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Thursday, July 8, 2010

इक समुन्दर ने आवाज दी मुझको पानी पिला दीजिये

पानी का कुछ भी रंग नहीं होता पर जब पानी उतरता है तो बड़ों-बड़ों का रंग उतर जाता है। एक समय था जब पानीदार लोगों की इज्जत हुआ करती थी पर जमाने के फेर ने सबकुछ बदल कर रख दिया और आज पानीदार लोगों की कुछ भी पूछ नहीं रही, उल्टे घाट-घाट के पानी पिये लोगों का ही दबदबा देखने में नजर आता है। आज जिस प्रकार से खरे सोने के गहने के स्थान पर सोने के पानी पिलाये गये गहनों का ही अधिक चलन है उसी प्रकार से आज सच्चे व्यक्ति से अधिक झूठे और बेईमान लोग ही इज्जतदार कहलाते हैं। ये झूठे और बेईमान लोग गरीबों का खून चूस-चूस कर दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करते जाते हैं और गरीब लोग इन्हें पानी पी-पी कर कोसते हैं। कहते हैं किः

निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय।
मुए चाम की साँस से लौह भस्म होइ जाय॥


किन्तु आज के जमाने में तो आह का भी असर नहीं रह गया है।

पानी की महिमा अपरम्पार है। पृथ्वी के लगभग दो तिहाई भाग में पानी ही पानी है। पानी ना हो तो जीवन ही ना हो। किसी भी वयस्क व्यक्ति के शरीर में औसतन 35 से 40 लीटर पानी होता है। यहाँ तक कि हमारी हड्डियों में भी 22 प्रतिशत पानी होता है। मूत्र और पसीने के रूप में प्रतिदिन हमारा शरीर 2.3 से 2.8 लीटर तक पानी का त्याग करता है। हमारे दाँतों में 10 प्रतिशत, त्वचा में 20, मस्तिष्क में 74.5, मांसपेशियों में 75.6, और खून में 83 प्रतिशत पानी होता है। अधिक से अधिक पानी पीना हमारे शरीर के लिये अत्यधिक लाभप्रद है।

पानी ना हो तो दूध वाला भला दूध में क्या मिलायेगा? पानी ना होता तो "दूध का दूध और पानी का पानी" मुहावरा भी ना होता। पानी ना होता तो यह श्लोक भी ना बनताः

हंसो शुक्लः बको शुक्लः को भेदो बक हंसयो?
नीर-क्षीर विभागे तु हंसो हंसः बको बकः॥


कठोपनिषद में कहा गया है "राजहंस नीर-क्षीर विवेक में निपुण होता है तथा नीर को त्यागकर क्षीर (दुग्ध) को ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार धीर पुरुष प्रेय को त्यागकर श्रेय का वरण कर लेता है।"
पानी ना होता तो रहीम ना कहतेः

रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।
पानी गये ना ऊबरे मोती मानुस चून॥


पानी ना होता तो कारे-कजरारे मेघ ना बनते, घटायें नहीं छातीं और हमारे फिल्मों की नायिकाएँ "जा रे जा रे ओ कारे बदरिया..", "कारे बदरा तू ना जा ना जा..", "मेघा छाये आधी रात.." आदि गाने भी ना गा पातीं। बादल की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक ना होती। कवि 'सेनापति' को यह लिखने का अवसर ही ना मिलता किः

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै॥
सेनापति आवन कह्यों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर जोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै॥


पानी को जल, सलिल, नीरज, नीरद आदि के नाम से भी जाना जाता है और पानी के इन समानार्थी शब्दों का प्रयो प्रायः काव्य के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिये किया जाता है, जैसे किः

  • नयन नीर पुलकित अति गाता।
  •  कबिरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।
  •  प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे।
  •  मालव धरती गहन गंभीर पग पग रोटी डग डग नीर।
कभी प्यासे को पानी पिलाना पुण्य का कार्य माना जाता था। आज से सिर्फ पचीस-तीस, कम से कम हमारे देश में, कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पानी भी बिकने लगेगा। धन्य हैं वे लोग जो पानी को भी बेच कर स्वयं की और देश की तरक्की कर रहे हैं।

Monday, April 19, 2010

कहाँ गईं वो घड़ों-सुराहियों की दूकानें

गर्मी की शुरुवात होते ही घड़ों-सुराहियों की दूकानें दिखनी शुरू हो जाती थीं किन्तु आज इन दूकानों को खोजना पड़ता है। मिट्टी के घड़ों में शीतल किये गये सोंधी-सोंधी मनभावन गंध लिये हुए पानी का स्वाद ही निराला होता था जो किसी भी प्यासे को तृप्त कर देता था। आज फ्रिज, वाटरकूलर आदि के प्रयोग ने इन घड़ों-सुराहियों की दूकानों को विलुप्तप्राय कर दिया है।

स्कूल के जमाने में पढ़े "किस्सा हातिमताई" का उद्धरण याद आता है कि सवाल का जवाब खोजते-खोजते यवन के शहजादे हातिम को भारत आना पड़ जाता है और प्यास लगने पर पानी माँग करने पर उसे दूध का गिलास थमा दिया जाता है जिससे उसके मुख से बरबस निकल जाता है कि धन्य है यह देश जहाँ प्यासे को पानी की जगह दूध पिलाया जाता है।

प्यासे की प्यास बुझाने को हमारी संस्कृति में बहुत महान और पुण्य का कार्य माना गया है। किन्तु आज के इस बाजारवाद ने हमारी मानसिकता को इस प्रकार से बदल दिया है कि हम अपनी संस्कृति को पूरी तरह से भूल गये हैं और पानी बेचने की चीज बन गई है। पानी को पॉलीथीन पैकेट और बोतलों में बंद करके बेचने के कार्यरूप राक्षस ने ही परम्परागत कुम्भकारों की घड़ों-सुराहियों की दूकानों को निगल डाला है।

भारत जैसे देश में पानी को बेचना ही घिनौना कार्य है पर यहाँ तो लोग प्यासों की मजबूरी का फायदा उठा कर पानी की अधिक से अधिक कीमत वसूल कर रहे हैं। जलपानगृहों और भोजनालयों में जानबूझ कर घड़े नहीं रखे जाते ताकि पैकेज्ड पानी की अधिक से अधिक बिक्री हो।

पता नहीं हमारी यह आधुनिकता की अंधी दौड़ हमें पतन के गर्त में और कितनी गहराई तक ले जायेगी?

Friday, February 19, 2010

प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे

नीर अर्थात् सलिल, नीरद, नीरज, जल या पानी! यह नीर कभी नयन से बरसता है तो कभी मेघ से बरसता है। नयन से नीर जहाँ गम में बरसता है वहीं खुशी में भी बरसता है। प्रियतम के विरह में प्रियतमा कहने लगती हैः

प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे

तो दूसरी ओर तुलसीदास जी कहते हैं:

नयन नीर पुलकित अति गाता

यह नीर जिस किसी के संसर्ग में आता है उसे निर्मल कर देता है। इसीलिये कबीर कहते हैं:

कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर

रहीम कहते हैं कि इस नीर याने कि पानी के बिना उबरना मुश्किल हैः

पानी गये न ऊबरे मोती मानुस चून

विचित्र है पानी की महिमा! कभी पानी पिलाना पुण्य का काम होता था पर आज पानी बेचना कमाई का काम है। आज के जमाने में आगे बढ़ना है तो दूसरों का पानी उतारते रहिये।