Friday, August 21, 2009

आज मन ठीक नहीं है

कभी-कभी अकारण ही मन उदास हो जाता है। ऐसा मेरे साथ ही नहीं, सभी के साथ होता है। आपने भी अवश्य ही कभी ऐसा महसूस किया होगा। इसके विपरीत कभी-कभी बिना किसी कारण के मन प्रफुल्लित भी होता है। जब मनुष्य प्रफुल्लित होता है तो वह प्रायः आगत के विषय में सोचता है और जब उदास होता है बरबस ही विगत उसकी आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगता है। फिर मेरे जैसे उम्रदराज आदमी के लिये तो अतीत का स्मरण बहुत ही आनन्ददायक होता है। वृद्ध लोगों को अतीत की याद करना और वर्तमान में नुक्स निकालना बहुत प्रिय होता है। खैर, मैं वर्तमान में तो चाह कर भी नुक्स नहीं निकालूँगा क्योंकि यह वर्तमान ही है जिसकी वजह से मेरा ये पोस्ट आप लोगों के समक्ष है, अपने अतीत में तो मैं इस प्रकार से आप जैसे प्रेमी लोगों से सम्पर्क कर ही नहीं सकता था। हाँ, मेरी उम्र के अन्य लोगों की तरह मुझे भी अतीत प्यारा लगता है।

तो आज मन कुछ ठीक न होने से मुझे भी अतीत की बहुत सी यादों ने घेर लिया है। बचपन में मुझे मेरी दादी बहुत चाहती थीं। सत्रह वर्ष की उम्र में विधवा हो गई थीं। उस जमाने के चलन के अनुसार भक्ति भाव में डूबे रहना ही उनका जीवन था। मुझे रोज ब्राह्म-बेला में जगा दिया करती थीं। नित्य दूधाधारी मन्दिर में सुबह की आरती, जो कि साढ़े छः-सात बजे हुआ करती थी, में उपस्थित होना उनका नियम था। अपने साथ वे सालों तक मुझे दूधाधारी मन्दिर ले जाती रहीं। मात्र तीसरी कक्षा तक पढ़ी थीं वे, किन्तु रामायण, भागवत का पाठ रोज ही किया करती थीं। 'नरोत्तमदास' रचित "सुदामा चरित" उन्हें अत्यन्त प्रिय था और पूरी तरह से कण्ठस्थ था। मुझे रोज ही पौराणिक कथाएँ सुनाया करती थीं। आज जो संस्कार मुझमें है वह उन्होंने ही मुझे दिया है। मुझमें भी हिन्दू संस्कार कूट कूट कर भरा हुआ है। और इसी कारण से मुझे सुरेश चिपलूनकर जी के लेख बहुत अच्छे लगते हैं (यह अलग बात है कि आक्रामक स्वभाव न होने के कारण मैं वैसे लेख नहीं लिख सकता)।

प्रायमरी स्कूल में गणित मेरा प्रिय विषय था। कक्षा में सबसे पहले सवाल मैं ही हल किया करता था। आज सोचता हूँ कि उस जमाने में सीखे हुये रुपया-आना-पैसा, तोला-माशा-रत्ती, मन-सेर-छँटाक, ताव-दस्ता-रीम आदि के सवाल आज किसी काम के नहीं रहे हैं। प्रायमरी स्कूल में गणित में मुझे चालीस में चालीस अंक मिला करते थे। इसी प्रकार इमला (श्रुतलेख) में भी मुझे सोलह में सोलह अंक मिला करते थे।

प्रायमरी स्कूल के बाद अर्थात् मिडिल स्कूल से लेकर कॉलेज तक मैं हमेशा सेकेण्ड क्लास विद्यार्थी ही रहा। मैं मूलतः विज्ञान का छात्र था, गणित, भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र मेरे विषय थे। एक साल तक इंजीनियरिंग कॉलेज, रायपुर में भी पढ़ा किन्तु घर की आर्थिक परिस्थिति अच्छी न होने के कारण उसे छोड़ना पड़ा।

हिन्दी कभी भी मेरा मुख्य विषय नहीं रहा किन्तु हिन्दी से मुझे शुरू से ही प्रेम रहा है। शायद इसका कारण यही हो कि मेरे पिताजी ने हिन्दी में एम.ए. किया था और वे हिन्दी के ही शिक्षक थे। हिन्दी का ज्ञान मुझे वंशानुगत ही मिला है। हिन्दी के ब्लोग्स की बढ़ती संख्या देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। कभी कभी हिन्दी ब्लोग्स में हिज्जों और व्याकरण की गलतियाँ देख कर अखरता भी है किन्तु यह भी लगता है कि यह तो स्वाभाविक ही है क्योंकि बहुत से ऐसे ब्लोगर भी हैं जिनकी भाषा हिन्दी न होकर कुछ अन्य है। फिर भी, जैसा कि अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के ब्लोग्स में होता है, हम भी लिखते समय हिज्जों और व्याकरण की गलतियों का ध्यान रखें तो ज्यादा अच्छा होगा।

चलिये, इतना लिखकर मन का गुबार निकल गया और उदासी जाती रही।

Monday, August 17, 2009

लिखता क्या था, अपने आपको ब्लोगर शो करता था

अरे! ये क्या है? बिस्तर पर ये तो मेरा ही पार्थिव शरीर है।

पर मैं तो रात में आराम से सो गया था अब नींद खुलने पर अपने सामने मैं अपने ही मृत शरीर को कैसे देख रहा हूँ? बहुत सोचने पर समझ में आया कि रात में ही किसी समय मेरे प्राण पखेरू उड़ गये थे।

अब मैं अपने ही मृत शरीर को देखते हुए यमदूतों के आने की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद मेरे लड़के की नींद खुली। मैंने उसे पुकारा किन्तु उसे सुनाई नहीं पड़ा। आखिर सुनाई पड़ता भी कैसे? मैं तो अब आत्मा था। मैं उसे देख-सुन सकता था पर वह मुझे नहीं।

वो तो हकबकाये हुये मेरे मृत शरीर को देख रहा था। कुछ देर के बाद उसे कुछ सूझा और उसने घर के सभी लोगों को जगाना शुरू कर दिया। सभी लोग सुबह-सुबह की मीठी नींद का आनन्द ले रहे थे अतः इस प्रकार नींद में खलल डालना उन्हें अच्छा नहीं लगा और वे कुनमुनाने लग गये।

उन्हें जबरदस्ती उठा कर लड़के ने कहा, "तुम लोगों को कुछ पता भी है? पापा तो रेंग गये।"

"ये क्या कह रहे हैं आप? रात को तो अच्छे भले थे।" बहू ने कहा।

"बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ। जाकर देख लो।" यह कह कर लड़का रिश्तेदारों को फोन लगाने लग गया।

घर के लोगों ने मेरे शरीर को बिस्तर से उठा कर उत्तर दिशा की ओर सिर रख कर जमीन पर लिटा दिया। औरतें उस शरीर को चारों ओर घेर कर बैठ गईं।

बहू ने कहा, "अभी-अभी पिछले हफ्ते तो ही ये बिस्तरा खरीदा था बड़े शौक से अपने लिये। इनका बिस्तर कल धोने के लिये गया था इस कारण से ये बिस्तर इनके लिये लगा दिया था। अब तो दान में देना पड़ेगा इस बिस्तर को। बहुत अखरेगा।"

इस पर उसकी चाची-सास अर्थात् मेरे भाई की पत्नी ने कहा, "कोई जरूरत नहीं है नये बिस्तरे को दान-वान में देने की। जल्दी से इसे अन्दर रख दो और वो जो पुराना फटा वाला बिस्तर है उसे यहाँ लाकर कोने में रख दो।"

रिश्तेदार आने शुरू हो गये।

किसी ने कहा, "सुना है कि कुछ लिखते विखते भी थे।"

मेरे मित्रों में से एक ने, जो कि अपने आप को बहुत बड़ा लेखक समझते थे, कहा, "लिखता क्या था, अपने आपको ब्लोगर शो करता था। उसके लिखे को यहाँ कोई पूछता नहीं था इसलिये इंटरनेट में जबरन डाल दिया करता था।"

एक सज्जन बोले, "अब जैसा भी लिखते रहे हों, जो भी करते रहे हों, मरने के बाद तो कम से कम उनकी बुराई तो मत करो।"

मित्र ने कहा, "बुराई कौन साला कर रहा है? अब किसी के मर जाने पर सच्चाई तो नहीं बदल जाती! सच तो यह है कि उम्र भले ही साठ से अधिक की हो गई हो पर बड़प्पन नाम की चीज तो छू भी नहीं गई थी उसे। हमेशा अपनी ही चलाने की कोशिश करता था। एक नंबर का अकड़ू था। जो कोई भी उससे मिलने आ जाता उसे जबरन अपने पोस्ट पढ़वाता था। दूसरों का लिखा तो कभी पढ़ता ही नहीं था। खैर आप मना कर रहे हैं तो अब आगे और मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

मेरे लड़के ने कहा, "पापा तो साठ साल से भी अधिक जीवन बिताकर गए हैं यह तो खुशी की बात है। नहीं तो आजकल तो लोग पैंतालीस-सैंतालीस में ही सटक लेते हैं। हमें किसी प्रकार का गम मना कर उनकी आत्मा को दुःखी नहीं करना है, बल्कि लम्बी उमर सफलतापूर्वक जीने के बाद उनके स्वर्ग जाने की खुशी मनाना है। आप लोग बिल्कुल गम ना करें।"

मेरे भाई के लड़के ने कहा, "भैया बिल्कुल सही कह रहे हैं। अब हमें चाचा जी का क्रिया-कर्म बड़े धूम-धाम से करना है। पुराने समय में दीर्घजीवी लोगों की शव-यात्रा बैंड बाजे के साथ होती थी। हम भी बैंड बाजे का प्रबंध करेंगे।"

"पर आजकल तो बैंड बाजे का चलन ही खत्म हो गया है, कहाँ से लाओगे बैंड बाजा?" एक रिश्तेदार ने प्रश्न किया।

"तो फिर ऐसा करते हैं कि डीजे ही ले आते हैं।"

"पर भजन-कीर्तन वाला डीजे कहाँ मिलता है, डीजे का प्रयोग तो लोग नाच नाच कर खुशी मनाने के लिये करते हैं।"

"तो बात तो खुशी की ही है, हम लोग भी शव-यात्रा में नाचते-नाचते ही चलेंगे।"

"पर भाई मेरे! लोग नाचेंगे कैसे? नाचने के लिये तो पहले मत्त होना जरूरी है जो कि बिना दारू पिये कोई हो ही नहीं सकता। अब यह तो शव-यात्रा है, कोई बारात थोड़े ही है जो पहले लोगों को दारू पिलाई जाये?"

"भला दारू क्यों नहीं पिलाई जा सकती? आखिर मरने वाला भी तो दारू पीता था। लोगों को दारू पिलाने से तो उनकी आत्मा को और भी शान्ति मिलेगी।"

"अरे! क्या ये दारू भी पीते थे?" किसी ने पूछा।

"ये दारू भी पीते थे से क्या मतलब? पीते थे और रोज पीते थे। पूरे बेवड़े थे। बेवड़े क्या वो तो पूरे ड्रम थे ड्रम। एक क्वार्टर से तो कुछ होता ही नहीं था उन्हें। और जब दारू उन्हें असर करती थी तो उनके ज्ञान-चक्षु खुल जाते थे। धर्म-कर्म की बातें करते थे। राम और कृष्ण की कथा बताया करते थे। रहीम और कबीर के दोहे कहा करते थे। हम लोग तो भयानक बोर हो जाते थे। अब ये बातें भला पीने के बाद करने की हैं? करना ही है तो किसी की ऐसी-तैसी करो, किसी को गाली दो, किसी को कैसे परेशान किया जा सकता है यह बताओ। सारा नशा किरकिरा कर दिया करते थे।"

"तो तुम क्यों सुनते रहते थे? उठ कर चले क्यों नहीं जाया करते थे?"

"अरे भई, जब उनके पैसे से दारू पीते थे तो उन्हें झेलना भी तो पड़ता था। और फिर जल्दी घर जाकर घरवाली की जली-कटी सुनने से तो इन्हें झेल लेना ही ज्यादा अच्छा था।"

ये बातें चल ही रहीं थी कि बहू ने मेरे लड़के को इशारे अपने पास बुलाया और एक ओर ले जाकर कहा, "ये क्या डीजे, नाचने-गाने और दारू की बात हो रही है? और तुम भी इन सब की हाँ में हाँ मिलाये जा रहे हो। इस सब में तो पन्द्रह-बीस हजार खर्च हो जायेंगे। कहाँ से आयेंगे इतने रुपये?"

"तो तुम क्यों चिन्ता में घुली जा रही हो? तुम्हें खर्च करने के लिये कौन कह रहा है?"

"पर जानूँ भी तो आखिर खर्च करेगा कौन?"

"मैं करूँगा, मैं।" लड़के ने छाती फुलाते हुए कहा।

"वाह! अपने लड़के की खटारी मोटर-सायकल की मरमम्त के लिये पाँच हजार तो हाथ से छूटते नहीं हैं और जो मर गया उसके लिये इतने रुपये निकाले जा रहे हैं। इसी को कहते हैं 'जीयत ब्रह्म को कोई ना पूछे और मुर्दा की मेहमानी'। खबरदार जो एक रुपया भी खर्च किया, नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"अरे बेवकूफ, तुम कुछ समझती तो हो नहीं और करने लगती हो बक-बक। इसी को कहते हैं 'अकल नहीं और तनखा बढ़ाओ'। अगर मेरे पास रुपये होते तो मैं भला अपने बेटे को क्यों नहीं देता? पर बाप का अन्तिम संस्कार तो करना ही पड़ेना ना!"

"बेटे के लिये नहीं थे तो बाप के लिये अब कहाँ से आ गये रुपये?"

"बुढ़उ ने खुद दिये थे मुझे पचास हजार रुपये परसों, अपने बैंक खाते में जमा करने के लिये। कुछ कारण से उस दिन मैं बैंक नहीं जा पाया और दूसरे दिन बैंक की छुट्टी थी। उनके और मेरे अलावा और किसी को पता ही नहीं है कि उन्होंने मुझे रुपये दिये थे। अब उन रुपयों में से उन्हीं के लिये अगर पन्द्रह-बीस हजार खर्च कर भी दूँ तो भी तो तुम्हारे और तुम्हारी औलाद के लिये अच्छी-खासी रकम बचेगी। साथ ही साथ समाज में मेरा खूब नाम भी होगा। अब गनीमत इसी में है कि तुम चुपचाप बैठो और मुझे भी अपने बाप का क्रिया-कर्म करने दो।"

फिर लड़के ने वापस मण्डली में आकर कहा, "भाइयों, आप लोगों ने जैसा सुझाया है सब कुछ वैसा ही होगा। डीजे भी आयेगा और दारू भी। बस आप लोग दिलखोल कर पीने और नाचने के लिये तैयार हो जाइये।"

इतने में ही एक आदमी ने आकर कहा, "हमें खबर लगी है कि जी.के. अवधिया जी की मृत्यु हो गई है, कहाँ है उनकी लाश?"

हकबका कर मेरे लड़के ने पूछा, "आपको क्या लेना-देना है उनसे?"

"अरे हमें ही तो ले जाना है उनकी लाश को। मैं सरकारी अस्पताल से आया हूँ उनकी लाश ले जाने के लिये, पीछे पीछे मुर्दागाड़ी आ ही रही होगी। उन्होंने तो अपना शरीर दान कर रखा था।"

वे लोग मेरे शरीर को ले गये और मेरी शव-यात्रा के लिये आये हुये लोगों को बिना पिये और नाचे ही मायूसी के साथ वापस लौट जाना पड़ा।

उनके जाते ही यमदूत मेरे सामने आ खड़ा हुआ और बोला, "चलो, तुम्हें ले जाने के लिये आया हूँ। जो कुछ भी तुमने अपने जीवन में पाप किया है उस की सजा तो नर्क पहुँच कर तुम्हें मिलेगी ही पर अपने ब्लोग में ऊल-जलूल पोस्ट लिखने की, किसी के ब्लोग में, यहाँ तक कि जो लोग तुम्हारे ब्लोग में टिप्पणी किया करते थे उनके ब्लोग में भी, टिप्पणी नहीं करने की सजा तो तुम्हें अभी ही यहीं पर मिलेगी।"

इतना कह कर उसने अपना मोटा-सा कोड़ा हवा में लहराया ही था कि मेरी चीख निकल गई और चीख के साथ ही मेरी नींद भी खुल गई।

आपको माधवराव सप्रे जी की कहानी एक टोकरी भर मिट्टी भी अवश्य ही पसंद आएगी।

Friday, August 14, 2009

कृष्ण एक असाधारण पुरुष

चाहे कोई कृष्ण को अवतार माने या केवल एक ऐतिहासिक पात्र माने पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि वे एक असाधारण पुरुष थे। यही कारण है कि पौराणिक कथाओं से लेकर मध्यकालीन कवियों कि रचनाओं तक में वे एक प्रमुख पात्र रहे हैं। उनका व्यक्तित्व इतना असाधारण था कि न केवल हिन्दू बल्कि अन्य धर्मावलम्बियों में भी कृष्ण के भक्त पाये जाते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भी श्री कृष्ण का विशेष व्यक्तित्व रहा है और इसीलिये भगवान विष्णु के दस अवतारों में से सिर्फ कृष्णावतार को ही पूर्णावतार माना गया है क्योंकि सभी दस अवतारों में सिर्फ श्री कृष्ण ही सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे जो कि उन्हें पूर्णत्व प्रदान करता है।

गीता में श्री कृष्ण ने 'कर्म करो और फल की चिंता मत करो' कह कर बहुत ही सरल शब्दों में समस्त मानव जाति को जीवन के गूढ़ रहस्य से परिचय करवा दिया है। वास्तव में उनका यह संदेश किसी जाति, सम्प्रदाय या धर्मविशेष के लिये न होकर समस्त मानव जाति के लिये है।

कृष्ण जैसा अद्भुत तथा महान चरित्र न तो उनके जन्म के पहले ही कभी देखने में आया और न ही बाद में कभी आयेगा। यह चरित्र तो भूतो न भविष्यति बन कर रह गया है। इसी कारण से समस्त विश्व में कृष्ण के अनुयायी पाये जाते हैं।

आपको यह लेख भी अवश्य ही पसंद आयेगा - कृष्ण और राम – असमानता में समानता

Monday, August 10, 2009

क्या कभी आपको ऐसा निमंत्रण मिला है?

मेरे ईमेल के द्वारा मुझे एक निमंत्रण मिला है। निमंत्रण कुछ ऐसा है कि "अपने यहाँ खाना मत, मेरे यहाँ आना मत"। आप भी इस निमंत्रण को देखें:



कैसा लगा निमंत्रण आपको?

यदि आप प्रेमचंद की कहानी 'बड़े भाई साहेब' पढ़ना चाहें तो यहाँ पढ़ सकते हैं

Friday, June 26, 2009

सन् 1905 में छपा हिन्दी लेख

संसार की अन्य भाषाओं की तुलना में हमारी भाषा हिन्दी की उम्र सबसे कम है अर्थात् मात्र लगभग चार सौ साल जबकि अन्य सभी भाषाएँ कई हजारों साल पुरानी हैं। इन चार सौ सालों में भी पहले लगभग तीन सौ सालों तक अवधी तथा ब्रजभाषा को ही हिन्दी माना जाता रहा। आज जिस रूप में हिन्दी है, हिन्दी ने उस रूप को धारण करना उन्नीसवीं शताब्दी के पहले दशक में शुरू किया जब श्री देवकीनन्दन खत्री जी ने चन्द्रकान्ता तथा चन्द्रकान्ता सन्तति उपन्यासों को रचा। यद्यपि इन दोनों उपन्यासों को हिन्दी साहित्य में बहुत उच्च स्थान प्राप्त नहीं है किन्तु इन दोनों उपन्यासों ने अपनी रोचकता से लाखों लोगों को हिन्दी की ओर आकर्षित कर उन्हें हिन्दी सीखने के लिये मजबूर कर दिया। चन्द्रकान्ता सन्तति आज भी मेरे प्रिय उपन्यासों में से एक है। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार श्री पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी भी चन्द्रकान्ता सन्तति उपन्यास के प्रेमी रहे हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी के पहले दशक में, जबकि हिन्दी ने अपना नया रूप धरना शुरू किया, उर्दू ही आम लोगों की मुख्य भाषा थी। नीचे जो लेख दिया जा रहा है वह भी उर्दू में ही लिखा गया था और यह लेख 14 मार्च सन् 1905 में उस जमाने के अवध अखबार में छपा था तथा इसकी हिन्दी नकल को खत्री जी अपने उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तति के उपसंहार में सन्दर्भित किया था। वही लेख मैं यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ:

(यहाँ पर इस लेख की रचना शैली को बताना मेरा मुख्य उद्देश्य है लेख का विषय नहीं)

अगले जमाने में फिलासफर (वैज्ञानिक) लोग अपनी बुद्धि से जो चीजें बना गये हैं अब तक यादगार हैं। उनकी छोटी सी तारीफ यह है कि इस समय के लोग उनके कामों को समझ भी नहीं सकते। उनके ऊँचे हौसले और ऊँचे खयाल की निशानी चीन के हाते की दीवार है और हिन्दुस्तान में भी ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनका किस्सा आगे चल कर मैं लिखूँगा। इस समय "दीवार कहकहा" पर लिखना चाहता हूँ।

मैंने सन् 1899 ई॰ में अखबार आलम मेरठ में कुछ लिखा था जिसकी मालिक अखबार ने बड़ी प्रसंशा की थी, अब उसके और विशेष सबब खयाल में आये हैं जो बयान करना चाहता हूँ।

मुसलमानों के प्रथम राज्य में उस समय के हाकिम ने इस दीवार की अवस्था जानने के लिये एक कमीशन भेजा था जिसके सफर का हाल दुनिया के अखबारों में प्रकट हुआ है।

संक्षेप में यह कि कई आदमी मरे परन्तु ठीक तौर पर नहीं मालूम हो सका कि उस दीवार के उस तरफ क्या हाल चाल है।

उसकी तारीफ इस तरह है कि उस दीवार की ऊँचाई पर कोई आदमी जा नहीं सकता और जो जाता है वह हँसते हँसते दूसरी तरफ गिर जाता है, यदि गिरने से किसी तरह रोक लिया जाय तो जोर से हँसते हँसते मर जाता है।

यह एक तिलिस्म कहा जाता है या कोई और बात है, पर यदि सोचा जाय तो यह कहा जायगा कि अवश्य किसी बुद्धिमान आदमी ने हकीमी कायदे से इस विचित्र दीवार को बनाया है।

यह दीवार अवश्य कीमियाई विद्या से मदद लेकर बनाई गई होगी।

यह बात जो प्रसिद्ध है कि दीवार के उस तरफ जिन्न और परी रहते हैं जिनको देख कर मनुष्य पागल हो लजाता है और उसी तरफ को दिल दे देता है, यह बात ठीक हो सकती है परन्तु हँसता क्यों है यह सोचने की बात है।

काश्मीर के केशर के खेत की भी यही तारीफ है। तो क्या उसकी सुगन्ध वहाँ जाकर एकत्र होती है, या वहाँ भी केशर के खेत हैं जिसे हँसी आती है? परन्तु ऐसा नहीं है क्योंकि ऐसा होता तो यह भी मशहूर होता कि केशर की महक आती है। नहीं नहीं, कुछ और ही हिकमत है जैसा कि हिन्दुस्तान में किसी शहर की मसजिद की मीनारों में यह तारीफ थी कि ऊपर खड़े होकर पानी का भरा हुआ गिलास हाथ में लो तो वह अपने आप ही छलकने लगता था। इसकी जाँच के लिये एक इन्जीनियर साहब ने उसे गिरवा दिया और फिर उसी जगह बनवाया परन्तु वह बात नहीं रही। या आगरा में ताजबीबी के रोजे के फौवारों के नल जो मिट्टी के खरनैचे की तरह थे जैसे खपरैल या बगीचे के नल होते हैं। संयोग से फौवारों का एक नल टूट गया, उसकी मरम्त की गई, दूसरी जगह से फट गया यहाँ तक कि तीस चालीस वर्ष से बड़े बड़े कारीगरों ने अपनी अपनी कारीगरी दिखाई परन्तु सब व्यर्थ हुआ। अब तक तलाश है कि कोई उसे बना कर अपना नाम करे, मतलब यह कि "दीवार कहकहा" भी ऐसी ही कारीगरी से बनी है जिसकी कीमियाई बनावट मेरी समझ में यों आती है कि सतह जहाँ जमीन से आसमान तक कई हिस्सों में अलग की गई है, लम्बाई का भाग कई हवाओं से मिला है जैसे आक्सीजन, नाईट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बोलिक एसिड ग्यास, क्लोराइड इत्यादि। फिर इन हवाओं में से और भी कई चीजें बनती हैं जैसे कि नाइट्रोजन का एक मोरक्कब पुट आक्साइड आफ नाइट्रोजन है (जिसकि लाफिंग ग्यास भी कहते हैं)। बस दुनिया के उस सतह पर जहाँ लाफिंग ग्यास जिसको हिन्दी में हँसाने वाली हवा कहते हैं पाई गई है, उस जगह पर यह दीवार सतह सतह जमीन से इस ऊँचाई तक बनाई गई है। इस जगह पर बड़ी दलील यह होगी कि फिर वह बनाने वाले आदमी कैसे उस जगह अपने होश में रहेंगे, वह क्यों न हँसते हँसते मर गये? और यही हल करना पहिले मुझसे रह गया था जिसे अब उस नजीर से जो अमेरिका में कायम हुई है हल करता हूँ, याने जिस तरह एक मकान कल के सहारे एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख दिया जाता है उसी तरह यह दीवार भी किसी नीची जगह में इतनी ऊँची बनाकर कल से उठाकर उस जगह रख दी गई है जहाँ अब है। लाफिंग ग्यास में यह असर है कि मनुष्य उसके सूँघने से हँसते हँसते दम घुट कर मर जाता है।

अब यह बात रही कि आदमी उस तरफ क्यों गिर पड़ता है? इस खिंचाव को भी हम समझे हुए हैं परन्तु उसकी केमिस्ट्री (कीमियाई) अभी हम न बतायेंगे, इसको फिर किसी समय कहेंगे।