Thursday, October 14, 2010

चोर-डकैतों के सरदार नवाब

लेखक - आचार्य चतुरसेन

(इसके पहले की कहानी यहाँ पढ़ें - चोरों का अद्भुत मेला)

मुज़फ्फरनगर के नवाब इकरामुल्लाखां का नाम सुनकर उन दिनों अच्छे-अच्छों की पंडली काँप जाती थी। नवाब की उम्र अब साठ को पार कर गई थी, पर उनके दमखम अभी वैसे ही बने थे। वे बड़े डीलडौल के आदमी थे। रियासत भर में उनकी सवारी के लायक कोई घोड़ा न था। इसलिए वे हाथी पर ही सवार होते थे। उनका चेहरा भी भयानक था और आँखें हमेशा सुर्ख रहती थीं। तन्दुरुस्ती निहायत अच्छी थी। जात के पठान रुहेले थे। हेस्टिंग्ज के जमाने में जब रुहेलों पर तबाही आई तो इनकी सारी जागीर चौपट हो गई। अब यहाँ मुज़फ्फरनगर में इनकी छोटी-सी जमींदारी थी। मगर रुआब उनका दूर-दूर तक था। हकीकत तो यह थी कि वे अब डाके का धन्धा करते थे। सैकड़ों डाकू अलग-अलग गिरोहों में दूर-दूर तक डाके डालते और माल उनके कदमों पर ला डालते थे। वह जमाना ही ऐसा था, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत थी।

नवाब अपनी कचहरी में बैठे थे। मुसाहिब लोग भी साथ थे। नवाब मोढ़े पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। एक शागिर्द ने आगे बढ़कर कहा, “सरकार, सुरंग घोड़ी है, बहुत नफीस! इस गिर्दनवा में वैसी घोड़ी न होगी।”

“कहाँ है वह?”

“हुजूर, एक लौंडा उसपर सवार है। वह सहारनपुर जा रहा है।”

“कौन है वह?”

“यह तो मालूम नहीं सरकार, उसके साथ सिर्फ दो प्यादे हैं। बस इत्तला देने को दौड़ा आ रहा हूँ।”

नवाब एकदम गुस्से में गरज उठे। उन्होंने कहा, “तो बदबख्त, तू सिर्फ हमें इत्तला देने को ही आया है, घोड़ी अभी तक गैर के ही ताबे में है?”

“हुजूर!”

नवाब फिर गरजे। उन्होंने कहा, “हुजूर के बच्चे, आधे घण्टे में घोड़ी हमारे हुजूर में हाजिर ला।”

शागिर्द सलामें झुकाता हुआ चला गया और आधे घण्टे के अन्दर ही घोड़ी नवाब साहब के अहाते में आ गई।

घोड़ी को देखकर नवाब साहब खुश हो गए। यह उनका शौक था, घोड़ा, घोड़ी, बैल, रथ या कोई भी चीज, जो उम्दा से उम्दा, जहाँ नज़र पड़े नवाब की होनी ही चाहिए। नवाब के आदमी जो शागिर्द कहाते थे और पेशा डकैती करते थे, नवाब की यह तबीयत पहचानते थे। बस, जहाँ कोई उम्दा चीज़ नज़र आई कि वह नवाब की होकर रही। किसी की मज़ाल थी कि उनके इस शौक में हारिज हो!

घोड़ी अभी दाना-पानी खा ही रही थी कि उसका मालिक वह लड़का भी नवाब की ड्यौढ़ी पर आ हाजिर हुआ। उम्र उसकी कोई अठारह साल की होगी, सुन्दर और छरहरा बदन। इत्तला पाकर नवाब ने उसे बुलाया। उसने आकर नवाब को सलाम झुकाया।

नवाब ने कहा, “कौन हो, साहबज़ादे?”

“क्या हुजूर ने पहचाना नहीं?”

“अफसोस साहबज़ादे, लेकिन आँखें बहुत कमजोर हो गई हैं। ठीक तौर पर देख नहीं पाता। याद नहीं आता कि कहाँ देखा है तुमको।”

“हुजूर ने जन्नतनशीन नवाब मुज़फ्फरबेग का नाम सुना होगा?”

“क्या नवाब बल्लभगढ़? हो-हो, अमाँ वे तो मेरे मुरब्बी थे। वाह, क्या फरिश्ता आदमी थे! मगर हाय-हाय, क्या बेरहम मौत पाई। अल्ला-अल्ला।”

नवाब ने कान पकड़कर अपने मुँह पर दो तमाचे जड़े। फिर गहरी साँस लेकर बोले, “नवाब मुज़फ्फरबेग, हाँ तो फिर?”

“मैं हुजूर, उनका नवासा हूँ। मेरा नाम यूसुफ है।”

“अरे वाह साहबज़ादे, इतनी देर से क्यों नहीं कहा! मैं भी कैसा अहमक हूँ, तुम्हें इतनी देर खड़ा रखा। अल्ला-अल्ला। उन्होंने फिर कान पकड़े और फिर दो तमाचे अपने मुँह पर जड़े। फिर मोढ़े से उठकर युवक को अंक में भर लिया।

“बैठो, बैठो साहबज़ादे, देखकर आँखें ठण्डी हो गईं। वाह, वही खसलत पाई है। खुदा ने चाहा तो तुम नवाब साहब का नाम रोशन कर लोगे।” इसके बाद उन्होंने पुकारकर कहा, “कोई है, साहबज़ादे के लिए नाश्ता लाओ।”

युवक ने कहा, “एक अर्ज़ करने को हाज़िर हुआ था।”

“देखो साहबज़ादे, धांधली की सनद नहीं। पहले नाश्ता करो, फिर इत्मीनान से बातें होंगी।”

खिदमतगार एक गिलास दूध और पराँठे दे गया। नौजवान ने नाश्ता किया। नवाब ने हुक्के पर नई चिलम चढ़ाकर कश लिया। फिर बोले, “क्या करते हो साहबज़ादे?”

“हुजूर, फिरंगियों के स्कूल में पढ़ रहा हूँ।”

“अच्छा करते हो। भई, सच तो यह है कि ये अंग्रेज हैं औलिया, देख लेना कुछ दिनों में हिन्दुस्तान कि काया पलट कर रख देंगे। खैर, अब कहो, क्या काम है?”

“हुजूर, मैं सहारनपुर जा रहा था कि बदमाशों ने मेरा पीछा किया और मेरी घोड़ी छीन ली। मेरे आदमियों को भी ज़ख्मी कर दिया।”

“अरे, कब, कब? बड़ी खराब बात है।”

“हुजूर, बस कोई एक घण्टा हुआ। मैंने सोचा, आप के ही हुजूर में अर्ज करूँ। अब और कहाँ फरियाद करता?”

“अच्छा किया, साहबज़ादे, तुम मेरे पास चले आए। आजकल शरीफों का राह-बाट में निकलना ही मुश्किल है। घोड़ी कैसी थी?”

“सुरंग थी, हुजूर।”

नवाब ने आवाज दी, “कोई है?”

वही शागिर्द आ हाज़िर हुआ। लड़के ने डाकू को पहचान लिया। उसने आती बार घोड़ी को बँधे दाना खाते भी देख लिया था। पर उसने ऐसा भाव बनाया कि जैसे न वह घोड़ी को पहचानता है, न डाकू को।

नवाब ने शागिर्द से कहा, “सुना तुमने, साहबज़ादे का किस्सा?”

“हुआ क्या सरकार?”

“हुआ क्या? दिन-दहाड़े डाका पड़ गया। मियाँ को अकेला जानकर बदमाश घोड़ी लेकर यह जा, वह जा।”

“बड़ी खराब बात है हुजूर।”

“खराब? मैं कहता हूँ जब तक दो-चार को गोली से न उड़ाया जाएगा, ये वारदातें बन्द नहीं होंगी। और फिर मेरे ही हल्के में! कितनी बदनामी और शर्म की बात, तौबा-तौबा।” उन्होंने फिर दोनों कान पकड़कर गालों पर तमाचे जड़ दिए।

शागिर्द सिर झुकाए खड़ा रहा।

नवाब ने कहा, “खड़े-खड़े क्या देखते हो? घोड़ी का पता लगाओ।”

“हुजूर …”

“बस-बस, मै एक लफ़्ज नहीं सुनना चाहता। चाहे आसमान में उड़ जाओ, या धरती फोड़कर उसमें घुस जाओ। घोड़ी मिलनी चाहिए, जाओ।” इतना कहकर नवाब साहब ने यूसुफ मियाँ से कहा, “तब तक साहबज़ादे तुम आराम करो। घोड़ी मिल जाएगी। खातिर जमा रखो।”

“हुजूर का इकबाल ही ऐसा है।”

नवाब साहब ने मियाँ यूसुफ के ठहरने, आराम करने और शिकार-तफरीह का पूरा बन्दोबस्त कर दिया। यूसुफ मियाँ मजे से चोरों के शहनशाह की मेहमान नवाजी का लुत्फ लेने लगे।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” का अंश)

Wednesday, October 13, 2010

चोरों का अद्भुत मेला

लेखक – आचार्य चतुरसेन

मेरठ, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर के जिले और उसके आसपास का इलाका उन दिनों गूजरवाड़ा के नाम से विख्यात था। इसका दूसरा नाम चोरों का इलाका भी था क्योंकि वास्तव में यह चोरो् और डाकुओं का गढ़ था। इस भू-भाग पर राजा, नवाब, जमींदार और रियाया जो भी थी, सभी का मुख्य पेशा चोरी या राहजनी था। यह चोरी विविध प्रकार की होती थी। जानवरों की चोरी, नकबज़नी, डाके, राहजनी और इसी किस्म की दूसरी वारदातें। मुज़फ्फरनगर के नवाब इकरामुल्ला खां इन चोरों और डाकुओं के सबसे बड़े मुखिया और सरदार थे। उनकी रियासत में पाँच गाँव उनके थे। ये सब मशहूर चोरों के गाँव थे। मुज़फ्फरनगर में उनकी गढ़ी थी – हवेली थी, जहाँ खुद नवाब साहब रहते थे।

मुज़फ्फरनगर आज तो एक सम्पन्न जिला है, जिले का सदर मुकाम है, अच्छा-खासा शहर है। अनाज और गुड़ की वहाँ बड़ी भारी मण्डी है, मगर उन दिनों वह महज एक गाँव था, जहाँ पक्की हवेली केवल नवाब साहब की ही थी, जो दुमंजिला थी। उसके चारों ओर बहुत-सी जमीन घेरकर कच्ची मिट्टी का एक बहुत मोटा परकोटा बना था – जो गढ़ी कहाता था। इसके भीतर नवाब के जानवर, जिसकी संख्या हजारों में होती थी और जो प्रायः दूर-दूर से चोरी करके लाए जाते थे, रखे जाते थे। इन जानवरों में एक से एक बढ़कर घोड़े, उम्दा नस्ल की घोड़ियाँ, नागौरी और हरियाने के बैल, गायें, भैसें आदि होती थीं। गढ़ी के भीतर ही नवाब साहब के शागिर्द पेशा लोग रहते थे, जो नवाब साहब के अत्यन्त विश्वस्त नामी-गिरामी चोर होते थे, और बड़े-बड़े साहसिक अभियान करते थे। उनके कच्चे-पक्के छोटे-बड़े घर बेतरतीब से नवाब साहब की हवेली के चारों ओर फैले हुए थे। नवाब साहब के पाँचों गाँवों की सब जमीन भी ये शागिर्द पेशा लोग ही जोतते-बोते थे। इन शागिर्द पेशा लोगों में नामोगिरामी चोर तो होते ही थे – खोजी भी ऐसे  मार्के के थे – कि चोरी का पता लगाने में यकता थे। चोर का जरा सा सुराग मिल जाए, कहीं उसके पैर का निशान, हाथ की छाप, उसके कपड़े का टुकड़ा या ऐसी ही कोई चीज, तो उसी के सहारे वे पचास-पचास मील में चोर का पता लगा लेते थे। कोई अजीब विद्या थी इन लोगों की, और वे आसपास में दूर-दूर तक मशहूर थे, तथा दूर-दूर के रईस जमींदार – जब उनके घर चोरी होती थी – नवाब साहब के खोजियों का सहारा लेते थे। नवाब साहब में एक करामात दाद देने के काबिल यह थी कि उनके यहाँ चाहे जितना भी कीमती माल चोरी का आ गया हो, यदि माल का स्वामी नवाब की ड्यौड़ी पर आ गया तो उसे वापस कर देते थे। वापस करने का ढंग शानदार होता था। असल बात यह थी कि नवाब मुज़फ्फरनगर के सभी ठाठ, सभी ढंग निराले होते थे। उन बातों को यद्यपि अभी सौ ही वर्ष बीते हैं, पर वे सब बातें ऐसी गायब हो गई हैं कि उनपर आज मुश्किल से विश्वास किया जा सकता है। हाँ इतना जरूर है कि गूजरवाड़े का यह इलाका आज भी नामी-गिरामी चोरों का इलाका है।

मुज़फ्फरनगर में हर दीवाली को चोरों का मेला लगता था। मेला बड़ी धूम-धाम का होता था। मेले में गूजरवाड़े के छोटे-बड़े चोर इकट्ठे होते थे। यह मेला एक सप्ताह तक लगता था। जैसे होली के बाद मेरठ की नौचन्दी की धूम थी वैसी ही मुज़फ्फरनगर के इन चोरों के मेले की थी जो दीवाली का मेला कहाता था। इस मेले में हजारों चोर इकट्ठे होते थे। इनमें से बहुत से तो बड़े भारी नामी-गिरामी चोर होते थे। इन सब चोरों को आठ दिन तक नवाब के लंगर में खाना मिलता था। नवाब की गढ़ी ही नहीं, हवेली तक उनके स्वागत में आठ दिन तक खुली रहती थी। हकीकत तो यह थी, कि ये गूजरवाड़े के चोर नवाब साहब को केवल अपना सरदार  ही नहीं मानते थे, वे उन्हें पीर-औलिया-गुरु, जो कहिए, मानते थे। मेले में जब ये चोर आते तो हर एक छोटा-बड़ा चोर अपनी औकात के अनुसार भेंट-सौगात नवाब की नज़र करता था। खासकर नये-नौसिखिए चोर तो अधिक श्रद्धा से नज़र गुजार कर नवाब के मुरीद बनते, और यहाँ से लौटकर अपने चोरी के पेशे का श्रीगणेश करते थे। इन चोरों की एक पारिभाषिक भाषा होती थी, कुछ गूढ़ संकेत होते थे नकबज़नी के, गला काटने के, चुराए हुए पशु का रूप-रंग बदलने के बड़े-बड़े विचित्र गुप्त तरीके होते थे जो नये शागिर्दों को तभी बताए जाते थे, जब वे बाकायदा नज़र-भेंट देकर नवाब साहब के मुरीद बन जाते थे। फिर इनसे किसी बात का दुराव-छिपाव नहीं होता था।

बड़े-बड़े चोर अपने नये-नये हथकण्डे, नई-नई आविष्कृत नीतियाँ – चोरी और नकबज़नी  की – दूसरों को बताते थे। मेले में परस्पर ऐसी बातें आम चर्चा का विषय होती थीं। इन आगन्तुक चोरों में भी जो नामी-गिरामी होते थे, वे बहुधा जत्थाबन्द होते थे, इसका मतलब यह था कि उनके शागिर्द पेशा लोगों की भी एक जमात होती थी, और वे अपनी जमात के साथ धूमधाम से मेले में आते थे। परन्तु ये सब जीवट के चोरों के सरदार भी नवाब साहब को अपना उस्ताद मानते थे और उन्हें नज़र-भेंट करते थे। वे चोरी करने के नये-नये गुर नवाब साहब को बताते और जो चोरी की नई-नई विधियाँ, नकबज़नी की रीतियाँ वे आविष्कृत करते, वे नवाब साहब से कहते। मेले के अन्त में नवाब साहब ऐसे लोगों को भारी-भारी इनाम-इकराम देते थे।

मेले में बहुत से भांड, बाजीगर, सपेरे, जनखे, रंडियाँ और कलावन्त आते। वे अपने करतब चोरों को दिखाकर इनाम-इकराम लेते, गाने-बजाने, मुज़रे-जल्सों की धूम रहती। गरज, आठ दिन मुज़फ्फरनगर में मेले की वह धूमधाम होती कि जिसका नाम! आखिरी दिन नवाब साहब का दरबार होता, जिसमें सब रंडियाँ, कलावन्त आते, रात भर गाना-बजाना, मुज़रा होता और दिनभर भाँति-भाँति के तमाशे होते। तब नवाब साहब सबको इनाम-इकराम देकर विदा करते। मगर चोरों के इस अद्भुत मेले में, जो एक सबसे ज्यादा अद्भुत बात होती थी वह यह कि किसी की एक सुई भी चोरी नहीं होती थी।

(आचार्य चतुरसेन के उपन्यास “सोना और खून” का अंश)

Tuesday, October 12, 2010

कितना अजीब लगता है जब....

आज दिनांक 12-12-10 को सुबह 10.20 बजे चिट्ठाजगत के डिफॉल्ट हॉट लिस्ट में हमने देखा कि डॉ टी.एस. दराल जी का पोस्ट "आज एक सवाल ---लोग पीपल के पेड़ की पूजा क्यों करते हैं?" पहले नंबर पर है किन्तु चिट्ठाजगत के धड़ाधड़ पठन वाले हॉटलिस्ट में वही पोस्ट नीचे से चौथे नंबर अर्थात् 37वें नंबर पर है। मजे की बात यह है कि दराल जी के उस पोस्ट में चिट्ठाजगत ने 43 पाठक भेजे और उस पोस्ट में टिप्पणियों की संख्या भी 43 ही है। अब ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि चिट्ठाजगत से गए सभी पाठकों ने उस पोस्ट पर टिप्पणी की हो। हमने स्वयं भी उस पोस्ट में जाकर टिप्पणी की है किन्तु हम वहाँ चिट्ठाजगत के माध्यम से नहीं गए थे।

हमारे संकलक, जिनका मुख्य उद्देश्य पोस्टों में पाठक भेजना है, अपने द्वारा भेजे गए पाठकों की संख्या से अधिक पोस्ट में की गई टिप्पणियों की संख्या को आखिर क्यों ज्यादा महत्व देते हैं? क्या सचमुच संकलकों के द्वारा भेजे गए पाठकों की संख्या, जिसे कि बढ़ाना संकलकों का मुख्य कार्य ही होता है, का महत्व टिप्पणियों की संख्या के सामने कुछ भी नहीं है? खैर, हिन्दी ब्लोग्स के संकलक निजी हैं और उनके स्वामियों को अधिकार है कि वे जो चाहें करें, हम उनके कार्य में दखल देने वाले कौन होते हैं?

चिट्ठाजगत के दोनों ही हॉटलिस्ट इस प्रकार हैं:

क्र.धड़ाधड़ टिप्पणियाँहॉटलिस्ट धड़ाधड़ पठन हॉटलिस्ट
1आज एक सवाल ---लोग पीपल के पेड़ की पूजा क्यों करते हैं? [43]बृ्हस्पति, शुक्र के अस्तकाल में विवाहादि शुभ कार्य वर्जित क्यों ? [88]
2सुनामी की बाहों में ..... [34]उम्मीद का दामन.. [81]
3दायरे.... [33]सचिन का डंका [78]
4एक और आईडिया....... [30]देवालयों की रक्षार्थ शेखावत वीरों का आत्मोत्सर्ग [77]
5कदहीन मगर आदमकद भीड़ ... [26]अटके हुए पल [70]
6पर्दा धूप पे [26]कुत्ते कितने समझदार और संवेदनशील होते हैं [69]
7भ्रूण हत्या बनाम नौ कन्याओं को भोजन ?? [24]अब हँसने के लिए जोग हैं .... [67]
8दुर्नामी लहरें [22]चुम्बन चुम्बन पर लिखा होगा मरने वाले का नाम [63]
9किताबों की दुनिया - 39 [22]कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी [63]
10वो छाँव बनकर छुप गयी [22]कंट्रोल सी + कंट्रोल वी …फ़िर ले के आए झाजी …..जस्ट झाजी स्टाईल ..चर्चा नहीं ..पोस्ट झलकियां .. [62]
11नाम सोचा ही न था! [19]सिलसिला गुलज़ार कैलेन्‍डर का: पांचवां भाग--'याद आते हैं वो सारे ख़त मुझे' [60]
12साप्ताहिक काव्य – मंच ---- 20 (चर्चा-मंच --- 304 )……….संगीता स्वरुप [19]भ्रूण हत्या बनाम नौ कन्याओं को भोजन ?? [60]
13"बन्दर की व्यथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") [18]जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा....राजेन्द्र कृष्ण और एल पी के साथ मिले रफ़ी साहब और बना एक बेमिसाल गीत [58]
14आज पढने के बदले सुन लें कहानी...."कशमकश" [18]क्या बाज़ार ही भाषा को भ्रष्ट करता है? [बाज़ारवाद-3] [57]
15क्या द ग्रैंड डिज़ाइन स्टीफन हाकिंस ने चोरी की है? [18]क्या द ग्रैंड डिज़ाइन स्टीफन हाकिंस ने चोरी की है? [56]
16बारात, ब्लॉगिंग और प्रेरणा। [18]Sale - Vendita - बिक्री [56]
17ख़ामोशी! [17]कार्टून:- हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है ... [55]
18एक पोस्टकार्ड [17]सर्पदंश का शिकार पीठासीन अधिकारी की स्थिति गम्भीर मतदान अधिकारी की मौत [54]
19The ultimate way for women दुनिया को किसने बताया की विधवा और छोड़ी हुई औरत का पुनर्विवाह धर्मसम्मत है ? - Anwer Jamal [15]सूरज, चंदा, तारे, दीपक, जुगनू तक से ले रश्मि-रेख [53]
20वृत्त [15]येदुरप्पा सरकार पर संकट बरक़रार, राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन कि शिफारिश की. [53]
21कितने साबुत और बचा क्या [14]The ultimate way for women दुनिया को किसने बताया की विधवा और छोड़ी हुई औरत का पुनर्विवाह धर्मसम्मत है ? - Anwer Jamal [50]
22In search of the truth सच का नश्तर - Ejaz [13]हिन्दू महा सभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की !! [50]
23न जाने ये रात इतनी तन्हा क्यूँ है, हमें [13]एक और आईडिया....... [49]
24कुछ रिश्ते बन जाते हैं.. [13]सचिन का ४९ वाँ शतक !! [48]
25ये नाम जो है तेरा.....!! [12]आईये दुआ करें [48]
26लम्हों को दोहरा लेना [11]दायरे.... [47]
27भिलाई में मिले ब्लॉगर ---- ललित शर्मा [11]बिहार चुनाव:- राजद की पांचवीं सूची जारी. [46]
28अब हँसने के लिए जोग हैं .... [11]मक्खी मार रहे हैं दारू दुकान वाले [46]
29काश ! दर्पण मुझमें समा जाता..... [11]सचिन तेंदुलकर ने 14 हज़ार रन पूरे किये !! [45]
30जानां [10]मिथिला का उच्चैठ शक्तिपीठ. [45]
31बृ्हस्पति, शुक्र के अस्तकाल में विवाहादि शुभ कार्य वर्जित क्यों ? [10]खुदा 'महफूज़' रखे हर बला से .... हर बला से !! [44]
32कदहीन मगर आदमकद भीड़--ब्लॉग4वार्ता--ललित शर्मा [10]योगिनी का अमोनियम नाइट्रेट : पिन कोड 273010, एक अधूरा प्रेमपत्र - 33 [44]
33आज के विजेता रहे डॉ रूपचंद्र शास्त्री जी 'मयंक' ..बधाई 'मयंक' जी ! अगली स्पर्धा ग़ज़ल के लिए होगी [10]राजस्थान रॉयल्स और पंजाब आईपीएल से बाहर !! [44]
34उम्मीद का दामन.. [9]कदहीन मगर आदमकद भीड़ ... [43]
35कार्टून:- हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है ... [9]सुनामी की बाहों में ..... [43]
36तलाश निकले थे कुछ दूर हम, आज़ाद पंछी की तरह, मिल [9]लालू नितीश के बीच आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी !! [43]
37कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी [9]आज एक सवाल ---लोग पीपल के पेड़ की पूजा क्यों करते हैं ? [43]
38जो उनकी तमन्ना है बर्बाद हो जा....राजेन्द्र कृष्ण और एल पी के साथ मिले रफ़ी साहब और बना एक बेमिसाल गीत [9]माईएसक्यूएल डाटाबेस का बैकअप कैसे लें [42]
39बस ... मुझसे मेरा हाल ना पूछा ...!! [8]अनमाप, अनियंत्रित भ्रष्टाचार के सागर में आशा की किरणें भी हैं [42]
40घर [8]भाषाई मर्यादा [42]

Monday, October 11, 2010

मक्खी मार रहे हैं दारू दुकान वाले

शाम होते ही जहाँ दारू दुकानों के सामने जो भीड़ इकट्ठी हो जाती थी वह अब देखने को भी नहीं मिल रही है। बार की रौनक भी नज़र नहीं आ रही है।  माता दुर्गा जो विराजमान हो गई हैं नौ दिनों के लिए! माता के प्रति लोगों की श्रद्धा ने ही शराबियों से नौ दिन तक शराब तक को भी छुड़वा दिया है। राष्ट्रीय पर्वों में तो सरकार दारू दुकान बन्द करवा देती है फिर भी लोग छुप-छुपाकर पीने की व्यस्था कर ही लेते हैं और नवरात्रि में आलम यह है कि छुपने-छुपाने की कोई आवश्यकता नहीं है फिर भी लोगों ने पीना बन्द कर दिया है। छत्तीसगढ़ी में एक हाना (लोकोक्ति) है - "सिखोवन बुद्धि उपजारन माया"! अर्थात् सिखाने से बुद्धि नहीं आती और उपजाने से माया नहीं उपजती। इसी प्रकार दारू दुकान बन्द करवा देने से लोग पीना नहीं छोड़ देते। पीना छोड़ने के लिए तो अपने भीतर से ही आदेश मिलना चाहिए और नवरात्रि में माँ दुर्गे लोगों के भीतर से अनायास ही आदेश दिलवा देती हैं न पीने के लिए। माँ नवदुर्गा के नवों रूपः
  1. शैलपुत्री
  2. ब्रह्मचारिणी
  3. चन्द्रघंटा
  4. कुष्मांडा
  5. स्कंधमाता
  6. कात्यायिनी
  7. कालरात्री
  8. महागौरी
  9. सिद्धिदात्री
समस्त जनों का कल्याण करे!

Sunday, October 10, 2010

प्रतिभा तो छिपाए नहीं छिप सकती

कुछ बातें ऐसी होती हैं कि दबाए नहीं दब पातीं। खून हो जाए और खूनी के बारे में सुन-गुन न लगे, खैर वाला पान खाएँ और होठ लाल ना हो, मन में खुशी हो और मुख पर प्रसन्नता न झलके, किसी से बैर हो जाए पर किसी को पता न चले या फिर मद्य का सेवन हो और कदम तथा जबान न लड़खड़ाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता; इसीलिए तो रहीम कवि ने कहा हैः

खैर खून खाँसी खुसी बैर प्रीत मदपान।
रहिमन दाबे न दबे जानत सकल जहान॥


ऐब और गुण भी ऐसी ही चीजें हैं जो छिपाए नहीं छिपतीं। हम श्री राहुल सिंह जी से मिलने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य के संस्कृति विभाग में गए तो वहाँ छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के दस वर्ष पूर्ण होने पर एक थीम सांग बनने की चर्चा जोरों पर चल रही थी। इधर चर्चा चल ही रही थी और उधर उसी विभाग में कार्यरत श्री राकेश तिवारी एक कागज पर कुछ लिखने में व्यस्त थे। यह जानकर हम दंग रह गए कि महज पाँच-सात मिनट के भीतर ही उन्होंने छत्तीसगढ़ी में एक थीम सांग की रचना कर डाली जो इस प्रकार हैः

दस साल के छत्तीसगढ़ ह, देस मँ नाम कमावत हे।
बिकास के झण्डा ल, गाँव-गाँव फहरावत हे॥
दस साल के.....

बमलेसरी महमाई संवरी दन्तेसरी के माया हे़।
कोरबा भेलई बईलाडीला संग देवभोग के छाया हे॥
हरियर छत्तीसगढ़ धान कटोरा चाँदी के दोना कहावत हे
दस साल के.....

गावय ददरिया महानदी शिवनाथ बजावय मोहरी।
इन्द्रावती चिला फरा अरपा झड़कय देहरवरी॥
खिल खिल खिल खिल छत्तीसगढ़ी भाखा ह मुसकावत हे
दस साल के.....

सरगुजिया बस्तरिहा खुस हे चहकत जसपुरिया रायगढ़िया।
दुगिया रायपुरिया हाँसय संग संग नंदगइया बेलासपुरिया॥
नोनी-बाबू लइका-सियान बुढ़ुवा घलो मेछरावत हे
दस साल के.....


श्री राकेश तिमारी जी की उपरोक्त रचना को पढ़कर हमें आश्चर्ययुक्त प्रसन्नता हुई। उनके विषय में और जानकारी पाने के
लिए हम उत्सुक हो गए तो हमें पता चला कि वे एक लोक संगीतज्ञ हैं तथा उन्होंने अनेक लोकधुनों का निर्माण किया है। रायपुर के नगरघड़ी के निर्माण के सन्दर्भ में उनका नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में दर्ज है। उन्होंने लेड़गा ममा, जय महामाया, बंधना आदि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में अभिनय किया है। लगभग 20 टेलीफिल्मों सहित 5 फीचर फिल्मों में गीत लेखन का कार्य किया है तथा चर्चित नाटक "राजा भोकलवा", जिसका पूरे देश में अब तक 73 बार मंचन हो चुका है, का लेखन तथा निर्देशन भी किया है।

ऐसे प्रतिभाशाली श्री राकेश तिवारी जी से हमने अपना ब्लोग बनाने का अनुरोध किया तो उन्होंने हमारा अनुरोध मान लिया और शीघ्र ही वे हमारे बीच होंगे।