम करने में संकोच नहीं करता।

  • जो सुख संतोषी व्यक्ति को संतोष प्राप्त करने में मिलता है वही सुख लोभी व्यक्ति को धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिलता।

  • स्वयं की पत्नी से, उपलब्ध भोजन से और अपने कमाये धन से हमेशा संतुष्ट रहना चाहिए। किन्तु विद्याभ्यास, तप और परोपकार करने में हमेशा असंतुष्ट रहना चाहिए।

  • दो ब्राह्मणों, ब्राह्मण और यज्ञ की अग्नि, पति और पत्नी, स्वामी और सेवक तथा हल और बैल के बीच कभी नहीं पड़ना चाहिए।

  • अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गाय, कन्या, वृद्ध और बालक को कभी भी चरण से स्पर्श नहीं करना चाहिए।

  • सींग वाले पशु से दस हाथ की, घोड़े से सौ हाथ की और हाथी से हजार हाथ की दूरी रखना चाहिए किन्तु जिस स्थान में दुष्ट हों उस स्थान का ही त्याग कर देना चाहिए।

  • हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले पशु को डंडे से और दुष्ट व्यक्ति को तलवार से नियन्त्रित करना चाहिए।

  • ब्राह्मण भोजन पाकर, मोर मेघ की गर्जन सुनकर, साधु दूसरों की सम्पन्नता देखकर और दुष्ट दूसरों को विपत्ति में देखकर प्रसन्न होते हैं।

  • स्वयं से अधिक शक्तिशाली को समझौता करके, अपने समान शक्ति वाले को स्थिति अनुसार युद्ध या समझौता करके और अपने से दुर्बल को अपनी शक्ति का प्रभाव दिखाकर वश में करना चाहिए।

  • राजा की शक्ति बाहुबल में, ब्राह्मण की शक्ति ज्ञान में और स्त्री की शक्ति सौन्दर्य तथा माधुर्य में होती है।

  • अत्यधिक सरल और सीधा होना भी अच्छी बात नहीं है; वन के सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं, टेढ़े नहीं।

  • जिस प्रकार से सरोवर के पानी सूख जाने पर हंस सरोवर को छोड़ देता है उसी प्रकार से व्यक्ति के सद्व्यवहार करना छोड़ देने पर लोग उससे नाता तोड़ लेते हैं।

  • जिस प्रकार से स्थिर जल से प्रवाहित जल अच्छा होता है उसी प्रकार से संचित किये जाने वाले धन से दान दिया जाने वाला धन अच्छा होता है।

  • संसार में जिस व्यक्ति के पास धन है उसके सभी मित्र और सगे-सम्बन्धी हैं, वही श्रेष्ठ माना जाता है, उसे ही मान-सम्मान मिलता है और वही शानोशौकत से जीता है।

  • परोपकार करना, मधुर वचन कहना, भगवान की आराधना करना और ब्राह्मण को भोजन तथा दान से सन्तुष्ट करना सद्पुरुए और देवताओं के गुण हैं।

  • अत्यधिक क्रोध करना, कठोर वचन कहना, सम्बन्धियों से बैर रखना, नीच व्यक्ति से मित्रता करना तथा नीच कुल के व्यक्ति की नौकरी करना - ये पाँच कार्य ऐसे हैं जो भूलोक में ही नरक के दुखों का आभास कराते हैं।

  • शेर की मांद में जाकर गजमुक्ता पाया जा सकता है और सियार के मांद में जाकर सिर्फ बछड़े की पूँछ या गधे का चमड़ा ही पाया जा सकता है।

  • विद्या से हीन व्यक्ति किसी कुत्ते की पूँछ के समान होता है जिससे न तो इज्जत ढाँकी जा सकती है और न ही मक्खियों को दूर किया जा सकता है।

  • वाणी की पवित्रता, मन की स्वच्छता और इन्द्रियों को वश में रखने का तब तक कुछ भी महत्व नहीं है जब तक कि मन में करुणा न हो।

  • जिस प्रकार से दिखाई न देने के बावजूद भी फूल में सुगंध, तिल में तेल, लकड़ी में अग्नि, दूध में घी और गन्ने में गुड़ विद्यमान रहता है उसी प्रकार से शरीर में आत्मा विद्यमान रहती है।

Monday, February 23, 2015

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मोबाइल से बात करने में पैसे तो खर्च करने पड़ते हैं। जितनी लंबी बातचीत उतने ही अधिक पैसे भी खर्च।

पर अब आप अपने मोबाइल से बिना पैसे खर्च किये ही, मुफ्त में, बात कर सकते हैं... और वह भी आप जितनी भी देर तक चाहें। आप चाहें तो इन्टरनेशनल कॉल भी कर सकते हैं बिल्कुल मुफ्त में।

मेरे इस पोस्ट को पढ़कर आपको लगेगा कि मैं एक बहुत बड़ा जानकार हूँ, किन्तु यकीन मानिये कि कल तक मैं भी नहीं जानता था कि मोबाइल से मुफ्त में भी बात किया जा सकता है। यह जानकारी तो मेरे हाथ लगी कल ब्लोगर शिरोमणि और महातकनीकी विशेषज्ञ श्री बी.एस. पाबला जी के कल के एक फेसबुक अपडेट से। पाबला जी ने कल के अपने फेसबुक अपडेट में लिखा था

मैंने और Shekhar Patil जी ने अभी एक लंबी बातचीत की फेसबुक टू फेसबुक 'फ्री' कॉल कर के.

हम दोनों ही वाई-फाई से जुड़े मोबाइल्स पर थे

शानदार नतीजा रहा. फेसबुक को इस पर 100/ 100 मार्क्स smile emoticon

उपरोक्त अपडेट के कमेंट्स में कुछ लोगों ने पूछा है कि मोबाइल से मुफ्त में बात कैसे होती है? मुझे भी इस बात की उत्सुकता हुई। सो मैंने नेट में थोड़ा सा शोधकार्य किया और मुझे पता चल गया कि यह कैसे होता है। मैंने तत्काल, अपने मोबाइल से, पाबला जी से मुफ्त में बात किया और इस विषय पर पोस्ट लिखने की अनुमति चाही जो कि पाबला जी ने खुशी के साथ दे दिया।

तो आप भी जान लें कि मोबाइल से मुफ्त बात कैसे किया जाये।

मोबाइल से मुफ्त बात करने के लिए पहली बात तो यह है कि आपका मोबाइल नेट से कनेक्टेड हो, 3g हो तो बेहतर है क्योंकि 2g पर नतीजा उतना अच्छा नहीं है। वाई-फाई से जुड़े हों तो फिर क्या बात है! नेट का भी अलग से खर्च नहीं।

तो इसके लिए आपको सबसे पहले अपने मोबाइल में फेसबुक मेसेन्जर डाउनलोड करना होगा। डाउनलोड हो जाने पर जब आप फेसबुक मेसेन्जर को ओपन करेंगे तो आपके सारे फेसबुक मित्रों की सूची आपको नजर आएगी। मोबाइल के टच स्क्रीन पर किसी मित्र को टच करने पर टाप राइट कॉर्नर पर कॉल वाला आइकॉन दिखेगा। बस क्या है इस आइकान को टच करें और शुरू कर दें बात करना मुफ्त में!

आपकी जानकारी के लिए यह बताना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि फेसबुक मेसेन्जर में VOIP (voice over IP) नामक यह सुविधा जनवरी 2013 से ही उपलब्ध थी किन्तु इस सुविधा का उपयोग केवल US, UK, और कनाडा तक ही सीमित था जिसे कि अप्रैल 2014 से सभी देशों के लिए उपलब्ध करा दिया गया।

Thursday, February 19, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 6 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • शास्त्रों के श्रवण से धर्म का ज्ञान होता है, द्वेष का नश होता है, ज्ञान की प्राप्ति होती है और माया से आसक्ति दूर होती है।

  • पक्षियों में कौवा नीच है; पशुओं में कुत्ता नीच है; तपस्वियों में पाप करने वाला तपस्वी घृणास्पद है; और मनुष्यों में दूसरों की निन्दा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल है।

  • राख से माँजने पर काँसे का बर्तन शुद्ध होता है; इमली से माँजने से तांबे का बर्तन शुद्ध होता है; रजस्वला होकर स्त्री शुद्ध होती है; और तीव्र गति से प्रवाहित होकर नदी निर्मल होती है।

  • राजा, ब्राह्मण और योगी भ्रमण में जाते हैं तो सम्मानित होते हैं; किन्तु घर से बाहर अकारण भ्रमण करने वाली स्त्री भ्रष्ट होती है।

  • पास में धन होने पर अनेक मित्र व सम्बन्धी बनते हैं; धनवान ही सद्पुरुष एवं पण्डित कहलाता है।

  • होनी अर्थात् ईश्वरेच्छा जैसी होती है वैसी ही बुद्धि और कर्म हो जाते हैं; सहायक भी ईश्वरेच्छा से प्राप्त होते हैं।

  • काल ही पंच भूतो (पृथ्वी,जल, वायु, अग्नि, आकाश) को पचाता है; काल ही प्राणियों का संहार करता है; काल की सीमा को कोई भी नहीं लांघ सकता; काल के जागृत होने पर प्राणी सुसुप्त अवस्था में चला जाता है।

  • जन्म से अंधे व्यक्ति को दिखाई नहीं देता; कामासक्त व्यक्ति को सुझाई नहीं देता; मद से मतवाला व्यक्ति सोच नहीं सकता; और स्वार्थी व्यक्ति को स्वयं में कोई दोष दिखाई नहीं देता।

  • जीव अनेक प्रकार के अच्छे-बुरे कर्म करता है और अपने कर्मों के फल को भोगता है; जीव स्वयं संसार के माया-मोह में फँसता है और अन्त में संसार को त्याग देता है।
  • राजा को प्रजा के द्वारा किये गए पाप को, राजपुरोहित को राजा के द्वारा किए गये पाप को, पति को पत्नी के द्वारा किए गये पाप को और गुरु को शिष्यों के द्वारा किए गये पाप को भोगना पड़ता है।

  • कर्ज में डूबा रहने वाला पिता शत्रु है; व्याभिचारिणी माता शत्रु है; मूर्ख पुत्र शत्रु है; और सुन्दर स्त्री शत्रु है।

  • लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।

  • दुष्ट राजा के राज्य में रहने की अपेक्षा बिना राज्य के ही रहना उत्तम है; दुष्ट मित्र के साथ रहने की अपेक्षा बिना मित्र के ही रहना उत्तम है; नीच शिष्य बनाने अपेक्षा शिष्य न बनाना ही उत्तम है; और दुष्ट एवं कुलटा स्त्री के साथ रहने की अपेक्षा बिना स्त्री के ही रहना उत्तम है।

  • दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहाँ? दुष्ट मित्र के साथ रहने से शान्ति कहाँ? दुष्ट एवं कुलटा नारी के संग रहने में सुख कहाँ? नीच शिष्य को ज्ञान देने में कीर्ति कहाँ?

  • मनुष्य को शेर तथा बगुले से एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौवे से पाँच और कुत्ते से छः गुण सीखना चाहिए।

  • जिस प्रकार से सिंह अपने शिकार को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, एक बार पकड़ लेता है तो छोड़ता नहीं, उसी प्रकार से किसी काम को, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, एक बार हाथ में ले लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए।

  • जिस प्रकार से बगुला अपने समस्त इन्द्रियों को संयम में रखकर शिकार करता है उसी प्रकार देश, काल और अपने सामर्थ्य को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।

  • बहुत थक जाने के बावजूद भी बोझ ढोना, ठंडे-गर्म का विचार न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।

  • अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना, ठंडे-गर्म का विचार न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।

  • ब्राह्ममुहूर्त में जागना, रण में पीछे न हटना, किसी वस्तु का बन्धुओ में बराबर भाग करना और स्वयं आक्रमण करके दूसरे से अपने भक्ष्य को छीन लेना, ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए।

  • गुप्त स्थान में मैथुन करना, छिपकर चलना, समय-समय पर सभी इच्छित वस्तुओं का संग्रह करना, सभी कार्यो में सावधानी रखना और किसी पर भी जल्दी विश्वास न करना - ये पाँच बातें कौवे से सीखना चाहिए।

  • भोजन करने की अत्यधिक शक्ति रखने के बावजूद भी थोड़े भोजन से ही संतुष्ट हो जाना, गहरी नींद में भी जरा-सा खटका होने पर ही जाग जाना, अपने रक्षक से प्रेम करना और शूरता दिखाना - ये छः गुण कुत्ते से सीखना चाहिए।
  • उपरोक्त गुणों को अपने जीवन में उतारकर आचरण करने वाला मनुष्य सदैव सभी कार्यो में विजय प्राप्त करता है।

Tuesday, February 17, 2015

आदिगुरु शंकराचार्य रचित शिवाष्टकम्


आज महाशिवरात्रि के अवस पर प्रस्तुत है आदिगुरु शंकराचार्य रचित शिवाष्टकम् -

तस्मै नम: परमकारणकारणाय दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय।
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय॥1॥

कारणों के भी परम कारण, दीप्त उज्ज्वल एवं पिङ्गल नेत्रों वाले, सर्पों के हार-कुण्डल आदि से विभूषित, तथा ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि को भी वर देने वालें शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय।
कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय लोकत्रयार्तिहरणाय नम: शिवाय॥2॥

निर्मल चन्द्र कला तथा सर्पों द्वारा भूषित एवं शोभायमान, शैलेन्द्रजा के मुख से चुम्बित लोचनों वाले, कैलास एवं महेन्द्रगिरि निवासी तथा जो त्रिलोक के दु:खों को हरने वाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय।
भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय॥3॥

स्वच्छ पद्मरागमणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले, अगर तथा चन्दन से चर्चित तथा भस्म से विभूषित, प्रफुल्लित कमल और जूही से सुशोभित, नीलकमलसदृश कण्ठवाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

लम्बत्स पिङ्गल जटा मुकुटोत्कटाय दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय।
व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय त्रिलोकनाथनमिताय नम: शिवाय॥4॥

पिङ्गलवर्ण जटाओं के मुकुट धारण करने से जो उत्कट जान पड़ते वाले, तीक्ष्ण दाढ़ों के कारण अति विकट और भयानक प्रतीत होने वाले, व्याघ्रचर्म धारण करने वाले अति मनोहर, तथा तीनों लोकों के अधीश्वर को भी अपने चरणों में झुकाने वाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

दक्षप्रजापतिमहाखनाशनाय क्षिप्रं महात्रिपुरदानवघातनाय।
ब्रह्मोर्जितोर्ध्वगक्रोटिनिकृंतनाय योगाय योगनमिताय नम: शिवाय॥5॥

दक्षप्रजापति के महायज्ञ को ध्वंस करने वाले, अत्यन्त विकट त्रिपुरासुर दानव का वध करने वाले तथा ब्रह्मा के दर्पयुक्त ऊर्ध्वमुख (पञ्च्म शिर) को काट देने वाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय।
सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय॥6॥

संसार मे घटित होने वाले समस्त घटनाओं में परिवर्तन करने में सक्षम, राक्षस, पिशाच से ले कर सिद्धगणों द्वरा घिरे रहने वाले, सिद्ध, सर्प, ग्रह-गण एवं इन्द्रादि से सेवित, तथा बाघम्बर धारण करने वाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय।
गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय गोक्षीरधारधवलाय नम: शिवाय॥7॥

जिन्होंने भस्म लेप द्वारा श्रृंगार किया हुआ है, जो अति शान्त एवं सुन्दर वन का आश्रय करने वालों (ऋषि, भक्तगण) के आश्रित (वश में) हैं, जिनका श्री पार्वतीजी कटाक्ष नेत्रों द्वारा निरीक्षण करती हैं, तथा जिनका गोदुग्ध की धारा के समान श्वेत वर्ण है, उन शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

आदित्य सोम वरुणानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय।
ऋक्सामवेदमुनिभि: स्तुतिसंयुताय गोपाय गोपनमिताय नम: शिवाय॥8॥

सूर्य, चन्द्र, वरूण और पवन द्वारा सेवित, यज्ञ एवं अग्निहोत्र धूम निवासी, ऋक-सामादि, वेद तथा मुनिजन द्वारा स्तुत्य, नन्दीश्वर द्वारा पूजित, गौओं का पालन करने वाले शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

Friday, February 13, 2015

चाणक्य नीति - अध्याय 5 (Chanakya Neeti in Hindi)


  • द्विजों के लिए अग्नि पूज्य है; अन्य वर्ण के लोगों के लिए ब्राह्मण पूज्य है; पत्नी के लिए पति पूज्य है; और मध्याह्नभोज के समय आने वाला अतिथि सभी के लिए पूज्य है।

  • जिस प्रकार से सोने को घिसकर, काटकर, गरम करके और पीटकर परखा जाता है, उसी प्रकार से व्यक्ति को उसके त्याग, आचरण, गुण तथा व्यवहार से परखा जाता है।

  • भय से तभी तक भयभीत होना चाहिए जब तक भय आने की आशंका हो, किन्तु भय के आ जाने पर निःसंकोच उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

  • जैसे बेर के पेड़ में फले सारे बेर एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार से एक ही गर्भ से और एक ही नक्षत्र में उत्पन्न व्यक्तियों के स्वभाव भी एक जैसे नहीं होते।

  • किसी वस्तु के प्रति आसक्ति नहीं होने पर उस वस्तु का अधिकारी भी नहीं बना जा सकता। वासना का त्याग कर देने वाला श्रृंगार नहीं करता; मूर्ख व्यक्ति मृदुभाषी नहीं होता; और स्पष्ट बात करने वाला धोखा नहीं देता।

  • मूर्ख विद्वान से इर्ष्या करते हैं; दरिद्र धनवान से इर्ष्या करते हैं; बुरे आचरण वाली स्त्री पतिव्रता से इर्ष्या करती हैं; और कुरूप स्त्री सुन्दर स्त्री से इर्ष्या करती हैं।

  • आलस्य से विद्या का नाश होता है; भरोसा कर के दूसरों को दे देने से धन का नाश होता है; लापरवाही से बुआई करने पर बीजों का नाश होता है; और सेनापति के बिना सेना का नाश होता है।

  • विद्या अभ्यास से आती है; कुल का बड़प्पन सुशील स्वभाव से होता है; श्रेष्ठता की पहचान गुणों से होती है; और क्रोध का पता आँखों से चलता है।

  • धर्म की रक्षा धन से होती है; ज्ञान की रक्षा निरन्तर साधना से होती है; राजकोप से मृदु स्वभाव द्वारा रक्षा होती है और घर की रक्षा कर्तव्य परायण गृहणी से होती है।
  • वैदिक पाण्डित्य तथा शास्त्रों के ज्ञान को को व्यर्थ बताने वाले लोग स्वयं व्यर्थ हैं।

  • दान से दारिद्र्य का; सदाचार से दुर्भाग्य का; विवेक से अज्ञान का; और परीक्षण से भय का नाश होता है।

  • काम वासना से बढ़कार कोई रोग नहीं होता; मोह से बढ़कर कोई शत्रु नहीं होता; क्रोध से बढ़कर कोई आग नहीं होता; और ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं होता।

  • व्यक्ति अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही अपने अच्छे बुरे कर्मों को भोगता है और अकेला ही नर्क में जाता है या मोक्ष प्राप्त करता है।

  • ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में स्वर्ग तुच्छ है; पराक्रमी योद्धा की दृष्टि में जीवन तुच्छ है; इन्द्रियों को जीत लेने वाले की दृष्टि में स्त्री तुच्छ है; तत्वज्ञानी की दृष्टि में समस्त संसार तुच्छ है।

  • विदेश में विद्या मित्र है; घर में पत्नी मित्र है; रोगी के लिए औषधि मित्र है; और मरने वाले के लिए धर्म मित्र है।

  • समुद्र होने वाली वर्षा व्यर्थ है; तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है; धनी व्यक्ति को दान देना व्यर्थ है; और दिन में दिया जलाना व्यर्थ है।

  • वर्षा के जल के समान कोई जल नहीं है; आत्मबल के समान कोई बल नहीं है; नेत्र की ज्योति के समान कोई प्रकाश नहीं है; और अन्न के समान कोई सम्पत्ति नहीं है।

  • निर्धन को धन की कामना होती है; पशु को वाणी की कामना होती है; मनुष्य को स्वर्ग की कामना होती है; और देवताओं को मोक्ष की कामना होती है।

  • सत्य से पृथ्वी टिकी है; सत्य से सूर्य प्रकाशित है; सत्य से वायु प्रवाहित होती है; संसार के समस्त पदार्थों में सत्य ही निहित है।

  • लक्ष्मी अस्थिर है; प्राण अस्थिर है; संसार में सिर्फ धर्म ही स्थिर है।
  • पुरुषों में नाई धूर्त होता है; पक्षियों में कौवा धूर्त होता है; पशुओं में गीदड़ धूर्त होता है; और औरतों में मालिन धूर्त होती है।

  • जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला, विद्या प्रदान करने वाला, अन्न देने वाला और भय से मुक्ति दिलाने वाला - ये पाँच पिता कहे गए हैं।
  • राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता तथा स्वयं की माता को माता समझना चाहिए।