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Thursday, August 26, 2010

मैं एक हिन्दी ब्लोगर - अपंग, असहाय और निर्धन

मै एक हिन्दी ब्लोगर हूँ। 03-09-2007 को अपना हिन्दी ब्लोग बनाकर मैंने अपना पहला पोस्ट लिखा था और तब से आज तक मात्र कुछ माह को छोड़कर अपने ब्लोग में प्रायः रोज ही एक पोस्ट लिखते चला आ रहा हूँ।

क्यों लिखता हूँ मैं? क्या उद्देश्य है पोस्ट लिखने के पीछे मेरा?

आज जब ऐसे सवाल मेरे मन में उठते हैं तो याद आता है कि जब मैंने अपना हिन्दी ब्लोग बनाया था तो उस समय मेरे पास बहुत सारे उद्देश्य थे। मसलन अपने पोस्ट के माध्यम से अच्छी अच्छी जानकारी देना विशेषतः भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में, नेट में हिन्दी को बढ़ावा देकर हिन्दी की सेवा करना और साथ ही साथ हिन्दी ब्लोगिंग से कुछ कमाई कर के स्वयं भी लाभ लेना। पर आज सोचता हूँ तो लगता है कि ऐसा कुछ भी तो नहीं कर पाया मैं। मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे उद्देश्य बदल कर ढेर सारी टिप्पणियाँ पाना और संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर ही ऊपर चढ़ते जाना बन गए। आज मैं टिप्पणियों के पैबन्द और संकलकों की बैसाखी पाकर अत्यन्त ही सन्तुष्ट जीव बन गया हूँ।

मैं जानता हूँ कि नेट में आने वाले करोड़ों हिन्दीभाषियों में से मुझे शायद ही कोई पढ़ता है पर क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव? आखिर कुछ ऐसे लोग भी तो हैं जो मुझे पढ़ते हैं या फिर पढ़ने का दिखावा ही कर लेते हैं। क्या यह कम है मेरे लिए? आज तक मैंने जो कुछ भी लिखा है यदि मैंने उसे स्तर के पत्र-पत्रिकाओं में छपने भेजा होता तो अवश्य ही मेरी वे सब रचनाएँ वहाँ की कचरा पेटी की शोभा बढ़ाती होतीं और कहाँ मिलते मुझे पढ़ने वाले? तो क्यों ना बनूँ मैं सन्तुष्ट जीव?

मुझे सन्तुष्ट रहना है इसलिए यही सोचा करता हूँ कि हिन्दी में बहुत सारे महान साहित्यकार हुए हैं पर क्या किसी की भी रचना कभी 'बेस्टसेलर' बनी है? क्या किसी ने 'मैक्सिम गोर्की' के "द मदर", 'चार्ल्स डिकन्स' के "अ टेल ऑफ टू सिटीज़" आदि जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी हैं जिनके पाठक संसार भर में हैं? संसार की बात छोड़ें, अपने ही देश में ही 'जयशंकर प्रसाद' की "कामायनी", 'मैथिलीशरण गुप्त' जी के "साकेत" जैसी रचनाओं को कितने लोग पढ़ते हैं? घर में "रामचरित मानस" रहने पर भी किसने उसे पूरा पढ़ा है? तो फिर यदि मेरे लिखे को कोई पढ़ने वाला नहीं है तो इससे क्या फर्क पड़ जाता है? क्यों ना रहूँ मैं सन्तुष्ट? मुझे टिप्पणियाँ मिलती हैं, संकलकों के हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट ऊपर चढ़ता है यह क्या कम है मेरे लिए?

और लोग क्यों टिप्पणियाँ करते हैं यह तो मैं नहीं कह सकता पर मैं हर रोज हिन्दी के सैंकड़ों नहीं तो कम से कम पचास-साठ पोस्टों में जाकर इसलिए टिप्पणियाँ किया करता हूँ कि मुझे भी कम से कम पन्द्रह-बीस टिप्पणियाँ मिल जाए। "आप हर मरतबा एक बकवाइस लिखकर पाटक का टाइम खोटी करती है। बकवाइस बंद किरिए। ऐहसान होगी." जैसी टिप्पणियाँ पाकर भी मैं खुश होता हूँ! ऐसी टिप्पणियों को न मिटा कर मैं हिन्दी भाषा पर और खुद पर भी उपकार करता हूँ। इसे मिटा दूँगा तो हिन्दी में की गई एक टिप्पणी कम हो जाएगी और टिप्पणियाँ कम होने से नेट में हिन्दी का वर्चस्व कैसे बढ़ेगा? इसे मिटा दूँगा तो हॉटलिस्ट में मेरा पोस्ट नीचे उतर आएगा; और सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसे मिटा दूँगा तो मुझ पर अपनी आलोचना न सह पाने का इल्जाम भी लग जाएगा। तो आखिर क्यों मिटाऊँ मैं इसे? आखिर ये टिप्पणियाँ ही तो हैं जो मुझे गुदगुदाती हैं और मेरे पोस्ट को संकलकों के हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ा कर मुझे संतुष्टि प्रदान करती हैं।

मैं अपंग हूँ क्योंकि मैं अपने दम पर आगे नहीं बढ़ सकता। पर क्या हुआ? संकलकों की बैसाखी तो है मेरे पास! मैं निर्धन हूँ क्योंकि मेरे पास ऐसी लेखन क्षमता का धन नहीं है जो हजारों-लाखों की संख्या में पाठक जुटा सके। पर क्या हुआ? टिप्पणी देने वाले तो हैं मेरे पास! मैं असहाय हूँ क्योंकि मैं चाहकर भी अपनी इस स्थिति से उबर नहीं सकता। पर क्या हुआ? सन्तुष्ट और आत्ममुग्ध तो हूँ मैं!

Sunday, August 22, 2010

संकलक, पाठक और टिप्पणियाँ

संकलक एक इंटरनेट से सम्बन्धित शब्द है। संकलकों का काम होता है किसी एक विषय या भाषा के ब्लोग्स को एक स्थान पर दिखाना। जैसे कि समाचार संकलक समाचारों को एक ही स्थान पर दिखाते हैं तो हिन्दी भाषा के संकलक हिन्दी ब्लोग्स को एक स्थान पर! संकलकों का उद्देश्य होता है ब्लोग्स में पाठक भेजना।

जहाँ किसी ब्लोग में संकलकों से पाठक आते हैं वहीं अन्य तरीकों से भी आते हैं जैसे कि ब्लोग का अनुसरण कर के या विभिन्न सर्च इंजिनों में सर्च कर के। किसी पोस्ट में आने वाले पाठकों में से कुछ पाठक पोस्ट को पढ़कर चले जाते हैं, कुछ लोग अपनी टिप्पणी भी करते हैं और ऐसा भी होता है कि कई पाठक पोस्ट को बिना पढ़े भी चले जाते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि जो लोग टिप्पणी करते हैं वे किसी संकलक से ही पोस्ट में आए हों, वे कहीं पर से भी आए हो सकते हैं। मान लीजिए किसी संकलक ने किसी पोस्ट में कुल 31 पाठक भेजे और उस पोस्ट में 37 टिप्पणियाँ हैं। अब जिस संकलक ने पोस्ट में पाठक भेजे हैं वह अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में पोस्ट में की गई टिप्पणियों की संख्या को दर्शाता है तो क्या यह उचित है? संकलक से पोस्ट में जाने वाले 31 पाठकों में से कुछ ने ही तो टिप्पणी की होगी और शेष टिप्पणियाँ अन्य प्रकार से आए पाठकों की होगी। तो क्या यह 31 पाठक भेज कर 37 टिप्पणियों का श्रेय लेना नहीं है? और इसके उलटे उस संकलक ने किसी पोस्ट में 96 पाठक भेजे हैं किन्तु उस पोस्ट में मात्र 3 टिप्पणियाँ है तो उस पोस्ट को अपने डिफॉल्ट हॉटलिस्ट में न दिखाना क्या उस पोस्ट के साथ अन्याय नहीं है? संकलक के द्वारा भेजे गए पाठकों के आधार पर ही संकलक की डिफॉल्ट हॉटलिस्ट नहीं होनी चाहिए?

वैसे भी संकलकों का कार्य पोस्ट में महज पाठक भेजना होता है टिप्पणियाँ करवाना नहीं।

Saturday, July 24, 2010

चिट्ठाजगत के हॉटलिस्ट में ऊपर आना कौन कठिन बात है?

क्या आप चिट्ठाजगत के हॉटलिस्ट में ऊपर आना चाहते हैं?

तो यह कौन कठिन बात है?

बेशक आपका पोस्ट चिट्ठाजगत के हॉटलिस्ट में बहुत ऊपर आ सकता है। यहाँ तक कि टॉप में भी पहुँच सकता है!

तो इसके लिये सबसे पहले तो आप एक पोस्ट लिखिये, बकवास से बकवास पोस्ट भी चलेगा। अब अपने पोस्ट के तेरह-चौदह महाबकवास लाइनों को कॉपी करके एक के बाद एक टिप्पणी के रूप में खुद ही डालते जाइये। बीच-बीच में दस-बारह बार बेनामी बनकर भी टिप्पणी करते चले जाइये। हो गई ना पच्चीस छब्बीस टिप्पणियाँ! अब आपके पोस्ट को चिट्ठाजगत के हॉटलिस्ट में ऊपर पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता!

यदि कोई आपको अपने पोस्ट में खुद टिप्पणी देने की उलाहना दे तो पक्के बेशरम बन कर कह दीजिये कि दूसरों से फ़ोन करके, एस एम् एस करके मिमिया कर टिपण्णी करवाने से खुद ही अपने पोस्ट में टिप्पणियाँ कर लेना अधिक बेहतर है!

तो एक बार आजमा कर देखिये इस फॉर्मूले को, सफलता की पूरी-पूरी गारंटी है।

Saturday, July 17, 2010

कहीं ये बुढ़उ भी तो टिप्पणियों के तिकड़म से खुद को नहीं बढ़ा रहा है?

कल जब मैंने कम्प्यूटर बंद किया था तो मेरे पोस्ट "जिन्दगी के रंग कई रे" में 8 टिप्पणियाँ थीं और आज सुबह जब मैंने अपना कम्प्यूटर खोला तो पाया कि टिप्पणियों की संख्या 31 हो गई हैं। विश्वास नहीं हो पा रहा था अपनी आँखों पर इसलिये बार-बार आँखे मिचमिचा कर देख रहा था पर संख्या 31 ही दिखाई पड़ रही थी। एक बार मन में यह विचार भी आया कि शायद रात की अभी तक नहीं उतरी है। चिट्ठाजगत को खोलकर देखा तो वहाँ भी उसके हॉटलिस्ट में मेरी पोस्ट बहुत ऊपर है, इतना ऊपर कि पहले शायद ही उतना ऊपर पहुँचा हो।

ये बात अलग है कि मैं कई बार अपने पोस्टों में लिखते रहता हूँ कि विषय से असम्बन्धित टिप्पणियों का और टिप्पणियों की अधिक से अधिक संख्या का कोई महत्व नहीं होता, मैं ऐसी टिप्पणियों का विरोध करता हूँ। इस विषय में कई बार मेरी कई लोगों से बहस भी हो चुकी है। पर हूँ तो आखिर मैं एक तुच्छ ब्लोगिया ही! कोई ब्लोगिया हो और उसे बड़ी संख्या में टिप्पणी मिले तो उसका मन प्रसन्नता से ना झूमे यह तो हो ही नहीं सकता। मेरे मन में भी गुदगुदी होने लगी। बिना पिये ही तीन-तीन पैग का मजा आने लग गया।

टिप्पणी पाने का अर्थ एक प्रकार से प्रशंसा और सम्मान पाना ही होता है और प्रशंसा और सम्मान भला कौन नहीं पाना चाहता? प्रशंसा और सम्मान तो ऐसे हथियार हैं जिनसे आप हर किसी को घायल कर सकते हैं। पर याद रखने की बात यह है कि ये हथियार दोधारी होते हैं और इनके द्वारा आपको भी घायल किया जा सकता है। इसलिये जब कोई आपको प्रशंसा और सम्मान दे तो तनिक सतर्क रहना आवश्यक है और यदि कभी स्वयं की श्रीमती जी दे तो सतर्क रहना अति आवश्यक है क्योंकि समझ लीजिये कि उस दिन जरूर आपकी जेब कटने वाली है।

अस्तु, 31 टिप्पणियों का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, बड़े-बड़े ब्लोगरों को तो सैकड़ों की तादाद में टिप्पणियाँ पाते हैं। खैर, उनकी तो बात ही निराली है पर मुझ जैसे तुच्छ ब्लोगर को 31 टिप्पणियाँ मिलना तो बहुत भारी आश्चर्य की बात है। उत्सुकता हुई जानने की कि आखिर किन-किन भले लोगों ने हमें टिप्पणियाँ दी हैं। देखा तो वे सभी मेरे प्रेमीजन तो हैं हीं टिप्पणियाँ देने वाले जो कि प्रायः रोज मुझे टिप्पणी दे जाते हैं किन्तु तारीफबाज़ नामी एक मेरे नये प्रेमी आ गये हैं जिन्होंने मुझे एक साथ 19 टिप्पणियाँ दी हैं। मैं इन सज्जन को जानता तो नहीं पर इनके इस प्रगाढ़ प्रेम ने तो मुझे एवरेस्ट की चोटी पर ही चढ़ा दिया।

अब मैंने उनकी टिप्पणियों को पढ़ना शुरू किया तो पाया कि अपनी 13 टिप्पणियों में उन्होंने मेरे प्रोफाइल में दिये गये मेरे परिचय को कॉपी करके पेस्ट कर दिया है और 5 टिप्पणियों में अन्य लोगों के द्वारा दी गई टिप्पणियों को कॉपी-पेस्ट किया है। अवश्य ही वे मेरे बहुत बड़े हितचिन्तक हैं जो चाहते हैं कि मेरा पोस्ट हॉटलिस्ट में ऊपर रहे! मैं उनका अत्यन्त आभारी भी हूँ।

जब भी मैनें इस प्रकार की असम्बद्ध टिप्पणियों को किसी पोस्ट में देखा है तो मेरे मन में यही विचार आया है कि लोग स्वयं को चढ़ाने के लिये क्या क्या तिकड़म नहीं करते! अब मुझे भय होने लगा कि आज मेरे पोस्ट में इन टिप्पणियों को देख कर लोग यही सोचेंगे कि कहीं ये बुढ़उ भी तो टिप्पणियाँ के तिकड़म से खुद को नहीं बढ़ा रहा है? सो मैंने अपने अनन्य हितचिन्तक महोदय की टिप्पणियों को मिटा डाला।

यह खयाल करके कि अपनी सारी टिप्पणियों के मिट जाने से तारीफबाज़ जी का दिल पूरी तरह से ना टूट जाये और वे गाने लगें कि "इस दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा...", मैंने उनकी निम्न टिप्पणी को रहने दियाः
Tafribaz on July 16, 2010 10:36 PM said...

    बहुत बढिया
अन्त में मैं तारीफबाज़ जी को एक बार पुनः धन्यवाद देता हूँ और उनकी टिप्पणियाँ मिटाने के लिये खेद भी प्रकट करता हूँ। आशा है कि वे मेरे इस कार्य को अन्यथा नहीं लेंगे।

Monday, July 12, 2010

बड़ी बुरी लत है ब्लोगिंग की

जबसे ब्लोगिंग की लत लगी है हमको, हमेशा परेशान रहते हैं। ना दिन में चैन और ना रात में नींद। दिमाग रूपी आकाश में ब्लोग, ब्लोगर, पोस्ट, टिप्पणियाँ रूपी मेघ ही घुमड़ते रहते हैं। परेशान रहा करते हैं कि आज तो ले-दे के पोस्ट लिख लिया है हमने पर कल क्या लिखेंगे? कई बार मन में आता है कि कल से हर रोज लिखना बंद। निश्चय कर लेते हैं कि आज के बाद से अब सप्ताह में सिर्फ एक या दो पोस्ट लिखेंगे पर ज्योंही आज बीतता है और कल आता है कि कुलबुलाहट शुरू हो जाती है। तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा और अंगुष्ठ याने कि सारी की सारी उँगलियाँ रह-रह कर कम्प्यूटर के कीबोर्ड की ओर जाने लगती हैं। जब तक एक पोस्ट ना लिख लें, चैन ही नहीं पड़ता। पर रोज-रोज आखिर लिखें तो लिखें भी क्या? इसलिये कई बार कुछ भी नहीं सूझता तो चौथी-पाँचवी कक्षा में पढ़े दोहों को ही याद करके पोस्ट कर देते हैं जैसे किः

ब्लोगर को ना सताइये ....

देखा ना? 'निर्बल' लिखते-लिखते 'ब्लोगर' लिख मारे। हमेशा दिमाग में ब्लोग, ब्लोगर आदि चलता रहे तो यही तो होगा आखिर। अच्छा हुआ कि अपनी गलती ध्यान में आ गई और सुधार लिया किः

निर्बल को न सताइये जाकी मोटी हाय।
मुये चाम की साँस से लौह भस्म होइ जाय॥


यदि निर्बल के स्थान पर ब्लोगर पोस्ट हो गया होता तो सारे के सारे ब्लोगर हम पर चढ़ बैठते कि सर्वशक्तिमान ब्लोगर को हमने निर्बल कैसे बना दिया।

उधर श्रीमती जी अलग मुँह फुलाये रहती हैं कि हम घर का कोई काम-काज ही नहीं करते, यहाँ तक कि साग-सब्जी तक लेने नहीं जाते। हमेशा बड़बड़ाती रहती हैं आग लगे इनके कम्प्यूटर में ...। पर ब्लोगिंग के लत ने हमें इतना बेशर्म बना दिया है कि उनकी बड़बड़ाहट का हम पर कुछ भी असर नहीं होता, बड़बड़ाती रहें वो अपनी बला से।

ऐसा भी नहीं हो पाता कि पोस्ट लिख लेने के बाद हम घर के काम-धाम में जुट जायें क्योंकि हर दो-तीन या पाँच मिनट में:

अंदाज अपना आईने में देखते हैं वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो


के तर्ज में पर देखना रहता है कि टिप्पणी आई कि नहीं, और आई तो कितनी टिप्पणियाँ आई हैं? और इस जुनून में हम कम्प्यूटर से चिपके ही रहते हैं। टिप्पणियाँ आती हैं तो मन विभोर हो जाता है, हम आत्म-मुग्ध हो जाते हैं और पत्नी जी के गुस्से के साथ ही साथ दुनिया-जहान के सारे दुख-तकलीफों से होने वाली कुढ़न से कहीं बहुत दूर पहुँच जाते हैं, भीतर ही भीतर वैसा ही कुछ होने लगता है जैसे कि तीन पैग पेट के भीतर चले जाने पर होता है।

और यदि एक भी टिप्पणी ना मिले तो....

हम तो मनाते हैं कि भगवान ना करे कि ऐसी स्थिति आये किन्तु "आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम"। आसमां वाला जमीं वाले की सुनता कहाँ है और प्रायः एक भी टिप्पणी ना मिलने वाली स्थिति आती ही रहती है। टिप्पणियाँ ना मिलने पर मन मायूस हो जाता है। खुद से कहने लगते हैं - 'तुफ है तुझपर जो एक ऐसा पोस्ट नहीं लिख सकता जिसमें टिप्पणियाँ आयें, अपने आप को बहुत भारी ब्लोगर समझता है। अब पता चला तुझे तेरी औकात! डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में।'

पर अपने आप को आखिर धिक्कारा भी कब तक जा सकता है इसलिये यही सोचकर तसल्ली दे लेते हैं अपने आपको कि लोगों में इतनी अकल नहीं है जो हम जैसे महान ब्लोगर के पोस्ट को समझ पायें। जब पोस्ट को समझेंगे ही नहीं तो भला टिप्पणी कहाँ से करेंगे?

तो भैया, कहाँ तक बुराइयाँ गिनायें ब्लोगिंग की, बस इतना ही कह सकते हैं कि ब्लोगिंग की लत बड़ी बुरी होती है।

Wednesday, July 7, 2010

बंद रहा टिप्पणी-बाजार... ब्लोगजगत में मचा हाहाकार

"बिन टिप्पणी सब सून!"

पोस्ट लिखें, टिप्पणियाँ भी मिले पर टिप्पणियाँ पोस्ट में ना दिखे तो हिन्दी ब्लोगजगत में हाहाकार मचना तो स्वाभाविक ही है। परसों याने कि पाँच जुलाई की शाम से ही कुछ ऐसा होने लग गया कि मेल में तो सूचना मिलती है कि पोस्ट पर टिप्पणियाँ आई है किन्तु डैशबोर्ड पर और पोस्ट पर वे टिप्पणियाँ नदारद हैं। ऐसी स्थिति कल दिन भर रही। गहन चिन्ता में डाल दिया गूगल बाबा ने ब्लोगरों को।

अब ब्लोगर बाबा भी क्या करे? बारहों महीने-आठों काल, प्रत्येक दिन चौबीसों घंटे अनवरत रूप से काम करते रहने पर कभी-कभी बीमार हो जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं है। सो गूगल बाबा के ब्लोगर की तबीयत भी शायद खराब हो गई होगी। बस बीमारी की इस अवस्था में उन्होंने टिप्पणियाँ दिखाना बंद कर दिया।

अब हिन्दी ब्लोगिंग का तो अस्तित्व ही टिप्पणी से है, टिप्पणियाँ ना मिले तो लोग ब्लोगिंग ही ना करें। हिन्दी ब्लोगिंग से ना तो बड़ी संख्या में पाठक ही मिल पाते हैं और ना कुछ कमाई ही हो पाती है। बस टिप्पणियाँ ही तो मिलती हैं और यदि टिप्पणियाँ मिलनी भी बंद हो जाये तो भला क्यों करेगा कोई हिन्दी ब्लोगिंग?

शुक्र है कि आज टिप्पणियाँ दिखाई देने लग गई हैं और लगता है कि गूगल बाबा का ब्लोगर अब स्वस्थ हो चले हैं। हमारी कामना यही है कि वे सदैव स्वस्थ ही रहें।

Monday, June 7, 2010

तिकड़म से ही मिलती हैं टिप्पणियाँ

टिप्पणियाँ पाना भला किसे अच्छा नहीं लगता? ऊपर-ऊपर से भले ही हम कहें कि हम टिप्पणियों की परवाह नहीं करते पर जब हम अपने भीतर झाँकते हैं तो लगता है कि हमें भी टिप्पणियाँ पाने में खुशी होती है। हिन्दी ब्लोगिंग में टिप्पणियों के महत्व को इतना बढ़ा-चढ़ा दिया गया है कि प्रतीत होने लगा है कि हिन्दी ब्लोगिंग का मुख्य उद्देश्य मात्र टिप्पणी पाना ही है। हिन्दी ब्लोगरों के प्राण टिप्पणियों में ही बसते हैं। अधिकतर ब्लोगर जिन्हें टिप्पणियाँ नहीं मिलतीं या कम टिप्पणियाँ मिलती हैं, स्वयं को अधमरा सा महसूस करने लगते हैं क्योंकि नामी-गिरामी, बड़े तथा नंबर एक ब्लोगर वे ही माने जाते हैं जिनके पोस्टों में टिप्पणियों के अंबार लगे रहते हैं।

यदि आपने अच्छी पोस्ट लिखी है तो हो सकता है कि दो-चार टिप्पणियाँ बिना किसी प्रयास के मिल जायें किन्तु ढेर सारी टिप्पणियाँ बिना तिकड़म के मिलना मुश्किल ही नहीं असम्भव है। अब ये तिकड़म क्या होते हैं यह मत पूछियेगा। यदि पूछेंगे तो भी आपको जवाब नहीं मिलने वाला क्योंकि सभी के अपने-अपने तिकड़म होते हैं जो कि उनके बिजनेस सीक्रेट्स होते हैं। अक्सर छोटे-मोटे तिकड़म तो हम भी भिड़ाते हैं पर कल हमने अपने पोस्ट "वैदिक कर्मकाण्ड के सोलह संस्कार" के लिये कुछ भी तिकड़म जानबूझ कर नहीं भिड़ाया क्योंकि हम जानना चाहते थे कि क्या ऐसे भी कुछ लोग हैं जो सोलह संस्कारों को जानने की रुचि रखते हैं। नतीजा यह हुआ कि पोस्ट पूरी तरह से पिट गई। पसन्द के नाम पर शून्य रहा वह पोस्ट पर सौभाग्य से चार टिप्पणियाँ मिल गईं। किन्तु हम जानते हैं कि हमारे इस पोस्ट की उम्र मात्र चौबीस घंटे ना होकर बहुत लंबी है और ऐसे पाठक, जिन्हें सोलह संस्कारों के विषय में जानने की रुचि होगी, हमेशा सर्च इंजन से खोज कर आते रहेंगे हमारे इस पोस्ट में।

कभी-कभी संयोग से बिना तकड़म भिड़ाये भी अच्छी-खासी टिप्पणियाँ मिल जाती हैं क्योंकि हिन्दी ब्लोगिंग भी हिन्दी फिल्मों जैसा है जहाँ पर अच्छी फिल्में पिट जाती हैं और "जै संतोषी माँ" जैसी फिल्में सालों तक बॉक्स आफिस में हिट बनी रह जाती हैं। किन्तु ऐसा बार-बार नहीं बल्कि कभी-कभार ही होता है।

विषय आधारित ब्लोग्स को या तो टिप्पणियाँ मिलती ही नहीं हैं या फिर नहीं के बराबर मिलती हैं, शायद यही कारण है कि हिन्दी में विषय आधारित ब्लोग बनाने का चलन नहीं के बराबर है। हम तो सोचते थे कि ब्लोगिंग का उद्देश्य समाज, भाषा साहित्य आदि की सेवा करते हुए स्वयं का भी कल्याण करना है और इसीलिये हमने "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" जैसा विषय आधारित ब्लोग बनाया था। किन्तु आजकर जिस प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये के लिये घमासान मचा हुआ है उसे देखकर लगता है कि हमारी सोच बिल्कुल गलत है और ब्लोगिंग का उद्देश्य महज टिप्पणियाँ बटोर कर आत्म-तुष्टि पाना ही है। "संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" अब अपनी समाप्ति की ओर है। इसके समाप्त होने पर हमने तुलसीकृत "रामचरितमानस" की पर ब्लोग बनाने का निश्चय किया था किन्तु अब इस विषय में सोचना पड़ेगा।

पुनश्चः कभी कभी हिन्दी ब्लोगिंग की दशा देखकर इतनी निराशा छा जाती है कि नकारात्मक बातें सूझने लगती हैं किन्तु रंजन जी की टिप्पणी ने मुझे संबल प्रदान किया है और मैं "रामचरितमानस" पर ब्लोग अवश्य बनाऊँगा।

Sunday, May 23, 2010

बैंड बाजा से दिल्ली ब्लोगर्स मिलन से क्या सम्बन्ध? ... आखिर कितनी टिप्पणियाँ मिटायें हम?

कल के हमारे पोस्ट का विषय था बैंड बाजा। लोगों ने उसे पढ़ा भी और और उस पर अपनी राय भी व्यक्त किया। बहुत अच्छा लगा हमें, आखिर हम भी जाने माने नहीं तो कम से कम एक तुच्छ ब्लोगर ही हैं जो अपने पोस्ट में टिप्पणियाँ पा कर फूला नहीं समाता। किन्तु उनमें दो टिप्पणियाँ दिल्ली ब्लोगर्स मिलन के सम्बन्ध में थीं। बहुत सोचने विचारने के बाद भी हमारी अल्पबुद्धि यह समझ ही नहीं पाई कि आखिर बैंड बाजा से दिल्ली ब्लोगर्स मिलन से सम्बन्ध ही क्या है? हमें लगा कि वे टिप्पणियाँ हमारे टाट रूपी पोस्ट में मखमल रूपी पैबंद हैं। अब मखमल और टाट का मेल तो अच्छा लग ही नहीं सकता ना? इसीलिये तो मुहावरा बनाया गया है "मखमल में टाट का पैबंद"। और फिर यहाँ तो बात ही उलटी थी याने कि यहाँ पर "टाट में मखमल का पैबंद" था।

हमें लगा कि ये दोनों टिप्पणियाँ तो हमारे "क्या आपको याद है कि पिछली बार कब सुना था आपने बैंड बाजा?" का ही बैंड बाजा बजा दे रही हैं। अतः विवश होकर हमें वे दोनों टिप्पणियाँ मिटानी पड़ीं। हाँ टिप्पणीकर्ता की भावनाओं को ध्यान में रखकर हमने अपने उसी पोस्ट में अपनी यह टिप्पणी भी कर दीः

कुमार जलजला जी,

आपने मेरे पोस्ट पर दो दो बार टिप्पणियाँ की जिसके लिये मैं आपको धन्यवाद देता हूँ किन्तु आपकी दोनों टिप्पणियों का इस पोस्ट के विषय से कुछ भी सम्बन्ध ना होने के कारण विवश होकर मैं इन्हें मिटा रहा हूँ जिसके लिये मुझे खेद है।
मित्रों, ऐसा नहीं है कि कुमार जलजला, जो कि किसी का छद्मनाम है, ही ऐसी टिप्पणी करते हैं बल्कि और भी बहुत से लोग भी ऐसा करते हैं। मेरे साथ बहुत बार ऐसा हुआ है कि मेरे पोस्ट का विषय कुछ और होता है और उसमें टिप्पणियाँ किसी ऐसे विषय पर आती हैं जिनका मेरे पोस्ट के विषय से दूर-दराज का भी सम्बन्ध नहीं होता। ऐसी टिप्पणियों को पढ़कर क्या आपको नहीं लगता कि लोग पोस्ट को पढ़े बिना ही कुछ भी टिप्पणी कर देते हैं? लोग ऐसा क्यों करते हैं यह समझ के बाहर की बात है। पुरानी कहावत है "अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग" पर आज तो लगता है कि अपना राग अलापने के लिये अपनी ढपली की भी आवश्यकता नहीं रही है, दूसरे की ढपली पर ही अपना राग अलाप दो याने कि किसी के ब्लोग पर जा कर कुछ भी अनर्गल टिप्पणी कर दो।

अन्ततः हम यही कहना चाहते हैं कि ऐसी टिप्पणियों को मिटाना एक विवशता हो जाती है। किन्तु टिप्पणी मिटाने के लिये भी कुछ ना कुछ समय तो बर्बाद होता ही है ना? तो आखिर कितनी टिप्पणियाँ मिटायें हम?

Tuesday, April 27, 2010

ट्रिक्स टिप्पणियाँ बढ़ाने के

हिन्दी ब्लोगिंग के लिये बने संकलकों के हॉटलिस्ट के तीन मुख्य आधार, व्ह्यूज़, पसंद और टिप्पणियों की संख्या हैं। इन्हीं तीनों के बढ़ने से कोई पोस्ट हॉटलिस्ट में ऊपर चढ़ते जाता है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि यदि कोई अपने पोस्ट में येन-केन-प्रकारेण टिप्पणियों की संख्या बढ़ाता जाये तो वह पोस्ट हॉटलिस्ट में चढ़ते चला जायेगा। टिप्पणियों की संख्या बढ़ाना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। इसके लिये कई तरीके हैं जैसे किः
  • पोस्ट लिखने के बाद स्वयं ही टिप्पणी करना।
  • बेनामी बनकर खुद ही टिप्पणी करना।
  • मित्रों से सम्पर्क कर टिप्पणियाँ करवाना।
  • एक ही टिप्पणी को बार-बार दोहराते चले जाना।
आदि-आदि इत्यादि ...

यदि संकलक चाहे तो इन सारे तरीकों को खत्म कर सकते हैं, बस इसके लिये उन्हें सिर्फ ऐसी व्यवस्था करना पड़ेगा कि पोस्टकर्ता की और एक ही टिप्पणीकर्ता की एक से अधिक टिप्पणियाँ टिप्पणियों की संख्या में जुड़ने ना पाये। ऐसी व्यवस्था करना मुश्किल कार्य नहीं है।

Saturday, February 13, 2010

तो अब हम भी चलें

मजबूरी है। जाना तो पड़ेगा ही। जिस प्रकार से संसार असार है उसी प्रकार से यह ब्लोगजगत भी असार है। कब तक बने रहेंगे यहाँ? कब तक सींग कटा कर बछड़ों में शामिल होते रहेंगे? कब तक नये लोगों को पुरानी बातें बता बता कर बोर करते रहेंगे? आखिर कब तक? हमारे कई साथी तो इस नश्वर संसार को ही छोड़ कर चले गये हैं अब तक और एक हम हैं कि साठ साल की उम्र होने के बावजूद भी लटके हुए हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि शिरीष के फल सूख जाने पर भी पेड़ से लटके ही रहते हैं। फूल-पत्तियाँ झड़ जाती हैं पर ये सूखे और हवा में डोलते फल हैं कि लटके ही रहते हैं। वाह रे शिरीष के फल!

अरे भाई हमने तो हमारे टिप्पण्यानन्द जी के ब्लोग छोड़ने वाली धमकी वाले फॉर्मूले को आजमाने के लिये ये सब लिख डाला वरना पक्के बेशर्म हैं हम। आप हमें अगर भगाओगे भी तो भी नहीं जाने वाले। वैसे तीन चार दिनों के लिये थोड़ा दूर होना पड़ेगा हमें आप लोगों से, आखिर हमारी प्यारी भांजी की शादी जो है १६ तारीख को! सबसे बड़े मामा हैं हम उसके तो वहाँ रहना तो होगा ही हमें। वैसे काम वाम करने के लिये बहुत लोग हैं वहाँ पर, हमारा काम तो केवल उन लोगों के काम पर निगाह रखना ही होगा। फिर भी कोशिश यही रहेगी कि भले ही टिप्पणी कम कर पायें या नहीं ही कर पायें पर कम से कम हमारे पोस्ट तो नियमित रहें। याने कि छुट्टी लेने के बाद भी आप लोगों से मिलने का प्रयास करते ही रहेंगे।

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"संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण" का अगला पोस्टः

हनुमान जी का लंका में प्रवेश - सुन्दरकाण्ड (२)

Tuesday, February 2, 2010

ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है ... ब्लोगिंग फॉर्मूले

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"

"लिख्खाड़ानन्द जी, हम तो आपके लेखन के कायल हैं! लाज़वाब लिखते हैं आप! लोग आपको उस्ताद जी कहते और मानते हैं। क्या बात है आपकी! आज हम जानना चाहते हैं कि आखिर इतना अच्छा लिख कैसे लेते हैं जिसे पढ़ने और टिपियाने के लिये लोग दौड़े चले आते हैं? भई मानना पड़ेगा कि इधर आपकी पोस्ट आई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी शुरू हो जाती है, लगता है कि लोग इंतजार करते रहते हैं कि कब आपका पोस्ट आये और कब वे टिप्पणी करें। हमें भी बताइये ना कि आप इतना अच्छा कैसे लिख लेते हैं? आखिर आपकी सफलता का रहस्य क्या है?"

"अरे टिप्पण्यानन्द जी, भला ऐसे रहस्य कभी किसी को बताये जाते हैं क्या? हमसे हमारा रहस्य जानकर कल को खुद हमारी जगह लेना चाहते हैं क्या आप?"

"हे हे हे हे! हम भला क्या खा के आपकी जगह लें पायेंगे? हमें लिखना आता ही कहाँ है? बस कुछ ऐसा वैसा घसीट दिया करते हैं। हमें तो बताना ही पड़ेगा आपको अपना रहस्य।"

"ठीक है हम आपको बताते हैं अपना रहस्य पर आप किसी और को मत बताना। देखिये टिप्पण्यानन्द जी! हिन्दी ब्लोग्स को प्रायः हिन्दी ब्लोगर्स ही पढ़ते हैं। इसलिये सबसे पहले तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जो भी पोस्ट लिखा जाये वह सामान्य पाठकों को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि दूसरे ब्लोगरों को ध्यान में रखकर लिखी जाये। सामान्य पाठक तो किसी विषय पर अच्छी से अच्छी जानकारी वाली अच्छी सामग्री (कंटेंट्स) पढ़ना पसंद करते हैं। अब हमारे पोस्टों को तो पढ़ने वाले हमारे साथी ब्लोगर्स ही हैं जिनके पास पहले से ही बहुत सारी जानकारी है इसलिये यदि आप कोई जानकारी वाली पोस्ट लिखोगे तो वह फ्लॉप ही होने वाला है। अब देखिये ना ललित शर्मा जी ने पोस्ट लिखा "सफलता कैसे मिले?" तो उस पोस्ट ने कितने लोगों को आकर्षित किया? अरे भाई जो लोग पहले से ही सफल हैं उन्हें अपने पोस्ट में सफलता सिखाओगे तो भला वे क्यों उस पोस्ट को पढ़ने के लिये आयेंगे? जो पहले से ही सफल हैं उन्हें सफलता सिखाना, जिनके पास पहले से ही जानकारी है उन्हें जानकारी देना, जिनका पेट पहले से ही भरा हुआ है उन्हें खाना देना भला कहाँ की बुद्धिमत्ता है?"

"पर पोस्ट में अच्छी सामग्री नहीं होगी तो नेट में हिन्दी आगे कैसे बढ़ेगी?"

"अच्छी सामग्री? अरे कैसी बात कर रहे हैं आप? नेट में क्या हिन्दी आगे बढ़ रही है? अरे नेट में तो हिन्दी ब्लोगर्स ही बढ़ते जा रहे हैं जो आपस में एक दूसरे को पढ़ें या ना पढ़ें पर टिप्पणी जरूर करते हैं। यदि नेट में हिन्दी आगे बढ़ रही होती तो ब्लोग्स को पढ़ने के लिये ब्लोगर्स के साथ ही साथ आज जो करोड़ों हिन्दीभाषी नेट यूजर्स हैं वे भी क्या नहीं आते? आपने अभी ही हमारे लेखन को लाजवाब बताया है क्योंकि आप एक ब्लोगर हैं। पर हम जानते हैं कि हम अपने पोस्टों को किसी अच्छी पत्रिका में प्रकाशित करने के लिये भेज दें तो वह प्रकाशित होने के बदले कूड़ेदान में ही जायेगा। संपादक को चाहिये ऐसी रचनाएँ जिन्हें पाठक पसंद करे। हमारे पास ऐसी रचना तो है ही नहीं। हम तो सिर्फ वो लिखते हैं जिन पर दूसरे ब्लोगर अपनी टिप्पणी दें। हमारी ब्लोगिंग तो मौज लेने के लिये होती है, टिप्पणी पाने के लिये होती है, गुट बनाने के लिये होती है, नये ब्लोगर बनाने के लिये होती है नये नये पाठक लाने के लिये थोड़े ही होती है। हम कौन सा यहाँ हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिये आये हैं? हमें तो खुद को आगे बढ़ाना है भाई! हम आगे बढ़ेंगे तो हिन्दी भी अपने आप ही आगे बढ़ जायेगी। फालतू बातें करके टोकते रहते हैं आप। जो हम बता रहे हैं उसे सुनना है तो सुनिये नहीं तो अपना रास्ता लीजिये।"

"अरे आप तो नाराज ही हो गये। चलिये अब बीच में कुछ भी नहीं बोलेंगे हम, आप जारी रखिये।"

"तो मैं बता रहा था कि पोस्ट लिखते समय जानकारी आदि को ताक में रखकर इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हमारे ब्लोगर मित्र क्या पसंद करते हैं। यदि आपने उनकी पसंद को जान लिया तो समझ लीजिये कि आप सफल भी हो गये।"

"तो यही बताइये कि क्या पसंद करते हैं हमारे ब्लोगर मित्र?"

"उनकी सबसे पहली पसंद है कि लोग उनके पोस्टों में टिप्पणी करें। अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं की ब्लोगिंग में अच्छे पोस्ट का मापदंड पाठकों की संख्या और डिग, टेक्नोराटी जैसे सोशल बुकमार्किंग साइट में बुकमार्क्स की संख्या होती है पर हिन्दी ब्लोगिंग में अच्छे पोस्ट का मापदंड पोस्ट में मिली टिप्पणियों की संख्या होती है। इसलिये सबसे पहले तो आप दूसरे ब्लोगर्स के पोस्टों में जाकर टिप्पणी कीजिये। इससे फायदा यह होगा कि जब आपका पोस्ट प्रकाशित होगा तो वे लोग भी आपके पोस्ट में टिप्पणी करने जरूर आयेंगे। हो सकता है कुछ सिरफिरे टाइप के लोग न भी आयें पर यकीन मानिये कि बहुत से लोग आयेंगे और जो लोग नये नये ब्लोगर बने हैं वे लोग तो गारंटीड आयेंगे।"

"यहाँ तक तो हम आपकी बात समझ गये जी, पर टिप्पणी करने के लिये सारे पोस्टों को पढ़ना तो पड़ेगा। इतना समय हम कैसे निकालें?

"अरे टिप्पण्यानन्द जी! रहे आप भी पोंगू के पोंगू ही। टिप्पणी करने के लिये भला पोस्टों को पढ़ने की क्या जरूरत है? ये रही टिप्पणियों की लिस्टः

  • शुभकामनाएँ
  • बधाई
  • बधाई स्वीकारे
  • बहुत-बहुत बधाईयाँ
  • शुक्रिया!
  • अच्छा आलेख
  • अनोखी पोस्ट
  • अच्छी रचना
  • बहुत ही सटीक रचना
  • इस रचना के लिये आभार
  • सही लिखा है
  • बढिया लिखा है आपने
  • मजा आ गया पढ़ कर।
  • बहुत सुंदर
  • सत्य वचन!
  • nice
  • आपके विचारो से सहमत हूँ
  • फलाने (जिसे आप अच्छा टिप्पणीकर्ता समझते हैं) से सहमत
  • आपकी लेखनी तो कमाल करती ही है
  • आपकी लेखनी के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाना है
बस आप इनमें से किसी एक को चेंप दीजिये।"

"अच्छा अब यह बताइये कि पोस्ट में क्या लिखा जाये जो पढ़ने वालों को पसंद आये?"

"सीधी सी बात है कि जब भी किसी प्रकार का विवाद होता है तो सभी को मजा आता है। इसलिये ऐसे पोस्ट लिखिये जिससे विवाद की स्थिति पैदा हो। आप चाहो तो किसी बहाने से दो लोगों को आपस में लड़वा दो और उसी पर पोस्ट लिख डालो।"

"भाई ये लोगों को लड़वाना, झगड़वाना और विवादास्पद पोस्ट लिखना तो अपने बस की बात नहीं है। कोई और तरीका बताइये।"

"तो फॉर्मूलों का प्रयोग कीजिये, जिस प्रकार से हिन्दी फिल्मों को हिट कराने के फॉर्मूले होते हैं उसी प्रकार से पोस्ट को भी हिट कराने के फॉर्मूले होते हैं।"

"हमें भी कुछ फॉर्मूले बताइये ना।"

"ठीक है हम आपको फॉर्मूलों की लिस्ट दे रहे हैं पर इन फॉर्मूलों के आधार को पहले समझ लीजिये। यह तो आप जानते ही हैं कि मॉडर्न आर्ट को कोई समझ नहीं पाता पर तारीफ उसकी खूब करता है। ऐसे ही जो पोस्ट ऊपर ही ऊपर से गुजर जाये वह पोस्ट खूब पसंद की जाती है और उसे खूब टिप्पणियाँ मिलती हैं। तो यह है फॉर्मूलों की लिस्टः
  • पोस्ट किसी एक विषय से शुरू कीजिये और उसका अन्त किसी और विषय से करिये
  • ऑफिस में सहकर्मियों के साथ की गई बातचीत ऑफिस में किये गये काम आदि को लिख कर उसे हिन्दी ब्लोगिंग से जोड़ दीजिये
  • रात को नींद पूरी क्यों नहीं हुई, खाना हजम क्यों नहीं हुआ आदि बातें बताते हुए पोस्ट लिख मारिये
  • आप कहाँ गये, क्या किये इन बातों को लिख कर उन्हें दर्शन शास्त्र से जोड़ दीजिये
  • कुत्ते के पिल्ले, बिल्ली के बच्चे, बकरी के मेमने इत्यादि पर चित्र सहित पोस्ट लिखिये और उन्हें मानवीयता के साथ जोड़ दीजिये
  • भिगमंगे, बावले आदि पर पोस्ट लिखकर दया, करुणा आदि मानवीय भावनाओं के साथ जोड़ दीजिये
  • शुद्ध हिन्दी में कभी पोस्ट मत लिखिये बल्कि पोस्ट के बीच बीच में ऐसे अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अवश्य कीजिये जिसका जो जैसा भी चाहे अर्थ निकाल सके, आप तो जानते ही हैं कि एक ही अंग्रेजी शब्द के कई हिन्दी अर्थ होते हैं, अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से पोस्ट प्रभावशाली बनता है
  • पोस्टों में हिन्दी भाषा तथा शब्दों के साथ खूब खिलवाड़ याने कि प्रयोग कीजिये ताकि हिन्दी भाषा और अधिक निखरे और सँवरे
  • पोस्ट के बीच-बीच में अंग्रेजी और हिन्दी दोनों के कुछ क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग करिये जिनका अर्थ या तो समझ में ही ना आये या फिर समझने के लिये डिक्शनरी देखना पड़े
  • यात्रा के दौरान कहाँ कहाँ क्या क्या हुआ और क्या तकलीफ हुई बताते हुए पोस्ट लिख मारिये और तकलीफ के लिये सरकारी विभाग को दोषी ठहरा दीजिये
  • यदि कुछ विशेष जानकारी दे रहे हैं तो आधी अधूरी दीजिये और जहाँ से जानकारी मिली उस अंग्रेजी साइट का लिंक दे दीजिये
"तो टिप्पण्यानन्द जी, अभी इतने ही फॉर्मूलों से काम चलाइये, बाद में और भी फॉर्मूले देंगे हम आपको।"

"धन्यवाद लिख्खाड़ानन्द जी! अब मैं चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्काऽर!"

Wednesday, January 27, 2010

मैं टिप्पणी क्यों करता हूँ

सभी पोस्टों को पढ़ना तो बहुत मुश्किल क्या असम्भव है क्योंकि मेरी कुछ रुचियाँ हैं और जिन पोस्टों के विषय मेरी रुचि के नहीं होते उन्हें प्रायः मैं नहीं ही पढ़ पाता। फिर भी रोज ही बहुत सारे पोस्टों को पढ़ता हूँ मैं किन्तु टिप्पणी कुछ ही पोस्टों में करता हूँ।

मैं उन्हीं पोस्टों में टिप्पणी करता हूँ जिन्हें पढ़कर प्रतिक्रयास्वरूप मेरे मन में भी कुछ विचार उठते हैं। जिन पोस्टों को पढ़कर मेरे भीतर यदि कुछ भी प्रतिक्रिया न हो तो मैं उन पोस्टों में जबरन टिप्पणी करना व्यर्थ समझता हूँ। यदि मेरे किसी पोस्ट को पढ़कर किसी पाठक के मन में कुछ विचार न उठे तो मैं उस पाठक से किसी भी प्रकार की टिप्पणी की अपेक्षा नहीं रखता।

कुछ ब्लोगर्स ऐसे भी हैं जिनकी लिखने की शैली मुझे शुरू से ही प्रभावित करती रही है। ऐसे ब्लोगर्स से मैं स्वयं को भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ और जहाँ तक हो सके उनके पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का प्रयास करता हूँ।

विवाद उत्पन्न करने के उद्देश्य से लिखे गये पोस्टों पर टिप्पणी करने से मैं भरसक बचने की कोशिश करता हूँ।

मैं नये ब्लोगरों के पोस्टों पर प्रोत्साहन देने के लिये टिप्पणी महत्व को समझता हूँ किन्तु यह भी मानता हूँ कि यदि वे नेट में हिन्दी को अच्छी सामग्री दे पा रहे हैं तभी वे टिप्पणी पाने के योग्य हैं अन्यथा नहीं।

मेरे विचार से टिप्पणियाँ पोस्ट को पढ़ने के प्रतिक्रियास्वरूप मन में उठे विचार हैं न कि एक दूसरे की पीठ थपथपाने की कोई चीज। यदि किसी पोस्ट, चाहे वह पुराने ब्लोगर की हो या नये की, में अच्छी सामग्री मिलती है तो उस पोस्ट को टिप्पणी पाने से कोई भी नहीं रोक सकता।

मेरा मानना यह भी है कि जहाँ सटीक टिप्पणियाँ प्रोत्साहित करती है वहीं पोस्ट के विषय से हटकर तथा समझ में न आने वाली टिप्पणियाँ पढ़ कर दिमाग खराब हो जाता है।

Friday, January 8, 2010

सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ

"क्या बात है टिप्पण्यानन्द जी? किस सोच में डूबे हुए हैं?"

"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"

"टिप्पणियों की दूकान?"

"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"

"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"

"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?

"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"

"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"

"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"

"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"

"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"

"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"

"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"

"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"

"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"

"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"

"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"

"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"

"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"

"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"


(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)

टिप्पणी करना है याने कि करना है भले ही उस टिप्पणी से पोस्ट की गम्भीरता ही खत्म हो जाये

पता नहीं और किसी और को लगता है या नहीं, पर मुझे तो बहुत अजीब सा लगता जब मैं किसी गम्भीर विषय वाले पोस्ट पर हँसी मजाक वाली टिप्पणी देखता हूँ। बहुत बार मुझे कई पोस्टों में कुछ ऐसी ही टिप्पणियाँ दिखाई पड़ती हैं जो कि किसी गम्भीर विषय को, जो कि एक स्वस्थ चर्चा के उद्देश्य से लिखी गई हो, महज हास्य बना कर रख देती हैं। मेरे इस कथन को पढ़कर अब आप मुझसे लिंक्स माँगेंगे मुझसे। पर मैं कोई भी लिंक नहीं देने वाला हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि जो कुछ मुझे दिखाई देता है वह आप लोगों को भी दिखाई देता होगा या फिर मैं ही मूर्ख हूँ।

आज मैं कुछ और पोस्ट लिखना चाहता था किन्तु कुछ देर पहले कुछ ऐसी ही टिप्पणियाँ मुझे दिखाई पड़ीं तो मैंने अपने मन में जो विचार उठा उसे यहाँ पर एक माइक्रोपोस्ट के रूप में आपके समक्ष रख दिया। मेरा किंचित मात्र भी यह अभिप्राय नहीं है कि आप लोगों को भी वैसा ही लगे जैसा कि मुझे लगता है। आपको यदि ऐसी टिप्पणियाँ अच्छी लगती हैं तो बहुत ही अच्छी बात है।

Thursday, January 7, 2010

न खुद किसी का सम्मान करेंगे और न ही किसी को करने देंगे

"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"

"नमस्काऽऽर! नमस्कार, टिप्पण्यानन्द जी!!"

"सुना है कि कोई ब्लॉगर सम्मान आयोजित किया जा रहा था पर उसे स्थगित कर दिया गया।"

"अजी काहे का ब्लॉगर सम्मान? हम क्या सम्मान और रुपये के भूखे हैं? क्या हमारा साहित्यिक कद सम्मान, पुरुस्कार वगैरह का मोहताज है? हम क्या समझते नहीं हैं कि ये सम्मान करने वाले तो अपनी प्रसिद्धि के लिये टोटके अपना कर चिरकुटयाई कर रहे हैं। ना जाने कैसे कैसे अजीब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। चले हैं सम्मान करने। आज के जमाने में क्या कोई किसी एक ब्लॉगर के सम्मान को सभी ब्लॉगरों का गौरव समझ सकता है क्या? कुछ ऐरे गैरे ब्लॉगरों की लिस्ट बना दिया वोटिंग के लिये। क्या बाकी ब्लॉगर मूर्ख हैं? अजी ये तो एक चाल थी एक का सम्मान कर के सौ का अपमान करने की, एक को आगे बढ़ा कर सौ को पीछे कर देने की। चाल चलना क्या सम्मान करने वाले ही जानते हैं? हम भी जानते हैं चाल चलना! इसीलिये हमने ऐसी चाल चली कि दाँतों पसीने आ गये सम्मान करने वाले की। पोल खोल कर रख दिया सम्मान करने वाली की टिप्पणियाँ करवा करवा के! बच्चू अब फिर कभी ब्लॉगर सम्मान जैसा कोई आयोजन के पहले सत्रह सौ साठ बार सोचेगा!"

"आपने बहुत ठीक किया लिख्खाड़ानन्द जी! भला हिन्दी ब्लोगिंग भी कोई सम्मान कमाने, रुपया कमाने के लिये है क्या? हिन्दी ब्लॉगिंग तो है दिल की भड़ास निकालने के लिये, नर नारी और धर्म सम्बन्धी विवाद करने के लिये, एक दूसरे की टाँग खींचने के लिये, कोई यदि अच्छा काम करे तो उसका वाट लगाने के लिये और ज्यादा से ज्यादा टिप्पणी पाने के लिये। हिन्दी ब्लोगर को रुपये या किसी सम्मान की कोई जरूरत है क्या? उसकी जरूरत तो मात्र अधिक अधिक से अधिक टिप्पणी पाना है। जिसका सम्मान करना है उसकी पोस्ट पर जाकर अधिक से अधिक टिप्पणियाँ कर दो और देखो कि कितना सम्मानित अनुभव करता है वह अपने आप को।"

"भाई टिप्पण्यानन्द जी! हमारा तो सिद्धान्त है कि न खुद किसी का सम्मान करेंगे और न ही किसी को करने देंगे!"

"बहुत अच्छा सिद्धान्त है जी आपका! अच्छा तो अब चलता हूँ, नमस्कार!"

"नमस्काऽऽऽर!"

Monday, January 4, 2010

क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं?

टिप्पणियों के मोह से आज कोई भी हिन्दी ब्लोगर अछूता नहीं है। टिप्पणियों का मोह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से हिन्दी ब्लोगजगत में टिप्पणियाँ पा लेने का मोह है उससे तो लगता है कि टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड है। याने कि जिस पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही अच्छा पोस्ट! इस लिहाज से तो विवादास्पद पोस्ट ही सबसे अच्छे हैं जहाँ पर बहुत सारी टिप्पणियाँ मिलती हैं, भले ही उन टिप्पणियों में गाली-गलौज तक शामिल हो।

टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।

मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।

ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।

जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।

Thursday, December 17, 2009

मुझे टिप्पणी मिले ना मिले, मेरे पोस्ट की चर्चा हो ना हो, पर मुझे तो पाठक चाहिये

टिप्पणियों और चर्चाओं की उतनी चाह नहीं है मुझे जितनी चाह पाठक मिलने की है। टिप्पणियाँ मिल जाये तो बहुत अच्छी बात है, न भी मिले तो भी कोई बात नहीं। मेरे पोस्ट की चर्चा हो जाये तो खुशी होती है मुझे पर न हो तो कोई गम नहीं होता।

पर मैं लिखूँ और पढ़ने वाला न मिले तो बहुत दुःख होता है। बस पाठकों की चाहत रखता हूँ मैं। आखिर वह लिखना भी किस काम का जिसे कोई पढ़ने ना आये?

अपने ब्लोगर बन्धुओं को मैं पाठक नहीं बल्कि अपना स्वजन और हितचिन्तक समझता हूँ इसलिए मैं उन्हें अपने पाठकों की श्रेणी में नहीं रखता। वे लोग तो आयेंगे ही मुझे पढ़ने के लिये। और एग्रीगेटर्स से आये ट्रैफिक को भी मैं ट्रैफिक नहीं समझता क्योंकि एग्रीगेटर्स का इस्तेमाल अधिकतर हम ब्लोगर्स ही करते हैं, इन्टरनेट में आने वाले आम लोग नहीं।

अपने ब्लोग लेखन को मैं तभी सफल मानूँगा जब पाठक खोज कर मेरे ब्लोग में आयेंगे। और मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत जल्दी ही वह दिन आयेगा।

मेरे पास अपने इस विश्वास का कारण भी है। कुछ अस्थाई कारणों से मैं अपने संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण को पिछले कई रोज से अपडेट नहीं कर पा रहा हूँ किन्तु स्टेट काउंटर बता रहा है कि उसमें पाठकगण रोज आ रहे हैं और उसे खोज कर ही आ रहे हैं।



गूगल के "है बातों में दम" प्रतियोगिता में मेरे लेखों को इस सप्ताह 430 लोगों ने पढ़ा। इससे पता चलता है कि हिन्दी में पाठकों की कमी नहीं है, जरूरत है तो सिर्फ उन्हें उनकी पसंद की जानकारी देने की।

Saturday, September 12, 2009

हिन्दी ब्लोगिंग को योजनाबद्ध तरीके से प्रचारतंत्र बनाया जा रहा है

आजकल हिन्दी ब्लोग्स में ऐसी ऐसी टिप्पणियाँ आ रही हैं जिन्हें टिप्पणी न कह कर लोगों की भावना को ठेस पहुँचाने और अपने विचारों को थोपने का प्रयास कहना अधिक उचित होगा। इन टिप्पणियों के अन्त में कुछ लिंक होते हैं जो कि विज्ञापन का कार्य करते हैं। इन लम्बी लम्बी टिप्पणियों का मात्र उद्देश्य है जिस ब्लोग में टिप्पणी की गई है उसके ब्लोगर के विचारों को येन-केन-प्रकारेण गलत सिद्ध करना और उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना, अपने विचारों को थोपने की भरपूर कोशिश करना और अपने अनुरूप साइट्स का विज्ञापन करना। एक दो ऐसी टिप्पणियाँ आप इन ब्लोग्स में देख सकते हैं

http://panditastro.blogspot.com/2009/09/blog-post.html

http://induslady.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html

इन्हें ज्योतिष, पुनर्जन्म, हिन्दू जैसे शब्दविशेष दिखे नहीं कि पहुँच गए वहाँ अपनी दूकान लगाने के लिए। भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली इनकी टिप्पणियों में प्रभाव उत्पन्न करने के लिए बड़े बड़े नामों, जैसे कि मैक्समूलर, राधाकृष्णन, चाणक्य, और भी बहुत से, का उल्लेख किया जाता है। इनका उद्देश्य है कि भावनाओं को ठेस पहुँचा कर हममें कुंठा उत्पन्न करें और धीरे धीरे हमारी ये कुंठा हीन भावना में बदल जाए। बहुत बड़ी साजिश है ये।

हिन्दी ब्लोगिंग स्वस्थ विचार विमर्श का माध्यम है और हम इसे दुष्प्रचारतंत्र कदापि नहीं बनने देंगे। हमारा ब्लोग हमारा घर है और प्रेमपूर्वक वहाँ आने वाले का हम स्वागत करेंगे, अतिथि बना कर सिर-आँखों पर बिठायेंगे पर हमारे घर में गंदगी फैलाने की नीयत से आने वाले को हम भीतर घुसने ही नहीं देंगे। प्रचार और विज्ञापन ही करना है तो अपने घर से करो, अपने ब्लोग से करो, हम वहाँ जाकर रोकने वाले नहीं हैं। पर अपने प्रचार और विज्ञापन के लिए तुम हमारे घरों का प्रयोग नहीं कर सकते।

हम लोग तो सीधे-सरल या सही अर्थों में 'परबुधिया' आदमी हैं, दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने वाले। जो जैसा कहता है मान लेते हैं। किसी ने कह दिया कि तुम्हारे देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष नहीं है बल्कि हिन्दोस्तान (हिन्दुस्तान) या इंडिया है और हमने मान लिया। किसी ने कह दिया कि तुम सनातन धर्मी नहीं हिन्दू धर्मी हो और हमने मान लिया। अब कोई और कह रहा है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है बल्कि एक शब्द है, एक क्षेत्रविशेष में निवास करने वालों को हिन्दू कहा जाता है और हम उसे भी मान लेंगे। हमारी इसी सरलता का हमेशा फायदा उठाया जाता रहा है।

हिन्दी ब्लोगिंग एक मनोहर वाटिका है, यहाँ उल्लुओं को प्रवेश देकर हम इसे उजड़ने नहीं देंगे। हिन्दी ब्लोगिंग एक स्वच्छ सरोवर है, हम गंदी मछलियों को इसे गंदा करने का अधिकार बिल्कुल नहीं देंगे।

इन विषैली टिप्पणियों को अपने ब्लोग में आने से रोकने के लिए हमारे पास टिप्पणी मॉडरेशन नाम का बहुत अच्छा साधन है और हम सभी अब इस साधन का प्रयोग करेंगे। आज से पहले मैं इस साधन का प्रयोग नहीं करता था पर अब मैंने टिप्पणी मॉडरेशन को सक्षम कर दिया है। क्यों झेलें हम किसी की गलत टिप्पणी को।

आप लोगों से भी अनुरोध है कि अपने ब्लोग में टिप्पणी मॉडरेशन सक्षम कर लें। वैसे तो सभी ब्लोगर बन्धु जानते ही होंगे कि टिप्पणी मॉडरेशन को कैसे सक्षम किया जाता है फिर भी हो सकता है कि कुछ लोगों को इसका ज्ञान न हो। तो समझ लीजिए कि इसे कैसे किया जाता है। बहुत सरल काम है यह। सबसे पहले आप अपने ब्लोगर खाते में लागिन करें और सेटिंग्स को क्लिक कर दें।

अब आपक कमेंट्स सेक्शन को क्लिक करें

अब नीचे स्क्रोल करके कमेंट मॉडरेशन में always को चेक कर दें।

हो गया आपका कार्य सम्पन्न।

(फिलहाल एडसेंस के विषय में मैं एक प्रयोग कर रहा हूँ याने कि अपने लड़के के नाम से एक नया एडसेंस खाता खोलने जा रहा हूँ। इस प्रयोग में सफल हो जाने के बाद मैं एडसेंस विषयक श्रृंखला की अगली कड़ी लिखूँगा ताकि आपको बता सकूँ कि मेरे लड़के के नाम से खाता कैसे खुला और खाता खुल जाने के बाद क्या और कैसे करना है।)