एक विचार आया कि क्या मैं एक वर्णिक छंद की रचना कर सकता हूँ? वह भी ब्लोगिंग के ऊपर? आपको पता ही है कि मैं कोई कवि नहीं हूँ। वैसे लेखक, साहित्यकार या पत्रकार भी नहीं हूँ। फिर भी प्रयोग के रूप में एक वर्णिक छंद रचने के प्रयास में जुट गया। सोचा कि गुरु|लघु|लघु मात्राओं याने कि भगण का प्रयोग करते हुए लिखा जाये। गण तो याद है ना आपको? अरे वही जो स्कूल में पढ़ा था "यमाताराजभानसलगा" वाला। चलिये अब तो याद आ ही गया होगा।
तो बनी ये पंक्तियाँ
ब्लोगिंग के गुर सीख लिये हम पोस्ट लिखो कुछ जो हिट होइ जाये।
पाठक आय न आय वहाँ पर ब्लोगर धावत धावत आये॥
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अब यहाँ आकर अटक गया मैं क्योंकि कवि तो हूँ ही नहीं। इसलिये सोचा कि क्यों न आप सभी की सहायता ली जाये। अब आगे पूरा करने के लिये बाकी पंक्तियाँ आपको सुझाना है। पंक्तियों में भगण का ही प्रयोग करना है याने कि शब्दों का चयन ऐसा हो कि क्रम से गुरु|लघु|लघु मात्राएँ ही आयें।
उदाहरण के लिये रसखान का यह छंद पढ़ लीजियेः
धूरि भरे अति शोभित श्याम जु तैसि बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरै अँगना पग पैजनिया कटि पीरि कछौटी॥
वा छवि को रसखान बिलोकत वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी॥
तो बस फिर देर क्या है? शुरू हो जाइये अगली पंक्ति बनाने के लिये।
और हाँ, आपकी इस सहायता के लिये अग्रिम धन्यवाद!
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Wednesday, February 10, 2010
Monday, January 25, 2010
क्या हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ लिखनी खत्म हो जायेंगी?
आज हिन्दी में बहुत सारी कविताएँ लिखी जा रही हैं। एक से बढ़कर एक कवि हैं आज हिन्दी के। हमारे हिन्दी ब्लोगजगत में भी कवि मित्रों की कमी नहीं है। सुन्दर सुन्दर भाव होते हैं उनकी कविताओं में इसीलिये वे पठनीय भी होती हैं। किन्तु अलंकारयुक्त छंदबद्ध रचनाएँ लुप्तप्राय होते जा रही हैं। बहुत ही क्षोभ होता है यह देखकर। गति, यति और लय तो कविता के प्राण हैं किन्तु आज की कविताओं में इन्हीं का अभाव दिखता है।
क्यों आज के कवि छंदबद्ध कविताएँ नहीं लिखते?
क्या हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ लिखनी खत्म हो जायेंगी?
क्यों आज के कवि छंदबद्ध कविताएँ नहीं लिखते?
क्या हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ लिखनी खत्म हो जायेंगी?
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