Thursday, January 22, 2015
चंद शेर
तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने ग़म से कब खाली
चलो बस हो गया मिलना ना तुम खाली ना हम खाली
अंदाज अपना देखते हैं आईने में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो
उधर ज़ुल्फों में कंघी हो रही है, खम निकलता है
इधर रुक रुक के खिच खिच के हमारा दम निकलता है
इलाही खैर हो, उलझन पे उलझन बढ़ती जाती है
ना उनका खम निकलता है, ना हमारा दम निकलता है
कितने नादाँ हैं तेरे भूलने वाले कि तुझे
याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे
दर्द-ओ-ग़म का ना रहा नाम तेरे आने से
दिल को क्या आ गया आराम तेरे आने से
हमको किसके ग़म ने मारा, ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा, ये कहानी फिर सही
दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आएगा तुम्हारा, ये कहानी फिर सही
कि तू भी याद नहीं आता ये तो होना था
गए दिनों को सभी को भुलाना होता है
आदमी आदमी को क्या देगा, जो भी देगा वही खुदा देगा
जिंदगी को क़रीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा
अपने मंसूबों को नाकाम नहीं करना है
मुझको इस उम्र में आराम नहीं करना है
Tuesday, January 20, 2015
ओ देस से आने वाले बता!
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहाँ के बाग़ों में मस्ताना हवाएँ आती हैं?
क्या अब भी वहाँ के परबत पर घनघोर घटाएँ छाती हैं?
क्या अब भी वहाँ की बरखाएँ वैसे ही दिलों को भाती हैं?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वतन में वैसे ही सरमस्त नज़ारे होते हैं?
क्या अब भी सुहानी रातों को वो चाँद-सितारे होते हैं?
हम खेल जो खेला करते थे अब भी वो सारे होते हैं?
ओ देस से आने वाले बता!
शादाबो-शिगुफ़्ता फूलों से मा' मूर हैं गुलज़ार अब कि नहीं?
बाज़ार में मालन लाती है फूलों के गुँधे हार अब कि नहीं?
और शौक से टूटे पड़ते है नौउम्र खरीदार अब कि नहीं?
(शादाबो-शिगुफ़्ता = प्रफुल्ल, मा' = स्फुटित, मूर = परिपूर्ण, गुलज़ार = वाटिका)
ओ देस से आने वाले बता!
क्या शाम पड़े गलियों में वही दिलचस्प अंधेरा होता हैं?
और सड़कों की धुँधली शम्मओं पर सायों का बसेरा होता हैं?
बाग़ों की घनेरी शाखों पर जिस तरह सवेरा होता हैं?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहाँ वैसी ही जवां और मदभरी रातें होती हैं?
क्या रात भर अब भी गीतों की और प्यार की बाते होती हैं?
वो हुस्न के जादू चलते हैं वो इश्क़ की घातें होती हैं?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी महकते मन्दिर से नाक़ूस की आवाज़ आती है?
क्या अब भी मुक़द्दस मस्जिद पर मस्ताना अज़ां थर्राती है?
और शाम के रंगी सायों पर अ़ज़्मत की झलक छा जाती है?
(नाक़ूस = शंख, मुक़द्दस = पवित्र, अज़ां = अजान, अ़ज़्मत = महानता)
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहाँ के पनघट पर पनहारियाँ पानी भरती हैं?
अँगड़ाई का नक़्शा बन-बन कर सब माथे पे गागर धरती हैं?
और अपने घरों को जाते हुए हँसती हुई चुहलें करती है?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी वहाँ मेलों में वही बरसात का जोबन होता है?
फैले हुए बड़ की शाखों में झूलों का निशेमन होता है?
उमड़े हुए बादल होते हैं छाया हुआ सावन होता है?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या शहर के गिर्द अब भी है रवाँ दरिया-ए-हसीं लहराए हुए?
ज्यूं गोद में अपने मन को लिए नागन हो कोई थर्राये हुए?
या नूर की हँसली हूर की गर्दन में हो अ़याँ बल खाये हुए?
(रवाँ = बहती है, दरिया-ए-हसीं = सुन्दर नदी, मन = मणि, नूर = प्रकाश, अ़याँ = प्रकट)
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी किसी के सीने में बाक़ी है हमारी चाह? बता!
क्या याद हमें भी करता है अब यारों में कोई? आह बता!
ओ देश से आने वाले बता लिल्लाह बता, लिल्लाह बता!
(लिल्लाह = भगवान के लिए)
ओ देस से आने वाले बता!
क्या गाँव में अब भी वैसी ही मस्ती भरी रातें आती हैं?
देहात में कमसिन माहवशें तालाब की जानिब जाती हैं?
और चाँद की सादा रोशनी में रंगीन तराने गाती हैं?
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी गजर-दम चरवाहे रेवड़ को चराने जाते हैं?
और शाम के धुंधले सायों में हमराह घरों को आते हैं?
और अपनी रंगीली बांसुरियों में इश्क़ के नग्मे गाते हैं?
(गजर-दम = सुबह)
ओ देस से आने वाले बता!
आखिर में ये हसरत है कि बता वो ग़ारते-ईमां कैसी है?
बचपन में जो आफ़त ढाती थी वो आफ़ते-दौरां कैसी है?
हम दोनों थे जिसके परवाने वो शम्मए-शबिस्तां कैसी हैं?
(ग़ारते-ईमां = धर्म नष्ट करने वाली, अत्यन्त सुन्दरी, आफ़ते-दौरां = संसार के लिए आफत, शम्मए-शबिस्तां = शयनाकक्ष का दीपक)
ओ देस से आने वाले बता!
क्या अब भी शहाबी आ़रिज़ पर गेसू-ए-सियह बल खाते हैं?
या बहरे-शफ़क़ की मौजों पर दो नाग पड़े लहराते हैं?
और जिनकी झलक से सावन की रातों के से सपने आते हैं?
(शहाबी आ़रिज़ = गुलाबी कपोल, गेसू-ए-सियह = काले केश, बहरे-शफ़क़ = ऊषा का सागर, मौजों = लहरों)
ओ देस से आने वाले बता!
अब नामे-खुदा, होगी वो जवाँ मैके में है या ससुराल गई?
दोशीज़ा है या आफ़त में उसे कमबख़्त जवानी डाल गई?
घर पर ही रही या घर से गई, ख़ुशहाल रही ख़ुशहाल गई?
ओ देस से आने वाले बता!
अख़्तर शीरानी
Wednesday, January 14, 2015
मकर संक्रांति (Makar Sankranti)
प्रायः हिन्दू त्यौहार चन्द्र आधारित पंचाग के हिसाब से मनाये जाते हैं और इसी कारण से हर साल उनके मनाने की अंग्रेजी तारीख बदल जाती है। किन्तु मकर संक्रांति (Makar Sankranti) एकमात्र ऐसा हिन्दू त्यौहार है जिसे सूर्य आधारित पंचांग के हिसाब से मनाया जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को प्रतिवर्ष 15 जनवरी के दिन ही मनाया जाता है। मकर संक्रांति को हिन्दू धर्म में अत्यन्त पुनीत त्यौहार माना गया है क्योंकि इसी दिन सूर्यदेव मकर रेखा को स्पर्श करके अपनी दिशा बदलते हैं।
इस पवित्र त्यौहार को सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है, यद्यपि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस त्यौहार का नाम भी अलग-अलग होता है, यथा मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, उत्तरायण आदि।
मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के दिन तिल और गुड़ का बहुत अधिक महत्व होता है। प्रायः घरों में तिल और गुड़ के व्यञ्जन बनाये जाते हैं। शायद इसका कारण यही हो सकता है कि मकर संक्रांति का त्यौहार शीतकाल में पड़ता है और तिल तथा गुड़ शरीर को उष्णता प्रदान करते हैं।
इस पवित्र त्यौहार को सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है, यद्यपि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस त्यौहार का नाम भी अलग-अलग होता है, यथा मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, उत्तरायण आदि।
मकर संक्रांति (Makar Sankranti) के दिन तिल और गुड़ का बहुत अधिक महत्व होता है। प्रायः घरों में तिल और गुड़ के व्यञ्जन बनाये जाते हैं। शायद इसका कारण यही हो सकता है कि मकर संक्रांति का त्यौहार शीतकाल में पड़ता है और तिल तथा गुड़ शरीर को उष्णता प्रदान करते हैं।
Saturday, January 3, 2015
भारतीय पाककला (Indian Culinary Art)
पूरन पूरी हो या दाल बाटी, तंदूरी रोटी हो या शाही पुलाव, पंजाबी खाना हो या मारवाड़ी खाना, जिक्र चाहे जिस किसी का भी हो रहा हो, केवल नाम सुनने से ही भूख जाग उठती है। भारतीय भोजन की अपनी एक विशिष्टता है और इसी कारण से आज संसार के सभी बड़े देशों में भारतीय भोजनालय पाये जाते हैं जो कि अत्यंत लोकप्रिय हैं। विदेशों में प्रायः सप्ताहांत के अवकाशों में भोजन के लिये भारतीय भोजनालयों में ही जाना अधिक पसंद करते हैं।
इस बात में तो दो मत हो ही नहीं सकता कि भारतीय खाना 'स्वाद और सुगंध का मधुर संगम' होता है!
स्वादिष्ट खाना बनाना कोई हँसी खेल नहीं है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में खाना बनाने को कला माना गया है अर्थात् खाना बनाना एक कला है। भारतीय भोजन तो विभिन्न प्रकार की पाक कलाओं का संगम ही होता है! इसमें पंजाबी खाना, मारवाड़ी खाना, दक्षिण भारतीय खाना, शाकाहारी खाना, मांसाहारी खाना आदि सभी सम्मिलित हैं।
भोजन की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि यदि पुलाव, बिरयानी, मटर पुलाव, वेजीटेरियन पुलाव, दाल, दाल फ्राई, दाल मखणी, चपाती, रोटी, तंदूरी रोटी, पराठा, पूरी, हलुआ, सब्जी, हरी सब्जी, साग, सरसों का साग, तंदूरी चिकन न भी मिले तो भी आपको आम का अचार या नीबू का अचार या फिर टमाटर की चटनी से भी भरपूर स्वाद प्राप्त होता है।
भारत में पाककला का अभ्युदय हजारों वर्षों पहले हुआ था। वाल्मीकि रामायण में निषादराज गुह के द्वारा राम को भक्ष्य, पेय, लेह्य आदि, जिनका निर्माण पकाये गए अन्नादि से होता था, भेंट करने का वर्णन आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि रामायण काल में भी भारत में भोजन बनाने की परम्परा रही है। सुश्रुत के अनुसार भोजन छः प्रकार के होते हैं - चूष्म, पेय, लेह्य, भोज्य, भक्ष्य और चर्व्य। भोज्य पदार्थों को सुश्रुत के द्वारा इस प्रकार से विभाजन भी भारत में पाककला के अत्यन्त प्राचीन होने को इंगित करता है। यहाँ तक माना जाता है कि भारत में पाककला उतना ही पुराना है जितना कि स्वयं मनुष्य।
इन हजारों वर्षों के दौरान भारत में अनेकों शासक हुए जिनके प्रभाव से भारतीय पाककला भी समय समय में परिवर्तित होती रही। विभिन्न देशों से आने वाले पर्यटकों का भी यहाँ के पाककला का प्रभाव पड़ता रहा। आइये देखें कि विभिन्न काल में भारतीय पाककला में कैसे कैसे परिवर्तन हुएः
माना जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता के काल में, जो कि ईसा पूर्व 2000 का काल था, तथा उससे भी पूर्व भारत में भोजन पकाने की आयुर्वेदिक परम्परा थी। भोजन पकाने की यह आयुर्वेदिक परम्परा इस अवधारणा पर आधारित थी कि हमारे द्वारा भक्ष्य भोजन का हमारे तन के साथ ही साथ मन पर भी समुचित प्रभाव पड़ता है। इस कारण से उस काल में भोजन की शुद्धता पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता था। भोजन में षट्रस, अर्थात मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कसैला एवं कड़वा, के सन्तुलन को भी महत्वपूर्ण माना जाता था।
ईसा पूर्व 1000 के काल में अनेक विदेशी यात्रियों का आगमन होना आरम्भ हो चुका था। इन यात्रियों की अपनी-अपनी अलग-अलग खाना बनाने की पद्धतियाँ हुआ करती थीं जिनका प्रभाव भारतीय पाककला पर पड़ते गया और भारत में खाना बनाने की विभिन्न प्रणालियाँ विकसित होती चली गईं।
ईसा पूर्व 600 में भारत में बौद्ध तथा जैन धर्म का आविर्भाव हुआ और इन धर्मों का समुचित प्रभाव भारतीय पाककला पर भी पड़ा। इस काल में मांस भक्षण तथा लहसुन एवं प्याज से बने भोज्य पदार्थों को त्याज्य मानने की परम्परा बनी।
मौर्य साम्राज्य तथा सम्राट अशोक के काल में, जो कि ईसा पूर्व 400 बौद्ध धर्म अपने चरम विकास पर पहुँचा तथा बौद्ध धर्म का प्रचार विदेशों में भी होने लगा। इस प्रकार से भारत से विदेशों में जाने वाले प्रचारकों के साथ भारतीय पाक प्रणालियाँ विभिन्न देशों में पहुँचती चली गईं। साथ ही उन प्रचारकों के वापस भारत आने पर अन्य देशों की भोजन पद्धतियाँ उनके साथ यहाँ आईं और उनका प्रभाव भारतीय पाककला पर पड़ा।
कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न कालों में भारतीय पाककला पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव पड़ते रहे तथा उसमें अनेक परिवर्तन होते चले गए। भारत में मुस्लिम साम्राज्य हो जाने पर भारतीय पाककला पर सबसे अधिक प्रभाव मुस्लिम खान-पान का ही पड़ा। उसके पश्चात् भारत में अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के कारण भारतीय पाककला पर पश्चिमी प्रकार से खाना बनाने की विधियों का प्रभाव पड़ने लगा। आलू, टमाटर, लाल मिर्च आदि वनस्पतियों का, जिनके विषय में भारत में पोर्तुगीजों तथा अंग्रेजों के आने के पहले जानकारी ही नहीं थी, वर्चस्व भारतीय भोजन में बढ़ने लगा।
इस प्रकार से समय समय में अनेक परिवर्तन होने के कारण आज भारत में विभिन्न प्रकार से भोजन बनाने का प्रचलन है।
इस बात में तो दो मत हो ही नहीं सकता कि भारतीय खाना 'स्वाद और सुगंध का मधुर संगम' होता है!
स्वादिष्ट खाना बनाना कोई हँसी खेल नहीं है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में खाना बनाने को कला माना गया है अर्थात् खाना बनाना एक कला है। भारतीय भोजन तो विभिन्न प्रकार की पाक कलाओं का संगम ही होता है! इसमें पंजाबी खाना, मारवाड़ी खाना, दक्षिण भारतीय खाना, शाकाहारी खाना, मांसाहारी खाना आदि सभी सम्मिलित हैं।
भोजन की सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि यदि पुलाव, बिरयानी, मटर पुलाव, वेजीटेरियन पुलाव, दाल, दाल फ्राई, दाल मखणी, चपाती, रोटी, तंदूरी रोटी, पराठा, पूरी, हलुआ, सब्जी, हरी सब्जी, साग, सरसों का साग, तंदूरी चिकन न भी मिले तो भी आपको आम का अचार या नीबू का अचार या फिर टमाटर की चटनी से भी भरपूर स्वाद प्राप्त होता है।
भारत में पाककला का अभ्युदय हजारों वर्षों पहले हुआ था। वाल्मीकि रामायण में निषादराज गुह के द्वारा राम को भक्ष्य, पेय, लेह्य आदि, जिनका निर्माण पकाये गए अन्नादि से होता था, भेंट करने का वर्णन आता है। इसका अर्थ यह हुआ कि रामायण काल में भी भारत में भोजन बनाने की परम्परा रही है। सुश्रुत के अनुसार भोजन छः प्रकार के होते हैं - चूष्म, पेय, लेह्य, भोज्य, भक्ष्य और चर्व्य। भोज्य पदार्थों को सुश्रुत के द्वारा इस प्रकार से विभाजन भी भारत में पाककला के अत्यन्त प्राचीन होने को इंगित करता है। यहाँ तक माना जाता है कि भारत में पाककला उतना ही पुराना है जितना कि स्वयं मनुष्य।
इन हजारों वर्षों के दौरान भारत में अनेकों शासक हुए जिनके प्रभाव से भारतीय पाककला भी समय समय में परिवर्तित होती रही। विभिन्न देशों से आने वाले पर्यटकों का भी यहाँ के पाककला का प्रभाव पड़ता रहा। आइये देखें कि विभिन्न काल में भारतीय पाककला में कैसे कैसे परिवर्तन हुएः
माना जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यता के काल में, जो कि ईसा पूर्व 2000 का काल था, तथा उससे भी पूर्व भारत में भोजन पकाने की आयुर्वेदिक परम्परा थी। भोजन पकाने की यह आयुर्वेदिक परम्परा इस अवधारणा पर आधारित थी कि हमारे द्वारा भक्ष्य भोजन का हमारे तन के साथ ही साथ मन पर भी समुचित प्रभाव पड़ता है। इस कारण से उस काल में भोजन की शुद्धता पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता था। भोजन में षट्रस, अर्थात मीठा, खट्टा, नमकीन, तीखा, कसैला एवं कड़वा, के सन्तुलन को भी महत्वपूर्ण माना जाता था।
ईसा पूर्व 1000 के काल में अनेक विदेशी यात्रियों का आगमन होना आरम्भ हो चुका था। इन यात्रियों की अपनी-अपनी अलग-अलग खाना बनाने की पद्धतियाँ हुआ करती थीं जिनका प्रभाव भारतीय पाककला पर पड़ते गया और भारत में खाना बनाने की विभिन्न प्रणालियाँ विकसित होती चली गईं।
ईसा पूर्व 600 में भारत में बौद्ध तथा जैन धर्म का आविर्भाव हुआ और इन धर्मों का समुचित प्रभाव भारतीय पाककला पर भी पड़ा। इस काल में मांस भक्षण तथा लहसुन एवं प्याज से बने भोज्य पदार्थों को त्याज्य मानने की परम्परा बनी।
मौर्य साम्राज्य तथा सम्राट अशोक के काल में, जो कि ईसा पूर्व 400 बौद्ध धर्म अपने चरम विकास पर पहुँचा तथा बौद्ध धर्म का प्रचार विदेशों में भी होने लगा। इस प्रकार से भारत से विदेशों में जाने वाले प्रचारकों के साथ भारतीय पाक प्रणालियाँ विभिन्न देशों में पहुँचती चली गईं। साथ ही उन प्रचारकों के वापस भारत आने पर अन्य देशों की भोजन पद्धतियाँ उनके साथ यहाँ आईं और उनका प्रभाव भारतीय पाककला पर पड़ा।
कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न कालों में भारतीय पाककला पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव पड़ते रहे तथा उसमें अनेक परिवर्तन होते चले गए। भारत में मुस्लिम साम्राज्य हो जाने पर भारतीय पाककला पर सबसे अधिक प्रभाव मुस्लिम खान-पान का ही पड़ा। उसके पश्चात् भारत में अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के कारण भारतीय पाककला पर पश्चिमी प्रकार से खाना बनाने की विधियों का प्रभाव पड़ने लगा। आलू, टमाटर, लाल मिर्च आदि वनस्पतियों का, जिनके विषय में भारत में पोर्तुगीजों तथा अंग्रेजों के आने के पहले जानकारी ही नहीं थी, वर्चस्व भारतीय भोजन में बढ़ने लगा।
इस प्रकार से समय समय में अनेक परिवर्तन होने के कारण आज भारत में विभिन्न प्रकार से भोजन बनाने का प्रचलन है।
Thursday, December 25, 2014
क्रिसमस (Christmas)
- क्रिसमस (Christmas) ईसु मसीह के जन्म की याद में मनाया जाने वाला त्यौहार है।
- बाइबिल में ईसु मसीह के जन्म के विशिष्ट दिन के बारे में कोई भी उल्लेख नहीं है।
- क्रिसमस (Christmas) का त्यौहार प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर को मनाया जाता है।
- चौथी शताब्दी मे मध्य तक लोगों को यह पता नहीं था कि ईसु मसीह के जन्म किस दिन हुआ था। बाद में वेस्टर्न क्रिश्चियन चर्च ने 25 दिसम्बर को ईसु मसीहा का जन्म दिन के रूप में मनाने का निश्चय किया और अधिकांश लोगों ने इस दिन को क्रिसमस (Christmas) दिवस के रूप में स्वीकार कर लिया।
- क्रिसमस (Christmas) दिवस के दिन क्रिसमस ट्री सजावट का आरम्भ सोलहवीं शताब्दी में हुआ।
- क्रिसमस लाइट (Christmas lights) का आविष्कार सन 1882 में Edward Johnson ने किया।
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