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Friday, September 17, 2010

ललित शर्मा के ललितकला पोर्टल का छत्तीसगढ़ के मुख्य मन्त्री रमणसिंह के द्वारा लोकार्पण


आज विश्वकर्मा पूजा का अत्यन्त शुभ दिन है और हर्ष की बात है कि आज ललित शर्मा के ललितकला पोर्टल का छत्तीसगढ़ के मुख्य मन्त्री रमणसिंह के द्वारा लोकार्पण किया गया।


उल्लेखनीय है कि ललित शर्मा जी यथानाम तथा गुण हैं अर्थात् ललित जी की ललितकलाओं में गहरी रुचि है और वे देश भर के कलाकारों तथा शिल्पियों की कलाकृतियों को इंटरनेट के माध्यम से जनसाधारण के समक्ष लाने के लिए प्रयासरत हैं। ललितकला पोर्टल का निर्माण उनके इस प्रयास का ही परिणाम है। हमारी परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि वे उन्हें अपने इस प्रयास में सफलता प्रदान करें!

Sunday, March 21, 2010

केक नहीं काट रहे ललित जी आज अपने जन्म दिन पर

जन्मदिन में केक काटना क्या जरूरी है? क्या हमारी यही प्रथा रही है?

ये प्रश्न मेरे मन में इसलिये उठे क्योंकि आज मेरे प्रिय मित्र ललित शर्मा जी का जन्मदिन है। मोबाइल लगाकर बधाई देने के बाद मैंने उनसे कहा कि मैं आ रहा हूँ अभनपुर आपके जन्मदिन के जश्न में शामिल होने के लिये। वे सहर्ष बोले कि आ जाइये, केक आपका इंतजार कर रहा है। इस पर मैंने कह दिया कि भाई मैं न तो कोई उपहार दूँगा और न ही केक खाउँगा। मैं तो बस बड़े खाउँगा वो भी उड़द दाल के और उपहार के बदले सिर्फ अपना स्नेह और आशीर्वाद ही दूँगा।

हमारे छत्तीसगढ़ में किसी के जन्मदिन मनाने के लिये आँगन में चौक पूरा (रंगोली डाला) जाता था, सोहारी-बरा (पूड़ी और बड़ा) बनाये जाते थे। बड़े उड़द दाल के होते थे, हाँ स्वाद बढ़ाने के लिये थोड़ा सा मूँगदाल भी मिला दिया जाता था। सगे-सम्बन्धियों तथा मित्र-परिचितों को निमन्त्रित किया जाता था। जिसका जन्मदिन होता था उसे टीका-रोली आदि लगाकर उसकी आरती उतारी जाती थी। वह स्वयं अपने से बड़ों के पैर छूता था और उससे कम उम्र वाले उसके पैर छूते थे। फिर प्रेम के साथ खा-पीकर खुशी-खुशी सभी विदा लेते थे। न कोई भेटं न कोई उपहार, भेंट-उपहार की प्रथा ही नहीं थी।

जब मैंने ललित जी को अपने छत्तीसगढ़ के उपरोक्त प्रथा की याद दिलाई तो वे आज इसी प्रथा के अनुसार अपना जन्मदिन मनाने के लिये राजी हो गये। ललित जी से मेरा परिचय मात्र तीन-चार माह ही पुरानी है, पिछले दिसम्बर में पहली मुलाकात हुई थी मेरी उनसे। पर आज लगता है कि हमारी जान-पहचान बरसों पुरानी है। उम्र में लगभग उन्नीस साल छोटे हैं वे हमसे किन्तु हमारे बीच उम्र की यह दूरी कभी बाधा नहीं बनी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं ललित जी। छत्तीसगढ़ी, हिन्दी के साथ साथ पंजाबी, हरयाणवी आदि अनेक भाषाओं पर अधिकार रखते हैं। संस्कृत का गहन अध्ययन किया है उन्होंने। साहित्य-सृजन में तो सानी नहीं है उनका, अपने लेखन से चारों ओर अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ और अपने देश भारत का परचम फहरा रहे हैं। फोटोग्राफी और कम्प्यूटर ग्राफिक्स में महारत हासिल है सो अलग।

आज उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मैं उनके दीर्घायु की कामना करता हूँ।

Friday, February 12, 2010

किस चीज का चित्र है ये? ... ललित जी की चित्र पहेली

कल मेरे साथ ललित जी ने यह चित्र लिया था। क्या आप बता सकते हैं कि किस चीज का चित्र है यह?

आपको तो पता ही है कि ललित शर्मा जी आजकल छुट्टी में चल रहे हैं। पर छुट्टी में होने के बावजूद भी उनके पोस्ट आ रहे हैं क्योंकि उन्हें ललित जी ने पहले ही शेड्यूल्ड करके रख दिया था। कल लगभग सवा बजे दिन को उनका फोन आया मेरे पास। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि राजिम मेला घूमने का विचार बन रहा है उनका साथ ही निमन्त्रण मिला उनके साथ मेला चलने के लिये। तो मैंने भी कल आधे दिन की छुट्टी ले ली और बस पकड़ कर एक घंटे के भीतर रायपुर से अभनपुर पहुँच गया। रायपुर से अभनपुर आखिर मात्र २८ कि.मी. की दूरी पर ही तो है। ललित जी वहाँ पर मेरा इन्तिजार करते मिले मुझे अपने मोटरसायकिल के साथ।

उनके मोटरसायकल से ही हम लोग निकल पड़े राजिम के लिये जो कि अभनपुर से मात्र १७ कि.मी. दूरी पर है। राजिम मेला छत्तीसगढ़ का अत्यन्त प्राचीन और सबसे बड़ा मेला है जो कि माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक चलता है। राजिम महानदी के तट पर स्थित है और यहाँ पर महानदी के साथ पैरी तथा सोंढुर नदियों का त्रिवेणी संगम होता है। इसीलिये राजिम को छत्तीसगढ़ के प्रयाग की संज्ञा दी गई है। महानदी छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नदी है और प्राचीनकाल में इसे चित्रोत्पला के नाम से जाना जाता था।

ललित जी को फोटोग्राफी और ग्राफिक्स के क्षेत्र में महारथ हासिल है सो उन्होंने बड़े सुन्दर सुन्दर चित्र भी लिये वहाँ पर जिनमें से कुछ यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ





(चित्रों को बड़ा करके देखने के लिये उन पर क्लिक करें।)

राजिम मेला जाने का एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि वहाँ पर हमें गीताप्रेस गोरखपुर के स्टॉल में वाल्मीकि रामायण द्वितीय भाग की प्रति, जो हमसे गुम हो गई थी, मिल गई और आज से हमने अपने "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण", जो कि बहुत दिनों से रुका हुआ था, में प्रविष्टियाँ पुनः आरम्भ कर दिया।

"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान का सागर पार करना - सुन्दरकाण्ड (1)