"लाख समझाओ इनको पर नतीजा 'वही ढाक के तीन पात'। फिर बैठ गये आप कम्प्यूटर के सामने?" श्रीमती जी बोलीं।
"अरे भई, हम हैं रिटायर्ड आदमी! ब्लोग ना पढ़ें और पोस्ट-टिप्पणियाँ ना लिखें तो समय कैसे कटे? 'खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में धरे'।" हमारा उत्तर था।
"सब्जी लेने जाने में भी समय कटता है इसलिये अब थोड़ा समय सब्जी लेने जाकर भी काटिये। अगर आप सब्जी लेने नहीं गये तो इस कम्प्यूटर को उठा कर फेंक दूँगी, 'ना नौ मन तेल होगा ना राधा रानी नाचेगी'।"
"सब्जी लेने के लिये अपने सुपुत्र को क्यों नहीं भेजती? अभी तक सोये पड़े हैं नवाबजादे, 'काम के ना काज के दुश्मन अनाज के'।"
"अच्छा, अब लड़के का आराम करना भी नहीं देखा जाता आपसे? आज आपकी नजरों में यह निठल्ला हो गया है, जब इसका जन्म हुआ था तो कहते थे 'पूत के पाँव पालने में नजर आते हैं'।"
"अच्छा भाई बहुत बड़ा सपूत है तुम्हारा लड़का! 'अपने पूत को भला कोई काना कहता है?', अब उसे उठाकर सब्जी लाने के लिये कहो।"
"नहीं जायेगा लड़का। आप को ही जाना पड़ेगा। जब देखो उसे ही काम में जोतने के लिये उतारू रहते हैं। कभी उसकी भलाई का भी सोचा है आपने? अपनी सारी कमाई भाई-बहनों को झोंक दिया, एक पैसा तो बचा कर रखा नहीं है उसके लिये।"
"क्यों, क्या वो अपने पैरों पर खुद खड़े होने के काबिल नहीं है? हमारे ही पिताजी ने हमारे लिये क्या छोड़ा था? फिर भी हमने क्या कमी की तुम्हें खुश रखने के लिये? 'पूत सपूत तो का धन संचय? पूत कपूत तो का धन संचय?'।"
"हाँ हाँ, बहुत खुश रखा है आपने मुझे! तन में ना कोई गहना और तीज-त्यौहार में ना कोई अच्छा कपड़ा। मेरे तो करम फूटे थे जो आपके पल्ले पड़ी। करमजली ना होती तो आपके साथ शादी के पहले जिस रईस की औलाद से मेरी शादी की बात चल रही थी उसी के साथ मेरी शादी ना हो गई होती? पर 'अपने किये का क्या इलाज'? आपकी बहन की बातों के चक्कर में आकर मैंने ही मना कर दिया था उससे शादी करने के लिये।
"अरे अभी तो लड़के से सब्जी मँगवा लो, शाम को मैं बाजार जाउँगा तो तुम्हारे लिये बढ़िया मेकअप का सामान लेते आउँगा।" हमने श्रीमती जी को खुश करने के उद्देश्य से कहा।
"हाय राम! अब क्या इस उमर में मैं मेकअप करूँगी?"
"क्यों, जूता जब पुराना होता है तभी तो पालिश की जरूरत पड़ती है।"
"क्या कहा?"
"अरे कुछ नहीं भई ..."
"क्या कुछ नहीं भई?"
"वो तो जरा ऐसे ही ..."
"क्या ऐसे ही?"
"वो जरा दिल की भड़ास निकल गई थी।" कहकर हमने श्रीमती जी को कुछ और सोचने और बोलने का मौका दिये बगैर जल्दी से कहा, "लाओ थैला दो, जा रहा हूँ सब्जी लेने के लिये।"
भुनभुनाते हुए वे थैला लाने चली गईं और हम अपनी आधी लिखी पोस्ट को सेव्ह करके कम्प्यूटर शटडाउन करने में लग गये।
Showing posts with label हास्य. Show all posts
Showing posts with label हास्य. Show all posts
Thursday, April 22, 2010
Saturday, April 17, 2010
चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा
ट्रेन चली जा रही थी। फर्स्ट क्लास के एक कूपे में चार लोग बैठे थे - एक अधेड़ महिला, एक खूबसूरत युवती, एक अपने देश का युवक और एक पड़ोसी देश का युवक।
चारों एक दूसरे के लिये बिल्कुल अपरिचित।
रास्ते में एक टनल आया। पता नहीं इलेक्ट्रिक सिस्टम में क्या खराबी थी कि बिजली का बल्ब जला नहीं। कूपे में घुप्प अंधेरा छा गया। हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था।
अपने देश के युवक को एक शरारत सूझी। उसने अपने बायें हाथ को जोरदार चुम्मी की आवाज करते हुए चूमा और दायें हाँथ से पड़ोसी देश के युवक के गाल पर एक जोर का झापड़ दन्ना दिया।
कूपे के बाकी लोगो ने चूमने की और झापड़ पड़ने की आवाज को सुना और उसी के विषय में सोचने लगे।
अधेड़ औरत ने सोचा इनकी तो छेड़-छाड़ की उमर ही है। यदि लड़के ने मौके का फायदा उठा कर युवती को चूम ही लिया तो इतने जोर से झापड़ तो नहीं मारना चाहिये था।
युवती ने सोचा पता नहीं इनमें से किस युवक ने अधेड़ महिला को चूमा है। पर जिसने भी चूमा है अवश्य ही बहुत बड़ा बेवकूफ है। मेरे जैसी खुबसूरत लड़की को छोड़कर अधेड़ औरत को चूमेगा तो झापड़ तो पड़ेगा ही।
और पड़ोसी देश के युवक ने सोचा क्या अन्याय है। चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा।
इसी को कहते हैं मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना!
चारों एक दूसरे के लिये बिल्कुल अपरिचित।
रास्ते में एक टनल आया। पता नहीं इलेक्ट्रिक सिस्टम में क्या खराबी थी कि बिजली का बल्ब जला नहीं। कूपे में घुप्प अंधेरा छा गया। हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था।
अपने देश के युवक को एक शरारत सूझी। उसने अपने बायें हाथ को जोरदार चुम्मी की आवाज करते हुए चूमा और दायें हाँथ से पड़ोसी देश के युवक के गाल पर एक जोर का झापड़ दन्ना दिया।
कूपे के बाकी लोगो ने चूमने की और झापड़ पड़ने की आवाज को सुना और उसी के विषय में सोचने लगे।
अधेड़ औरत ने सोचा इनकी तो छेड़-छाड़ की उमर ही है। यदि लड़के ने मौके का फायदा उठा कर युवती को चूम ही लिया तो इतने जोर से झापड़ तो नहीं मारना चाहिये था।
युवती ने सोचा पता नहीं इनमें से किस युवक ने अधेड़ महिला को चूमा है। पर जिसने भी चूमा है अवश्य ही बहुत बड़ा बेवकूफ है। मेरे जैसी खुबसूरत लड़की को छोड़कर अधेड़ औरत को चूमेगा तो झापड़ तो पड़ेगा ही।
और पड़ोसी देश के युवक ने सोचा क्या अन्याय है। चूमा सामने वाले ने और झापड़ मुझे खाना पड़ा।
इसी को कहते हैं मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना!
Monday, October 19, 2009
बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है
एक आदमी मर गया। यमदूत लेने के लिये नहीं आये। उसकी आत्मा बेचारी भटक रही थी। भटकते भटकते आत्मा एक ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ पर दो बड़े बड़े दरवाजे थे। एक पर लिखा था स्वर्ग और दूसरे पर नर्क। उसने स्वर्ग वाला दरवाजा खटखटाया।
द्वारपाल ने दरवाजा खोल कर पूछा, "क्या चाहते हो?"
आत्मा ने कहा, "भीतर आना है।"
द्वारपाल ने फिर पूछा, "शादी की थी तुमने?"
"हाँ की थी।"
"तो भीतर आ जाओ भाई, नर्क तो तुम पहले ही भोग चुके हो।"
कहकर द्वारपाल ने उसे भीतर जाने दिया। पीछे एक और आत्मा खड़ी थी और पूरी वार्तालाप सुन रही थी।
पहली आत्मा के भीतर जाने पर दूसरी आत्मा ने द्वारपाल से कहा, "मैंने दो शादी की थी।"
"बाजू के दरवाजे में जाओ, बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है।" कहकर द्वारपाल ने दरवाजा बंद कर दिया।
द्वारपाल ने दरवाजा खोल कर पूछा, "क्या चाहते हो?"
आत्मा ने कहा, "भीतर आना है।"
द्वारपाल ने फिर पूछा, "शादी की थी तुमने?"
"हाँ की थी।"
"तो भीतर आ जाओ भाई, नर्क तो तुम पहले ही भोग चुके हो।"
कहकर द्वारपाल ने उसे भीतर जाने दिया। पीछे एक और आत्मा खड़ी थी और पूरी वार्तालाप सुन रही थी।
पहली आत्मा के भीतर जाने पर दूसरी आत्मा ने द्वारपाल से कहा, "मैंने दो शादी की थी।"
"बाजू के दरवाजे में जाओ, बेवकूफों के लिये यहाँ कोई जगह नहीं है।" कहकर द्वारपाल ने दरवाजा बंद कर दिया।
Monday, September 14, 2009
पप्पू ने छुए पैर माता पिता के
पप्पू अपने तीन चार मित्रों के साथ हमारे पास आकर बोला, "अंकल जी, आप हमें कुछ हिन्दी पढ़ाया कीजिए ना।"
हम खुश हुए कि चलो अपने मातृभाषा के प्रति बच्चों में रूचि तो जाग रही है। पढ़ाने के लिए तत्काल राजी हो गए और बोले, "ठीक है, कल से हम रोज सुबह आठ बजे से तुम लोगों को पढ़ाया करेंगे।" फिर सोचा चलो लगे हाथ हिन्दी के साथ ही साथ थोड़ी सी संस्कार की भी शिक्षा दे दें इसलिए यह भी जोड़ दिया, "पर तुम लोगों को रोज सुबह अपने माता पिता के पैर छूने होंगे।"
दूसरे दिन सुबह आठ बजे सभी पहुँच गए हमारे पास। हमने पूछा, "क्यों पैर छुए तुम लोगों ने अपने माता पिता के?"
कुछ बच्चों ने कहा कि वे भूल गए और कुछ ने नजरें नीची कर लीं पर पप्पू ने अकड़ते हुए कहा, "हाँ अंकल जी, मैंने छुए हैं पैर अपनी मम्मी पापा के।"
" तब तो वे बहुत खुश हुए होंगे।" हम भी खुश हो कर बोले।
"उन्हें पता ही कहाँ चला अंकल जी, मैं तो मुँह अंधेरे ही उठ गया था और जब मम्मी पापा सो रहे थे तभी चुपके से पैर छू लिए उनके। अब आप ही सोचिए कि यदि वे देख लेते तो मुझे कितना इंसल्टिंग फील होता?"
चलते चलते
एक आदमी दौड़ा जा रहा था और दूसरा उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भाग रहा था। लोगों को जानने की उत्सुकता हुई कि आखिर मामला क्या है। पहला आदमी तो आगे निकल गया पर दूसरे को लोगों ने पकड़ लिया और पूछा कि क्या मामला है। उसने कहा कि कुछ नहीं आपस का मामला है। पर लोगों की उत्सुकता शान्त नहीं हुई। बोले जब तक सच्ची बात नहीं बताएगा हम तुझे छोड़ेंगे नहीं। हार कर उसने बताया, "स्साला, अपनी पोस्ट पढ़वा लिया और मेरी पोस्ट पढ़ने की बारी आई तो भाग रहा है।"
हम खुश हुए कि चलो अपने मातृभाषा के प्रति बच्चों में रूचि तो जाग रही है। पढ़ाने के लिए तत्काल राजी हो गए और बोले, "ठीक है, कल से हम रोज सुबह आठ बजे से तुम लोगों को पढ़ाया करेंगे।" फिर सोचा चलो लगे हाथ हिन्दी के साथ ही साथ थोड़ी सी संस्कार की भी शिक्षा दे दें इसलिए यह भी जोड़ दिया, "पर तुम लोगों को रोज सुबह अपने माता पिता के पैर छूने होंगे।"
दूसरे दिन सुबह आठ बजे सभी पहुँच गए हमारे पास। हमने पूछा, "क्यों पैर छुए तुम लोगों ने अपने माता पिता के?"
कुछ बच्चों ने कहा कि वे भूल गए और कुछ ने नजरें नीची कर लीं पर पप्पू ने अकड़ते हुए कहा, "हाँ अंकल जी, मैंने छुए हैं पैर अपनी मम्मी पापा के।"
" तब तो वे बहुत खुश हुए होंगे।" हम भी खुश हो कर बोले।
"उन्हें पता ही कहाँ चला अंकल जी, मैं तो मुँह अंधेरे ही उठ गया था और जब मम्मी पापा सो रहे थे तभी चुपके से पैर छू लिए उनके। अब आप ही सोचिए कि यदि वे देख लेते तो मुझे कितना इंसल्टिंग फील होता?"
चलते चलते
एक आदमी दौड़ा जा रहा था और दूसरा उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भाग रहा था। लोगों को जानने की उत्सुकता हुई कि आखिर मामला क्या है। पहला आदमी तो आगे निकल गया पर दूसरे को लोगों ने पकड़ लिया और पूछा कि क्या मामला है। उसने कहा कि कुछ नहीं आपस का मामला है। पर लोगों की उत्सुकता शान्त नहीं हुई। बोले जब तक सच्ची बात नहीं बताएगा हम तुझे छोड़ेंगे नहीं। हार कर उसने बताया, "स्साला, अपनी पोस्ट पढ़वा लिया और मेरी पोस्ट पढ़ने की बारी आई तो भाग रहा है।"
Tuesday, September 8, 2009
कुत्ते से क्या बदला लेना कुत्ते ने गर काटा

विचित्र प्राणी होता है कुत्ता। ऊपर वाले ने विशेष तौर पर रचा है इसे, इंसान याने कि मनुष्य के सहायक के रूप में। कुत्ते वहीं पाये जाते हैं जहाँ इंसान रहते हैं। जंगली कुत्ते नहीं पाये जाते क्योंकि कुत्ता इंसान के बिना रह ही नहीं सकता।
कुत्ता एक वफादार प्राणी होता है। एक बार टुकड़ा डाल दो और यह आपका वफादार बन जाता है। बाद में कभी टुकड़ा नहीं भी डालोगे तो भी यह जीवनपर्यन्त आपका वफादार बना रहता है। वैसे तो टुकड़ा पाकर वफादार बनने की प्रवृति इंसान में भी पाई जाती है पर जब तक टुकड़ा डालते रहो तभी तक इंसान वफादार रहता है। टुकड़ा डालना बंद और इंसान का गुर्राना शुरू।
इंसान अपने इस सहायक का भरपूर फायदा उठाता है। प्रायः इन्सान सत्ता प्राप्त करने के लिए कुत्तों की पूरी पूरी सहायता लेता है और यदा-कदा सत्ता को बनाए रखने के लिए खुद ही कुत्ता बन जाता है। कभी कभी मन में सवाल उठने लगता है कि क्या सत्ता और कुत्ता एक दूसरे के पूरक हैं? खैर हों तो क्या और न हों तो क्या! हमें क्या लेना देना है। हमें तो सत्ता मिलने से रही।
अक्सर लोग भ्रष्ट नेता और अफसरों को कुत्ता कह देते हैं। पर जरा सोचिये कि ऐसे लोगों को किसने अधिकार दे दिया इस तरह से कुत्तों का अपमान करने का? कभी किसी कुत्ते ने इन पर मानहानि का दावा कर दिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे।
वैसे तो कुत्ता इंसान को काटता नहीं, वह अच्छी तरह से समझता है कि जब भौंकने से ही काम चल जाता है तो फिर काटा क्यों जाए। पर परिस्थितिवश यदि कभी कुत्ता इंसान को काट दे तो इंसान उसे उलटे काट कर बदला भी नहीं ले सकता। इसीलिए एक फिल्मी गीत में कहा गया है "कुत्ते से क्या बदला लेना कुत्ते ने गर काटा, कुत्ते को गर तुमने काटा क्या थूका क्या चाटा"।
कुत्तों में इंसान नहीं पाये जाते पर इंसानों में कुत्ते अवश्य पाये जाते हैं। अब इस बात का और अधिक खुलासा क्या करना कि कहाँ और कैसे पाये जाते हैं। हमरे सुधी पाठक स्वयं समझदार हैं।
कुत्ता योनि एक महान योनि है। इसकी महानता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जब धर्म को अपना रूप बदलने की नौबत आई थी तो उन्होंने कुत्ते के रूप को ही सर्वथा उचित समझा था। जब से धर्म ने कुत्ते का रूप धारण किया था तब से आज तक कुछ कुत्ते स्वयं धर्म नहीं तो कम से कम धर्म का मर्मज्ञ तो अवश्य ही समझते हैं। एक बार हमने कुत्तों के धर्मगुरु को टुकड़ा डाल दिया था। बस वह हमारा वफादार बन गया और कुत्तों ने जो बातें आज तक किसी को नहीं बताई थीं उन्हें भी हमें बता दिया। उसने हमें बताया कि कुत्तों में भी कुत्ताचार्य होते हैं जो अलग अलग सूत्रों की व्याख्या अपने अपने हिसाब से करते हैं। कुत्तों के धर्मग्रंथ श्वानस्मृतिरान में एक सूत्र है - "स्वा-भौं मी-भौं सर्व-भौं स्य-भौं"। कुत्ताचार्य लोग इस सूत्र का अपने अपने हिसाब से अर्थ लगाते हैं ठीक 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता' की तरह। कुछ कुत्ताचार्य के अनुसार इसका अर्थ है "स्वामी ही सर्वस्य है" और कुछ के अनुसार "स्वामी ही सर्वस्य नहीं है"। खैर छोड़िये धर्म की बात को। जब कुत्तों की बात चल रही है तो उसे ही जारी रखा जाये।
वैसे तो कुत्तों के बहुत से प्रकार हैं पर मुख्य प्रकार दो ही हैं विदेशी नस्ल का कुत्ता और देसी कुत्ता। भारत में विदेशी नस्ल के कुत्तों को चाव से पाला जाता है, इंसान को दो रोटी मिले न मिले पर विदेशी कुत्तों को मँहगे बिस्किट्स जरूर मिलते हैं। देसी कुत्तों को प्रायः आवारा छोड़ दिया जाता है और ये घूरों में से अपना भोजन खोज कर अपना जीवनयापन करते हैं। हम भारतीयों की यह महान परम्परा रही है कि हम विदेशी चीजों को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और देसी चीजों को हेय समझते हैं। चाहे कुत्ता हो या भाषा विदेशी ही श्रेष्ठ समझा जाता है।
और अन्त में सिर्फ इतना बता कर इस पोस्ट को समाप्त करते हैं किः
एक बार हमने ससुराल में अपने साले से कहा, "यार, म्युनिसिपालिटी वालों से कह कर तुम अपनी गली के इन कुत्तों को मरवा क्यों नहीं देते?" तो उसने पूछा, "वो क्यों जीजाजी?" हमने उसे बताया, "अरे भइ, जब भी मैं तुम्हारे यहाँ आता हूँ तो ये कुत्ते मुझे देखते ही भौंकने लगते हैं।" इस पर साले महोदय ने कहा, "होता है जीजाजी होता है, जब भी कोई दूसरे गली का इस गली में आता है..........।"
Monday, September 7, 2009
क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को दो लात
सबेरे की चाय पीने के बाद कम्प्यूटर चालू करके एक दो टिप्पणी की ही थी कि मित्र महोदय आ पहुँचे। कानों में इयरफोन ठुँसा हुआ था। चेहरे पर मग्नता के भाव और मुंडी हिलती हुई। शायद संगीत का आनन्द ले रहे थे।
मैंने उनके स्वागत में कहा, "आओ, आओ! बैठो।"
"क्याऽऽऽ?" वो इतने जोर से बोले जैसे मैं बहरा हूँ।
मैंने भी जोर से चिल्ला कर कहा, "अरे बैठो भाई।"
कुर्सी पर बैठकर मुंडी डुलाते वे हुए मुझसे भी ज्यादा जोर से बोले, "और सुनाओ क्या हाल है?"
उनकी आवाज से मेरे कान झन्ना गए। आपने भी अवश्य ही कई बार अनुभव किया होगा कि यदि किसी के कानों में इयरफोन ठुँसा हो तो वह सामने वाले से कैसे ऊँची आवाज में बात करता है।
मैंने उनके कानों से इयरफोन खींच कर निकाल दिया और कहा, "इतने जोर से चिल्लाकर क्यों बोल रहे हो? क्या मैं बहरा हूँ?"
"मैं कहाँ चिल्ला रहा हूँ?"
"अरे चिल्ला रहे थे यार तुम। इयरफोन लगा कर खुद तो बहरे बन गए थे पर समझने के लिये मुझे बहरा समझ रहे थे।"
"हे हे हे हे, चलो मैं बहरा बन गया था तो तुम तो अन्धे नहीं थे ना?"
"अबे क्या बोल रहा है? मैं भला क्यों अन्धा होने लगा?"
"भइ बहरे के साथ अन्धे का होना जरूरी है इसीलिए तो कहावत बनी है 'अंधरा पादे बहरा जोहारे', है कि नहीं?"
मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो फिर बोल उठे, "अच्छा एक बात बता यार, कहावत के अनुसार बहरे के साथ अंधा होना चाहिए और वो दोस्ती वाली कहानी के अनुसार अन्धे के साथ लंगड़ा होना चाहिये। ये आखिर बहरे के साथ बहरा, अन्धे के साथ अन्धा या लंगड़े के साथ लंगड़ा क्यों नहीं होता?"
अब आप ही बताइये कि मैं इस प्रश्न का उन्हें क्या जवाब दूँ? मैंने भी कह दिया, "इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा होने पर न तो कोई कहावत बन सकती है और न ही कोई कहानी।"
वो बोले, "यार, कह तो रहे हो सही, मगर गलत है।"
"अबे जब सही कह रहा हूँ तो गलत कैसे होगा?"
"ये सब बड़े लोगों की बाते हैं, तू नहीं समझेगा। खैर, ये बता कि बच्चों का क्या हाल है?"
"ठीक ही होंगे।" मैंने जवाब दिया।
"होंगे? होंगे से क्या मतलब? क्या तेरी उनसे मुलाकात नहीं होती?"
"होती है भइ, हर दो-तीन दिन में आते हैं हमारे पास। जब भी उन्हें कभी मोबाइल रिचार्ज और टॉपअप कराने, गाड़ी में पेट्रोल डलाने और उसकी सर्व्हिसिंग कराने, दोस्तों को पार्टी देने जैसे कामों के लिए रुपयों की जरूरत पड़ती है तो याद आ जाती है हमारी। चल छोड़, ये छोटे लोगों की बाते हैं, इसे तू नहीं समझेगा।"
"अच्छा भाभी जी कैसी हैं?"
"वो भी अच्छी हैं, भाई क्यों अच्छी नहीं होंगी? आज से तीस-पैतीस साल पहले जैसी अच्छी हुआ करती थीं उतनी अच्छी तो अब नहीं हैं पर फिर भी अच्छी ही हैं।" मैंने कहा।
अचानक मुझे कुछ याद आया और वो कुछ और बोलें उसके पहले ही मैंने कहा, "सुना है कि मेरे बारे में तू लोगों से कहता फिरता है कि 'लिखता क्या है, अपने आपको ब्लोगर शो करता है'।"
"तो क्या गलत कहता हूँ मैं? तू खुद ही बता तू कोई ब्लोगर है? सींग कटा के बछड़ों में शामिल हो जाने से भला क्या कोई ब्लोगर हो जाता है? क्या ये सच नहीं है कि तू अपने लिखे कूड़े को जबरन नेट में डाल रहा है! अबे सच का सामना कर! बोल हाँ।"
थोड़ी शर्मिंदगी के साथ मैं बोला, "यार बहुत कोशिश करता हूँ कि कुछ अच्छा लिख पाऊँ, अब अच्छा लिख ही नहीं पाता तो मैं क्या करूँ?"
"चल बेटा मैं तुझे बताता हूँ कि तू अच्छा क्यों नहीं लिख सकता। तू भी क्या याद करेगा! तू अच्छा इसलिए नहीं लिख पाता क्योंकि तू अतीत में जीता है, पुरानी बातों को अच्छा बताने की कोशिश में पुरानी घिसी-पिटी बातें ही लिखता है। तुझे पता नहीं है कि पुरानी बातों को कोई भी पसंद नहीं करता। लिखना है तो कुछ नई लिख जैसे कि मैं लिखता हूँ।"
"अच्छा बता तूने ऐसा क्या लिखा है जिसमें नयापन है?"
"मैंने लिखा है 'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को दो लात', बोल है ना नई चीज?"
"क्या नया है इसमें? तू तो पुराना दोहा बता रहा है और वो भी गलत। सही है - 'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात'।"
अब वे हत्थे से उखड़ गए और बोले, "बस यहीं पर तो मात खाता है तू। समझ तो सकता नहीं और शो करता है कि बहुत अकलमंद है। अगर मैंने चार चरण का दोहा लिखा होता तो वो पुरानी चीज होती पर मैंने तो दो चरण का दोहा लिखा है जो कि बिल्कुल नई चीज है।"
"पर तेरी इस नई चीज का मतलब क्या हुआ?"
"इसका मतलब है कि यदि पॉवरफुल याने कि बड़ा आदमी गलती करे तो उसे क्षमा कर देना चाहिए और छोटा आदमी गलती करे तो उसे दो लात मारना चाहिए। समझे? आज जो हो रहा है वह लिख, आज यही हो रहा है। अडवानी और जसवन्त के मामले में क्या हुआ बोल?"
हमें इतना ज्ञान देकर वे चले गये और हम अपना पोस्ट लिखने बैठ गये।
मैंने उनके स्वागत में कहा, "आओ, आओ! बैठो।"
"क्याऽऽऽ?" वो इतने जोर से बोले जैसे मैं बहरा हूँ।
मैंने भी जोर से चिल्ला कर कहा, "अरे बैठो भाई।"
कुर्सी पर बैठकर मुंडी डुलाते वे हुए मुझसे भी ज्यादा जोर से बोले, "और सुनाओ क्या हाल है?"
उनकी आवाज से मेरे कान झन्ना गए। आपने भी अवश्य ही कई बार अनुभव किया होगा कि यदि किसी के कानों में इयरफोन ठुँसा हो तो वह सामने वाले से कैसे ऊँची आवाज में बात करता है।
मैंने उनके कानों से इयरफोन खींच कर निकाल दिया और कहा, "इतने जोर से चिल्लाकर क्यों बोल रहे हो? क्या मैं बहरा हूँ?"
"मैं कहाँ चिल्ला रहा हूँ?"
"अरे चिल्ला रहे थे यार तुम। इयरफोन लगा कर खुद तो बहरे बन गए थे पर समझने के लिये मुझे बहरा समझ रहे थे।"
"हे हे हे हे, चलो मैं बहरा बन गया था तो तुम तो अन्धे नहीं थे ना?"
"अबे क्या बोल रहा है? मैं भला क्यों अन्धा होने लगा?"
"भइ बहरे के साथ अन्धे का होना जरूरी है इसीलिए तो कहावत बनी है 'अंधरा पादे बहरा जोहारे', है कि नहीं?"
मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो फिर बोल उठे, "अच्छा एक बात बता यार, कहावत के अनुसार बहरे के साथ अंधा होना चाहिए और वो दोस्ती वाली कहानी के अनुसार अन्धे के साथ लंगड़ा होना चाहिये। ये आखिर बहरे के साथ बहरा, अन्धे के साथ अन्धा या लंगड़े के साथ लंगड़ा क्यों नहीं होता?"
अब आप ही बताइये कि मैं इस प्रश्न का उन्हें क्या जवाब दूँ? मैंने भी कह दिया, "इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा होने पर न तो कोई कहावत बन सकती है और न ही कोई कहानी।"
वो बोले, "यार, कह तो रहे हो सही, मगर गलत है।"
"अबे जब सही कह रहा हूँ तो गलत कैसे होगा?"
"ये सब बड़े लोगों की बाते हैं, तू नहीं समझेगा। खैर, ये बता कि बच्चों का क्या हाल है?"
"ठीक ही होंगे।" मैंने जवाब दिया।
"होंगे? होंगे से क्या मतलब? क्या तेरी उनसे मुलाकात नहीं होती?"
"होती है भइ, हर दो-तीन दिन में आते हैं हमारे पास। जब भी उन्हें कभी मोबाइल रिचार्ज और टॉपअप कराने, गाड़ी में पेट्रोल डलाने और उसकी सर्व्हिसिंग कराने, दोस्तों को पार्टी देने जैसे कामों के लिए रुपयों की जरूरत पड़ती है तो याद आ जाती है हमारी। चल छोड़, ये छोटे लोगों की बाते हैं, इसे तू नहीं समझेगा।"
"अच्छा भाभी जी कैसी हैं?"
"वो भी अच्छी हैं, भाई क्यों अच्छी नहीं होंगी? आज से तीस-पैतीस साल पहले जैसी अच्छी हुआ करती थीं उतनी अच्छी तो अब नहीं हैं पर फिर भी अच्छी ही हैं।" मैंने कहा।
अचानक मुझे कुछ याद आया और वो कुछ और बोलें उसके पहले ही मैंने कहा, "सुना है कि मेरे बारे में तू लोगों से कहता फिरता है कि 'लिखता क्या है, अपने आपको ब्लोगर शो करता है'।"
"तो क्या गलत कहता हूँ मैं? तू खुद ही बता तू कोई ब्लोगर है? सींग कटा के बछड़ों में शामिल हो जाने से भला क्या कोई ब्लोगर हो जाता है? क्या ये सच नहीं है कि तू अपने लिखे कूड़े को जबरन नेट में डाल रहा है! अबे सच का सामना कर! बोल हाँ।"
थोड़ी शर्मिंदगी के साथ मैं बोला, "यार बहुत कोशिश करता हूँ कि कुछ अच्छा लिख पाऊँ, अब अच्छा लिख ही नहीं पाता तो मैं क्या करूँ?"
"चल बेटा मैं तुझे बताता हूँ कि तू अच्छा क्यों नहीं लिख सकता। तू भी क्या याद करेगा! तू अच्छा इसलिए नहीं लिख पाता क्योंकि तू अतीत में जीता है, पुरानी बातों को अच्छा बताने की कोशिश में पुरानी घिसी-पिटी बातें ही लिखता है। तुझे पता नहीं है कि पुरानी बातों को कोई भी पसंद नहीं करता। लिखना है तो कुछ नई लिख जैसे कि मैं लिखता हूँ।"
"अच्छा बता तूने ऐसा क्या लिखा है जिसमें नयापन है?"
"मैंने लिखा है 'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को दो लात', बोल है ना नई चीज?"
"क्या नया है इसमें? तू तो पुराना दोहा बता रहा है और वो भी गलत। सही है - 'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात'।"
अब वे हत्थे से उखड़ गए और बोले, "बस यहीं पर तो मात खाता है तू। समझ तो सकता नहीं और शो करता है कि बहुत अकलमंद है। अगर मैंने चार चरण का दोहा लिखा होता तो वो पुरानी चीज होती पर मैंने तो दो चरण का दोहा लिखा है जो कि बिल्कुल नई चीज है।"
"पर तेरी इस नई चीज का मतलब क्या हुआ?"
"इसका मतलब है कि यदि पॉवरफुल याने कि बड़ा आदमी गलती करे तो उसे क्षमा कर देना चाहिए और छोटा आदमी गलती करे तो उसे दो लात मारना चाहिए। समझे? आज जो हो रहा है वह लिख, आज यही हो रहा है। अडवानी और जसवन्त के मामले में क्या हुआ बोल?"
हमें इतना ज्ञान देकर वे चले गये और हम अपना पोस्ट लिखने बैठ गये।
Subscribe to:
Posts (Atom)