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Friday, November 13, 2009

मुझे मिले ब्लोगवाणी पसंद ने फूलकर कुप्पा कर दिया मुझे ... पर क्या यह वास्तव में खुशी की बात है?

यह तो अब सभी जानते हैं कि आज सुबह के मेरे पोस्ट "एक ब्लोगवाणी पसंद का सवाल ..." को बहुत ज्यादा पसंद मिली। क्यों? क्योंकि अधिकतर लोग यही समझे कि मैंने अधिक पसंद पाने के लिये मतलब आत्मतुष्टि पाने के लिये यह पोस्ट लिखा था। वो लोग यह समझे कि मैं उनसे अपने पोस्ट के पसंद बटन को क्लिक करने का अनुरोध कर रहा हूँ और उन्होंने मुझे दान के रूप में पसंद दे दिया, जी हाँ दान के रूप में। और टिप्पणी में जता भी दिया कि ले तू भी क्या याद रखेगा, दिया तुझे दान।

पर मुझे दुःख है कि मेरे उस पोस्ट का आशय बहुत कम लोगों ने समझा। हो सकता है कि मैं ही समझाने में असफल रहा होऊँ यद्यपि मैंने स्पष्ट लिखा थाः

यह सब मैं अपने पोस्ट को पसंद करवाने के लिये नहीं कह रहा हूँ बल्कि उन सभी पोस्टों के बारे में कह रहा हूँ जिन्हें आप पढ़ कर पसंद करते हैं और टिप्पणी भी करते हैं। आपकी टिप्पणी से सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है किन्तु आपके पसंद बटन को क्लिक करने से न सिर्फ ब्लोगर को तुष्टि मिलती है वरन ब्लोगवाणी की लोकप्रियता भी बढ़ती है।

मैं जो चाहता था वह नहीं हुआ। मुझे तो बहुत सारे पसंद मिले किन्तु अन्य कई अच्छे पोस्ट्स को जो पसंद मिलनी थी नहीं मिली। उदाहरण के लिये एक पोस्ट "बाजारीकरण या आजादी------- (मिथिलेश दुबे)" का स्क्रीनशॉट दे रहा हूँ।

स्क्रीनशॉट से स्पष्ट है कि यह पोस्ट आज सुबह नौ बज कर बयालीस मिनट में ब्लोगवाणी में आया था। मेरे स्क्रीनशॉट लेते समय याने कि शाम को छः बज कर चार मिनट तक इस पोस्ट को उन्तीस लोग पढ़ चुके थे और पाँच टिप्पणियाँ भी आ चुकी थीं। किन्तु पसंद बटन पर मात्र दो चटके लगे थे। पाँच टिप्पणीकर्ताओं में एक मैं भी था। टिप्पणी करने के बाद मैंने स्क्रीनशॉट लिया और फिर तीसरा चटका लगाया। टिप्पणियों के हिसाब से यह पोस्ट कम से कम पाँच पसंद का हकदार तो बनता है। मुझे विश्वास है कि यह पोस्ट बहुत लोगों को अवश्य ही पसंद आया होगा।

इस पोस्ट के द्वारा मैं यदि अपनी बात समझाने में सफल होता हूँ तो यह मेरा सौभाग्य होगा।