जिस प्रकार से टीवी चैनल्स वाले सीरियल्स बनाते समय इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं कि उनके दर्शक क्या देखना चाहते हैं, उसी प्रकार से एक ब्लोगर को भी इस बात का ध्यान रखना, कि उसके पाठक क्या पढ़ना चाहते हैं, निहायत ही जरूरी है। वास्तव में आपकी लिखी सामग्री (content) ही पाठकों को खींच कर आपके ब्लॉग में लाती है। अंग्रेजी में तो कहा जाता हैः
'Content is king.'
अर्थात्, यदि हिन्दी में कहें तो, "सामग्री ही साम्राज्ञी है।"
किन्तु हममें से अधिकांश हिन्दी ब्लोगर वह लिखते हैं जो उन्हें पसंद है, किन्तु यह जरूरी नहीं है कि एक व्यक्ति की पसंद सभी लोगों को भी पसंद आए। कई बार तो हम यह सोच कर भी लिख देते हैं कि कुछ न कुछ तो लिखना है। अब आप ही बताइए कि इस प्रकार के उद्देश्यहीन लेखन को क्या पाठक पसंद कर सकता है? फिर ऐसे लेखन का क्या फायदा जिसे कि कोई पढ़े ही नहीं। यह तो वही बात हुई कि जंगल में मोर नाचा किसी ना देखा।
तो आइए जानने की कोशिश करें कि पाठक क्या चाहता है?
वास्तव में पाठक सन्तुष्टि चाहता है। वह चाहता है कि उसे घिसी पिटी चीज पढ़ने को न मिले। उसने जो कुछ भी पढ़ा है उससे उसे कुछ नई जानकारी मिली है, उसके ज्ञान में कुछ वृद्धि हुई है। यदि पाठक ऐसे लेख को पढ़ता है जिसे पढ़कर उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता तो उसे क्षोभ होता है और जिस ब्लॉग में उसे ऐसी सामग्री पढ़ने को मिली है उस ब्लॉग से वह कन्नी काट लेता है। इसके विपरीत यदि उसे किसी ब्लॉग की सामग्री को पढ़कर कुछ नयापन मिले, उसे सन्तुष्टि हो तो वह उस ब्लॉग का चाहने वाला बन जाता है। याद रखिए कि पाठक को उसके पसंद की सामग्री मिलेगी तो वह उसे अवश्य ही पढ़ेगा।
एक बात यह भी है कि पाठक हमेशा नई-नई जानकारी चाहता है और ऐसे में एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है कि आखिर रोज रोज आखिर नई जानकारी लायें कहाँ से?
यह यक्षप्रश्न है कि आखिर रोज हम अपनी सामग्री में कहाँ से नयापन लायें? सच्चाई भी यही है कि हम हमेशा नई जानकारी नहीं प्राप्त कर सकते। पर हाँ किसी पुरानी जानकारी को ऐसी शैली में प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसमें नयापन झलकने लगे। प्रायः सभी सफल लेखक यही करते हैं और इस प्रकार के प्रस्तुतीकरण को पाठक भी पसंद करते हैं।
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम पाठकों को ऐसी सामग्री देना चाहते हैं जिनके विषय में हम जानते हैं कि यह उनके लिये हितकारी है किन्तु उनकी रुचि के अनुरूप नहीं है। ऐसी स्थिति में आप अपने लेख को इस चतुराई से (tactfully) लिखें कि पाठक को वह सुरुचिपूर्ण लगे। मतलब यह कि कड़वी दवा के ऊपर शक्कर की परत।
किन्तु इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है अच्छी बातों की अपेक्षा बुरी बातें लोगों को अधिक आकर्षित करती हैं और इसी कारण से अश्लीलता और फूहड़ता अधिकांश पाठकों को आसानी के साथ आकर्षित कर लेती हैं। लोगों की इसी मनोवृति का फायदा उठाते हुए आज के अधिकांश टीवी चैनल्स अपने दर्शकों को, "जोई रोगी भावै सोई बैद बतावै" के तर्ज पर, धड़ल्ले के साथ अश्लीलता और फूहड़ता परस रहे हैं। उन्हें इस बात से कुछ भी सरोकार नहीं है कि ऐसा करने से समाज और देश का कितना अहित हो रहा है, उन्हें तो सिर्फ अपने टीआरपी बढ़ा कर अधिक से अधिक विज्ञापन बटोरने का ही ध्यान रहता है। पर हमें ऐसा कतइ नहीं करना है। हमें तो ऐसे पोस्ट लिखना है जो लोगों में जागरूकता पैदा करे और समाज तथा देश का हित करे।
Showing posts with label ब्लोगर. Show all posts
Showing posts with label ब्लोगर. Show all posts
Thursday, April 28, 2011
Monday, August 2, 2010
हिन्दी ब्लोगिंग की महत्वपूर्ण बातें
- किसी भी नये ब्लोगर को उसके पहले ही पोस्ट पर इतना स्वागत् और इतनी वाहवाही मिलती है जितनी कि उसे अपने जीवन में पहले कभी न मिली हो!
- ब्लोगरों की हर वो रचना जो कि समस्त पत्र-पत्रिकाओं से 'खेद सहित वापस' आ गई रहती है ब्लोग में आसानी के साथ खप जाती है और उसे वाहवाही भी मिलती है।
- ब्लोगरों को लिखने के लिये किसी विषय का मोहताज नहीं रहना पड़ता। कुछ भी लिखो, किसी भी विषय पर लिखो, कभी कविता लिखो, कभी कहानी लिखो तो कभी घिसे-पिटे समाचारों की रिपोर्टिंग कर दो अर्थात् चाहे जो कुछ भी करो सब चलता है!
- एक ब्लोगर के लिखे को अन्य ब्लोगर अवश्य पढ़ते हैं।
- अन्य भाषाओं विशेषकर अंग्रेजी भाषा के ब्लोग लेखकों को अपने पोस्ट की सामग्री कंटेंट के स्तर का ध्यान रखना पड़ता है क्योंकि उनके बीच "कंटेंट इज़ किंग" वाली धारणा काम करती है, उन्हें अपने पाठकों की संख्या अधिक से अधिक बढ़ाने की फिक्र रहती है जो कि स्तर की सामग्री पढ़ने के लिये ही आते हैं। हिन्दी ब्लोग लेखकों के लिये टिप्पणियों का बहुत महत्व होता है क्योंकि माना जाता है कि जिसके पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही महान ब्लोगर।
- यद्यपि हिन्दी ब्लोगिंग में विषयों का विशेष महत्व नहीं है किन्तु ब्लोग, ब्लोगिंग, अन्य ब्लोगर, ब्लोगर मीट आदि ऐसे विषय हैं जिन पर पोस्ट लिखकर अधिक से अधिक टिप्पणी पाई जा सकती है।
- प्रायः ब्लोगर लोग एक दूसरे की पीठ ठोकते हैं याने कि टिप्पणियों का "इस हाथ दे उस हाथ ले" सिलसिला धड़ल्ले के साथ चलता है।
- ब्लोगरों को उनका पोस्ट विभिन्न सर्च इंजिनों में आते हैं या नहीं, लोग पोस्ट को सर्च करके पढ़ते हैं या नहीं, गूगल पेज रैंक, अलेक्सा रैंक आदि से कुछ भी मतलब नहीं रहता। उन्हें मतलब रहता है सिर्फ हिन्दी ब्लोग संकलकों तथा उनके हॉट और सक्रियता सूचियों से।
- हिन्दी ब्लोगिंग में अपने पोस्ट को हिट करवाने और संकलकों के हॉटलिस्ट में शामिल करने के सत्रह सौ साठ तरीके उपलब्ध हैं।
- ब्लोगरों को 'हॉट और कोल्ड' के चक्कर में पड़ने, संकलको को गाली देने, अपना गुट बनाने, चर्चा करने, लिंकस तथा सक्रियता के चक्कर में पड़ने, फर्जीवाडा बताने, बेनामी बनाने, लड़ने-झगडते, दोस्त और दुश्मन बनाने, कोर्ट-कचहरी की धमकी देने, टंकी पर चढ़ने, दूसरों के धर्म की छीछालेदर करने तथा अपने धर्म को दूसरों के धर्म से महान बताने आदि बातों का पूर्ण अधिकार होता है।
- यदि कोई ब्लोगर आपके पोस्ट की आलोचना करे तो उसे दूसरे गुट का बताया जा सकता है और ब्लोगरों के अलावा इंटरनेट में सर्फ करने वाले अन्य लोग यदि हिन्दी ब्लोग्स की आलोचना करें तो उन्हें मजमा लगाने वाले छिद्राण्वेषी कहा जा सकता है।
- अपनी टिप्पणी के समर्थन में अपने समर्थकों से अन्य टिप्पणी लिखवाई जा सकती है।
- 'बेगैरत', 'बेहुर्मत', 'स्वार्थी', 'खुदगर्ज' आदि नामों के मुखौटे लगाकर अपनी टिप्पणी को प्रभावशाली बनाने वाली टिप्पणी लिखी जा सकती है।
- हिन्दी ब्लोगिंग में लोग आते अपनी मर्जी से हैं और फिर वहाँ से जाने का मन ही नहीं करता, बस वहीं फँसे रह जाते हैं।
Wednesday, July 7, 2010
बंद रहा टिप्पणी-बाजार... ब्लोगजगत में मचा हाहाकार
"बिन टिप्पणी सब सून!"
पोस्ट लिखें, टिप्पणियाँ भी मिले पर टिप्पणियाँ पोस्ट में ना दिखे तो हिन्दी ब्लोगजगत में हाहाकार मचना तो स्वाभाविक ही है। परसों याने कि पाँच जुलाई की शाम से ही कुछ ऐसा होने लग गया कि मेल में तो सूचना मिलती है कि पोस्ट पर टिप्पणियाँ आई है किन्तु डैशबोर्ड पर और पोस्ट पर वे टिप्पणियाँ नदारद हैं। ऐसी स्थिति कल दिन भर रही। गहन चिन्ता में डाल दिया गूगल बाबा ने ब्लोगरों को।
अब ब्लोगर बाबा भी क्या करे? बारहों महीने-आठों काल, प्रत्येक दिन चौबीसों घंटे अनवरत रूप से काम करते रहने पर कभी-कभी बीमार हो जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं है। सो गूगल बाबा के ब्लोगर की तबीयत भी शायद खराब हो गई होगी। बस बीमारी की इस अवस्था में उन्होंने टिप्पणियाँ दिखाना बंद कर दिया।
अब हिन्दी ब्लोगिंग का तो अस्तित्व ही टिप्पणी से है, टिप्पणियाँ ना मिले तो लोग ब्लोगिंग ही ना करें। हिन्दी ब्लोगिंग से ना तो बड़ी संख्या में पाठक ही मिल पाते हैं और ना कुछ कमाई ही हो पाती है। बस टिप्पणियाँ ही तो मिलती हैं और यदि टिप्पणियाँ मिलनी भी बंद हो जाये तो भला क्यों करेगा कोई हिन्दी ब्लोगिंग?
शुक्र है कि आज टिप्पणियाँ दिखाई देने लग गई हैं और लगता है कि गूगल बाबा का ब्लोगर अब स्वस्थ हो चले हैं। हमारी कामना यही है कि वे सदैव स्वस्थ ही रहें।
पोस्ट लिखें, टिप्पणियाँ भी मिले पर टिप्पणियाँ पोस्ट में ना दिखे तो हिन्दी ब्लोगजगत में हाहाकार मचना तो स्वाभाविक ही है। परसों याने कि पाँच जुलाई की शाम से ही कुछ ऐसा होने लग गया कि मेल में तो सूचना मिलती है कि पोस्ट पर टिप्पणियाँ आई है किन्तु डैशबोर्ड पर और पोस्ट पर वे टिप्पणियाँ नदारद हैं। ऐसी स्थिति कल दिन भर रही। गहन चिन्ता में डाल दिया गूगल बाबा ने ब्लोगरों को।
अब ब्लोगर बाबा भी क्या करे? बारहों महीने-आठों काल, प्रत्येक दिन चौबीसों घंटे अनवरत रूप से काम करते रहने पर कभी-कभी बीमार हो जाना कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं है। सो गूगल बाबा के ब्लोगर की तबीयत भी शायद खराब हो गई होगी। बस बीमारी की इस अवस्था में उन्होंने टिप्पणियाँ दिखाना बंद कर दिया।
अब हिन्दी ब्लोगिंग का तो अस्तित्व ही टिप्पणी से है, टिप्पणियाँ ना मिले तो लोग ब्लोगिंग ही ना करें। हिन्दी ब्लोगिंग से ना तो बड़ी संख्या में पाठक ही मिल पाते हैं और ना कुछ कमाई ही हो पाती है। बस टिप्पणियाँ ही तो मिलती हैं और यदि टिप्पणियाँ मिलनी भी बंद हो जाये तो भला क्यों करेगा कोई हिन्दी ब्लोगिंग?
शुक्र है कि आज टिप्पणियाँ दिखाई देने लग गई हैं और लगता है कि गूगल बाबा का ब्लोगर अब स्वस्थ हो चले हैं। हमारी कामना यही है कि वे सदैव स्वस्थ ही रहें।
Monday, June 28, 2010
बड़ा ब्लोगर छोटा ब्लोगर
लिख्खाड़ानन्द ने अपना पोस्ट प्रकाशित किया! पोस्ट को प्रकाशित करने के तत्काल बाद ही सौ मित्रों तथा परिचितों को मोबाइल, ईमेल और चैट मेसेन्जर के माध्यम से सूचना दी कि मेरी पोस्ट प्रकाशित हो गई है। अगले चौबीस घंटों के भीतर लगभग चालीस लोग पोस्ट पर पहुँचे और प्रायः सभी ने टिप्पणी भी की। एक से बढ़कर एक टिप्पणियाँ आईं जिनमें से कुछ का जायजा आप भी लें:
लिख्खाड़ानन्द का पोस्ट संकलकों के हॉटलिस्ट में सबसे ऊपर था! अनामानन्द के पोस्ट का हॉटलिस्ट में कहीं अता-पता भी नहीं था।
लिख्खाड़ानन्द हो गये बड़े ब्लोगर और अनामानन्द बन गये छोटे ब्लोगर!!!
- शुभकामनाएँ
- बधाई
- बधाई स्वीकारे
- बहुत-बहुत बधाईयाँ
- शुक्रिया!
- अच्छा आलेख
- अनोखी पोस्ट
- अच्छी रचना
- बहुत ही सटीक रचना
- इस रचना के लिये आभार
- सही लिखा है
- बढिया लिखा है आपने
- मजा आ गया पढ़ कर।
- अंग्रेजी शब्दों का हिन्दीकरण करने का आपका प्रयोग अत्यन्त सराहनीय है!
- बहुत सुंदर
- सत्य वचन!
- nice
- आपके विचारो से सहमत हूँ
- टिप्पण्यानन्द जी की टिप्पणी से सहमत
- आपकी लेखनी तो कमाल करती ही है
- आपकी लेखनी के बारे में कुछ भी कहना सूरज को दिया दिखाना है
लिख्खाड़ानन्द का पोस्ट संकलकों के हॉटलिस्ट में सबसे ऊपर था! अनामानन्द के पोस्ट का हॉटलिस्ट में कहीं अता-पता भी नहीं था।
लिख्खाड़ानन्द हो गये बड़े ब्लोगर और अनामानन्द बन गये छोटे ब्लोगर!!!
Monday, June 14, 2010
ब्लोगर महान नहीं होता, महान होता है पोस्ट
सीनियर ब्लोगर, जूनियर ब्लोगर, बड़े ब्लोगर, छोटे ब्लोगर, महान ब्लोगर ....
आखिर क्या है यह? ब्लोगर महान होता है या उसका पोस्ट उसे महान बनाता है?
हमारा तो मानना है कि सिर्फ रचना ही छोटी, बड़ी या महान होती है जो कि रचयिता को भी छोटा, बड़ा या महान बना देती है। लेखन का विषय चाहे जो भी हो, यदि उसके भाव पाठक के दिल में घर कर जाते हैं तो वह लेखन महान हो जाता है। 'भगवतीचरण वर्मा' जी की कृति "चित्रलेखा" इसलिये महान हो गयी क्योंकि वर्मा जी ने अपनी उस कृति में 'नर्तकी चित्रलेखा' और 'तपस्वी कुमारगिरि' के अहं (ego) के टकराव को इतने सुन्दर और प्रभावशाली शैली में व्यक्त किया कि उनकी अभिव्यक्ति पाठकों के मन को छू गई। चित्रलेखा जैसे एक साधारण नर्तकी से कुमारगिरि जैसे महान ज्ञानी का पराजित हो जाने को उन तपस्वी का अहं स्वीकार नहीं कर पाता। किन्तु तपस्वी नर्तकी से सिर्फ एक बार नहीं बल्कि बार-बार पराजित हो कर पतन के गर्त में गिरते ही चला जाता है और अन्त में योगी से भोगी हो जाता है, पुण्यात्मा से महान पापी हो जाता है। "चित्रलेखा" उपन्यास को नर्तकी और तपस्वी के अहं के टकराव ने महान बना दिया और कृति की महानता ने रचयिता भगवतीचरण वर्मा को महान लेखकों की सूची में सम्मिलित कर दिया। चित्रलेखा उपन्यास वर्मा जी की आरम्भिक कृतियों में से है, जब इस उपन्यास को उन्होंने लिखा था तो उनकी अवस्था बहुत कम थी। तो क्या उम्र कम होने के कारण से ही उन्हें छोटा या जूनियर रचनाकार कहा जाता? हमारे विचार से तो कदापि नहीं।
अहं के टकराव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने चित्रलेखा ही नहीं बल्कि और भी अनेक कृतियों को महान बना दिया है। फाँसी की सजा पाये विलक्षण कैदी और जेल के जेलर के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति ने 'अनिल बरवे' जी के नाटक "थैंक यू मिस्टर ग्लाड" को अत्यन्त लोकप्रिय और चर्चित बना दिया। 'शरतचन्द्र' जी के उपन्यास "पथ के दावेदार" में माँ के किसी ईसाई के साथ द्वितीय विवाह कर लेने के कारण ईसाई हो गई, किन्तु विशुद्ध हिन्दू संस्कार वाली, मिस भारती जोसेफ और बंगाली युवक अपूर्व के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति इतनी सुन्दर है कि पाठक उस काल्पनिक कथा के संसार में खो जाता है और उस टकराव को स्वयं अनुभव करने लग जाता है।
अनेक बाते हैं जो कि रचनाकार की रचना को महान बनाती हैं जैसे कि पात्रों का चरित्र-चित्रण, रचना में भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति, लेखन शैली आदि-आदि इत्यादि। सूबेदारनी का लहनासिंह के प्रति विश्वास और लहनासिंह का सूबेदारनी के प्रति आत्मिक प्रेम (प्लूटेरियन लव्ह) की अभिव्यक्ति ने "उसने कहा था" को संसार भर में लोकप्रिय बना कर चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी को अमर कर दिया। गोदान में ग्राम्य तथा नगरीय जीवन शैली को समटते हुए ग्रामीण होरी का दर्द, गाँव के जमींदार के द्वारा ग्रामीणों के शोषण, नगर के प्रोफेसर मेहता और मिस मालती के विचारों के अन्तरद्वन्द्व की प्रभावशाली अभिव्यक्ति 'प्रेमचंद' जी के लेखन की ऐसी विशेषता है जो उन्हें अतिविशिष्टता प्रदान कर के महान बना देती है।
ब्लोगिंग भी अपने विचारों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है और हमारा मानना है इस माध्यम के द्वारा आप बड़े, छोटे, सीनियर, जूनियर कदापि नहीं बन सकते, हाँ महान अवश्य बन सकते हैं यदि आप अपने पाठकों के हृदय में घर कर लेते हैं तो! आपकी अभिव्यक्ति ही आपको पाठकों की विशाल संख्या प्रदान कर के आपको श्रेष्ठता प्रदान कर सकती है। इसलिये हमारा अनुरोध है कि आप सीनियर ब्लोगर, जूनियर ब्लोगर, बड़े ब्लोगर, छोटे ब्लोगर, महान ब्लोगर आदि बातों का विचार न कर सिर्फ उत्तम लेखन पर ही ध्यान देते रहें।
आखिर क्या है यह? ब्लोगर महान होता है या उसका पोस्ट उसे महान बनाता है?
हमारा तो मानना है कि सिर्फ रचना ही छोटी, बड़ी या महान होती है जो कि रचयिता को भी छोटा, बड़ा या महान बना देती है। लेखन का विषय चाहे जो भी हो, यदि उसके भाव पाठक के दिल में घर कर जाते हैं तो वह लेखन महान हो जाता है। 'भगवतीचरण वर्मा' जी की कृति "चित्रलेखा" इसलिये महान हो गयी क्योंकि वर्मा जी ने अपनी उस कृति में 'नर्तकी चित्रलेखा' और 'तपस्वी कुमारगिरि' के अहं (ego) के टकराव को इतने सुन्दर और प्रभावशाली शैली में व्यक्त किया कि उनकी अभिव्यक्ति पाठकों के मन को छू गई। चित्रलेखा जैसे एक साधारण नर्तकी से कुमारगिरि जैसे महान ज्ञानी का पराजित हो जाने को उन तपस्वी का अहं स्वीकार नहीं कर पाता। किन्तु तपस्वी नर्तकी से सिर्फ एक बार नहीं बल्कि बार-बार पराजित हो कर पतन के गर्त में गिरते ही चला जाता है और अन्त में योगी से भोगी हो जाता है, पुण्यात्मा से महान पापी हो जाता है। "चित्रलेखा" उपन्यास को नर्तकी और तपस्वी के अहं के टकराव ने महान बना दिया और कृति की महानता ने रचयिता भगवतीचरण वर्मा को महान लेखकों की सूची में सम्मिलित कर दिया। चित्रलेखा उपन्यास वर्मा जी की आरम्भिक कृतियों में से है, जब इस उपन्यास को उन्होंने लिखा था तो उनकी अवस्था बहुत कम थी। तो क्या उम्र कम होने के कारण से ही उन्हें छोटा या जूनियर रचनाकार कहा जाता? हमारे विचार से तो कदापि नहीं।
अहं के टकराव की प्रभावशाली अभिव्यक्ति ने चित्रलेखा ही नहीं बल्कि और भी अनेक कृतियों को महान बना दिया है। फाँसी की सजा पाये विलक्षण कैदी और जेल के जेलर के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति ने 'अनिल बरवे' जी के नाटक "थैंक यू मिस्टर ग्लाड" को अत्यन्त लोकप्रिय और चर्चित बना दिया। 'शरतचन्द्र' जी के उपन्यास "पथ के दावेदार" में माँ के किसी ईसाई के साथ द्वितीय विवाह कर लेने के कारण ईसाई हो गई, किन्तु विशुद्ध हिन्दू संस्कार वाली, मिस भारती जोसेफ और बंगाली युवक अपूर्व के अहं के टकराव की अभिव्यक्ति इतनी सुन्दर है कि पाठक उस काल्पनिक कथा के संसार में खो जाता है और उस टकराव को स्वयं अनुभव करने लग जाता है।
अनेक बाते हैं जो कि रचनाकार की रचना को महान बनाती हैं जैसे कि पात्रों का चरित्र-चित्रण, रचना में भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति, लेखन शैली आदि-आदि इत्यादि। सूबेदारनी का लहनासिंह के प्रति विश्वास और लहनासिंह का सूबेदारनी के प्रति आत्मिक प्रेम (प्लूटेरियन लव्ह) की अभिव्यक्ति ने "उसने कहा था" को संसार भर में लोकप्रिय बना कर चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी को अमर कर दिया। गोदान में ग्राम्य तथा नगरीय जीवन शैली को समटते हुए ग्रामीण होरी का दर्द, गाँव के जमींदार के द्वारा ग्रामीणों के शोषण, नगर के प्रोफेसर मेहता और मिस मालती के विचारों के अन्तरद्वन्द्व की प्रभावशाली अभिव्यक्ति 'प्रेमचंद' जी के लेखन की ऐसी विशेषता है जो उन्हें अतिविशिष्टता प्रदान कर के महान बना देती है।
ब्लोगिंग भी अपने विचारों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है और हमारा मानना है इस माध्यम के द्वारा आप बड़े, छोटे, सीनियर, जूनियर कदापि नहीं बन सकते, हाँ महान अवश्य बन सकते हैं यदि आप अपने पाठकों के हृदय में घर कर लेते हैं तो! आपकी अभिव्यक्ति ही आपको पाठकों की विशाल संख्या प्रदान कर के आपको श्रेष्ठता प्रदान कर सकती है। इसलिये हमारा अनुरोध है कि आप सीनियर ब्लोगर, जूनियर ब्लोगर, बड़े ब्लोगर, छोटे ब्लोगर, महान ब्लोगर आदि बातों का विचार न कर सिर्फ उत्तम लेखन पर ही ध्यान देते रहें।
Monday, May 24, 2010
हिन्दी ब्लोगरों के दो, और केवल दो, प्रकार होते हैं - एक महान ब्लोगर दूसरा क्षुद्र ब्लोगर
हिन्दी ब्लोगिंग में हम लगभग तीन साल से हैं और इस दौरान हमने जो कुछ भी देखा, पढ़ा और अनुभव किया उससे सिर्फ यही निष्कर्ष निकलता है कि हिन्दी ब्लोगरों के दो, और केवल दो, प्रकार होते हैं - एक महान ब्लोगर दूसरा क्षुद्र ब्लोगर।
महान ब्लोगर वे होते हैं जो हिन्दी ब्लोगिंग के उद्देश्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहते हैं और यह तो आप जानते ही हैं कि हिन्दी ब्लोगिंग का उद्देश्य न तो रुपया कमाना है, न अपने मातृभाषा की सेवा करना और नेट में उसे बढ़ावा देना है और ना ही पाठकों को उसके पसन्द की जानकारी ही देना है क्योंकि रुपया की हमें कुछ विशेष जरूरत ही नहीं है, हम आगे बढ़ेंगे तो हिन्दी अपने आप ही आगे बढ़ जायेगी (आखिर हिन्दी हम से है भाई, हम हिन्दी से नहीं) और पाठकों के पसन्द से हमें कुछ लेना देना ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग का तो उद्देश्य है महान ब्लोगर बनकर अन्य ब्लोगरों से सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त करना। अतः सफल ब्लोगर वे ही होते हैं जिन्हें सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त होती है।
एक जमाना था जब कि जिसमें मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य सफल होता था तो वह मनुष्य महान हो जाता था। बाबू देवकीनन्दन खत्री की कृति "चन्द्रकान्ता" ऐसी लोकप्रिय हुई कि उसे पढ़ने के लिये लाखों लोगों को हिन्दी सीखनी पड़ी और खत्री जी इतिहासपुरुष हो गये। प्रेमचन्द जी की कहानियों और उपन्यासों ने पाठकों के हृदय में घर कर लेने में ऐसी सफलता पाईं कि प्रेमचन्द महान हो गये, "कथा सम्राट" तथा "उपन्यास सम्राट" के नाम से विख्यात हो गये। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने "उसने कहा था" लिखते समय सोचा भी न रहा होगा कि उनकी इस कहानी का अनुवाद संसार के समस्त प्रमुख भाषाओं में हो जायेगा और वे महानता की सीमा को छूने लगेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि उस जमाने में व्यक्ति का कार्य व्यक्ति को महान बनाता था।
पर आज का जमाना ऐसा है कि महान व्यक्ति के द्वारा किया गया हर कार्य सफल माना जाता है याने कि महान व्यक्ति कार्य को सफल बनाता है। इसीलिये आज के जमाने में आदमी को पहले महान बनना पड़ता है। यही कारण है महान ब्लोगर जो कुछ भी लिख देता है वह हमेशा सफल ही होता है और उसे सर्वाधिक टिप्पणियाँ मिलती ही हैं। इसलिये आजकर सफल पोस्ट लिखने के बजाय महान ब्लोगर बनने के लिये उद्योग करना ही उचित है।
महान ब्लोगर वे होते हैं जो हिन्दी ब्लोगिंग के उद्देश्य एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल रहते हैं और यह तो आप जानते ही हैं कि हिन्दी ब्लोगिंग का उद्देश्य न तो रुपया कमाना है, न अपने मातृभाषा की सेवा करना और नेट में उसे बढ़ावा देना है और ना ही पाठकों को उसके पसन्द की जानकारी ही देना है क्योंकि रुपया की हमें कुछ विशेष जरूरत ही नहीं है, हम आगे बढ़ेंगे तो हिन्दी अपने आप ही आगे बढ़ जायेगी (आखिर हिन्दी हम से है भाई, हम हिन्दी से नहीं) और पाठकों के पसन्द से हमें कुछ लेना देना ही नहीं है। हिन्दी ब्लोगिंग का तो उद्देश्य है महान ब्लोगर बनकर अन्य ब्लोगरों से सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त करना। अतः सफल ब्लोगर वे ही होते हैं जिन्हें सर्वाधिक टिप्पणी प्राप्त होती है।
एक जमाना था जब कि जिसमें मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य सफल होता था तो वह मनुष्य महान हो जाता था। बाबू देवकीनन्दन खत्री की कृति "चन्द्रकान्ता" ऐसी लोकप्रिय हुई कि उसे पढ़ने के लिये लाखों लोगों को हिन्दी सीखनी पड़ी और खत्री जी इतिहासपुरुष हो गये। प्रेमचन्द जी की कहानियों और उपन्यासों ने पाठकों के हृदय में घर कर लेने में ऐसी सफलता पाईं कि प्रेमचन्द महान हो गये, "कथा सम्राट" तथा "उपन्यास सम्राट" के नाम से विख्यात हो गये। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी ने "उसने कहा था" लिखते समय सोचा भी न रहा होगा कि उनकी इस कहानी का अनुवाद संसार के समस्त प्रमुख भाषाओं में हो जायेगा और वे महानता की सीमा को छूने लगेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि उस जमाने में व्यक्ति का कार्य व्यक्ति को महान बनाता था।
पर आज का जमाना ऐसा है कि महान व्यक्ति के द्वारा किया गया हर कार्य सफल माना जाता है याने कि महान व्यक्ति कार्य को सफल बनाता है। इसीलिये आज के जमाने में आदमी को पहले महान बनना पड़ता है। यही कारण है महान ब्लोगर जो कुछ भी लिख देता है वह हमेशा सफल ही होता है और उसे सर्वाधिक टिप्पणियाँ मिलती ही हैं। इसलिये आजकर सफल पोस्ट लिखने के बजाय महान ब्लोगर बनने के लिये उद्योग करना ही उचित है।
Wednesday, May 19, 2010
ब्लोगरों का पाश्चुराइजेशन - याने कि उनके लेखन स्तर को लंबे समय तक बरकरार रखना
"अवधिया जी, लगता है कि अब ब्लोगर्स का भी पाश्चुराइजेशन करना पड़ेगा।" हमसे ललित शर्मा जी ने कहा जो कल एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिये रायपुर आये थे।
हमने पूछा, "क्यों भाई?"
"आपने अनुभव किया होगा कि ब्लोगर्स के आज का लेखन स्तर उनके पहले के लेखन स्तर से गिरता जा रहा है। आप तो जानते ही हैं कि दूध को कुछ समय रखने पर वह खराब हो जाता है किन्तु यदि उसे पाश्चुराइज्ड कर दिया जाये तो वह तीन से चार महीने तक खराब नहीं होता। ऐसे ही ब्लोगर्स को भी यदि पाश्चुराइज्ड कर दिया जाये तो उनका लेखन स्तर लंबे समय तक ज्यों का त्यों बना रहेगा।"
"बात में तो आपके दम है ललित जी! पर पहले यह बताइये कि आखिर ये पाश्चुराइजेशन है क्या बला?"
हमारे इस प्रश्न पर ललित जी ने बताया, "पाश्चुराइजेशन एक प्रक्रिया है जो भोजन में माइक्रोबियल विकास को धीमा कर देती है जिससे उसका खराब होना रुक जाता है। सबसे पहले भोजन को खराब होने से रोकने के प्रयोग फ्रांसीसी रसायनज्ञ और सूक्ष्मजीव विज्ञानी लुई पाश्चर ने किये थे इसलिये इस प्रक्रिया का नाम पाश्चुराइजेशन हो गया। वैसे अवधिया जी, आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि पाश्चुराइजेशन बादाम, पनीर, क्रीम, अंडे, दूध, फलों के रस, मधुरस, डिब्बाबंद भोजन, सोया सॉस, बीयर, शराब आदि का किया जा सकता है। हमारे देश में प्रायः दूध का पाश्चुराइजेशन अधिक होता है और निकट भविष्य में ब्लोगर्स का भी अधिक से अधिक पाश्चुराइजेशन होने लगेगा।"
"तो ब्लोगर्स को पाश्चुराइज्ड करने के लिये क्या योजना बनाई है आपने?"
"सबसे पहले तो अवधिया जी, किसी एक ब्लोगर पर पाश्चुराइजेशन का प्रयोग किया जायेगा। यह तो आप मानेंगे ही कि आपका लेखन स्तर दिनों दिन गिरते ही जा रहा है। इसलिये मैंने सोचा है कि यह प्रयोग आप पर ही किया जाये। आप पर प्रयोग करने के दो फायदे हैं, एक तो यह कि हमें हमारे बुजुर्ग ब्लोगर से स्तर के पोस्ट मिलते रहेंगे और दूसरा यह कि यदि प्रयोग में कुछ गड़बड़ी हो जाये और आपका पाश्चुराइजेशन होने के बजाय परलोकगमन हो जाये तो भी हिन्दी ब्लोगजगत को कोई विशेष क्षति नहीं होगी। हाँ तो आपके पाश्चुराइजेशन के लिये आपको लोहे के पाइप के भीतर रखकर उसे 15-20 सेकंड के लिए 71.7 डिग्री सेल्सियस (161 ° एफ) के लिए गर्म किया जायेगा। उसके बाद आपको पैकेज्ड कर दिया जायेगा। तीन माह बाद आपको पैकेज से निकाल कर आपके लेखन स्तर को चेक किया जायेगा। बस इतना छोटा सा ही तो प्रयोग है। प्रयोग के सफल हो जाने पर ब्लोगर्स पाश्चुराइजेशन प्लांट भी बना लिया जायेगा।"
"ललित भाई, आप तो हमें बख्श ही दो। आप कहें तो हम ब्लोगिंग ही छोड़ देंगे पर अपने ऊपर ये प्रयोग नहीं होने देंगे।"
"अवधिया जी, इतनी जल्दी निर्णय मत ले लीजिये। जरा सोचिये कि आपके इस कार्य के लिये भविष्य में हिन्दी ब्लोगजगत में आपका कितना नाम होगा। फिलहाल तो मैं कुछ दिनों के लिये दिल्ली जा रहा हूँ तब तक आप अच्छे से सोच लीजियेगा फिर अपना निर्णय बताइयेगा।"
इतना कहकर उन्होंने हमसे विदा लिया और हम सोच रहे हैं कि क्या निर्णय लिया जाये।
हमने पूछा, "क्यों भाई?"
"आपने अनुभव किया होगा कि ब्लोगर्स के आज का लेखन स्तर उनके पहले के लेखन स्तर से गिरता जा रहा है। आप तो जानते ही हैं कि दूध को कुछ समय रखने पर वह खराब हो जाता है किन्तु यदि उसे पाश्चुराइज्ड कर दिया जाये तो वह तीन से चार महीने तक खराब नहीं होता। ऐसे ही ब्लोगर्स को भी यदि पाश्चुराइज्ड कर दिया जाये तो उनका लेखन स्तर लंबे समय तक ज्यों का त्यों बना रहेगा।"
"बात में तो आपके दम है ललित जी! पर पहले यह बताइये कि आखिर ये पाश्चुराइजेशन है क्या बला?"
हमारे इस प्रश्न पर ललित जी ने बताया, "पाश्चुराइजेशन एक प्रक्रिया है जो भोजन में माइक्रोबियल विकास को धीमा कर देती है जिससे उसका खराब होना रुक जाता है। सबसे पहले भोजन को खराब होने से रोकने के प्रयोग फ्रांसीसी रसायनज्ञ और सूक्ष्मजीव विज्ञानी लुई पाश्चर ने किये थे इसलिये इस प्रक्रिया का नाम पाश्चुराइजेशन हो गया। वैसे अवधिया जी, आपकी जानकारी के लिये मैं बता दूँ कि पाश्चुराइजेशन बादाम, पनीर, क्रीम, अंडे, दूध, फलों के रस, मधुरस, डिब्बाबंद भोजन, सोया सॉस, बीयर, शराब आदि का किया जा सकता है। हमारे देश में प्रायः दूध का पाश्चुराइजेशन अधिक होता है और निकट भविष्य में ब्लोगर्स का भी अधिक से अधिक पाश्चुराइजेशन होने लगेगा।"
"तो ब्लोगर्स को पाश्चुराइज्ड करने के लिये क्या योजना बनाई है आपने?"
"सबसे पहले तो अवधिया जी, किसी एक ब्लोगर पर पाश्चुराइजेशन का प्रयोग किया जायेगा। यह तो आप मानेंगे ही कि आपका लेखन स्तर दिनों दिन गिरते ही जा रहा है। इसलिये मैंने सोचा है कि यह प्रयोग आप पर ही किया जाये। आप पर प्रयोग करने के दो फायदे हैं, एक तो यह कि हमें हमारे बुजुर्ग ब्लोगर से स्तर के पोस्ट मिलते रहेंगे और दूसरा यह कि यदि प्रयोग में कुछ गड़बड़ी हो जाये और आपका पाश्चुराइजेशन होने के बजाय परलोकगमन हो जाये तो भी हिन्दी ब्लोगजगत को कोई विशेष क्षति नहीं होगी। हाँ तो आपके पाश्चुराइजेशन के लिये आपको लोहे के पाइप के भीतर रखकर उसे 15-20 सेकंड के लिए 71.7 डिग्री सेल्सियस (161 ° एफ) के लिए गर्म किया जायेगा। उसके बाद आपको पैकेज्ड कर दिया जायेगा। तीन माह बाद आपको पैकेज से निकाल कर आपके लेखन स्तर को चेक किया जायेगा। बस इतना छोटा सा ही तो प्रयोग है। प्रयोग के सफल हो जाने पर ब्लोगर्स पाश्चुराइजेशन प्लांट भी बना लिया जायेगा।"
"ललित भाई, आप तो हमें बख्श ही दो। आप कहें तो हम ब्लोगिंग ही छोड़ देंगे पर अपने ऊपर ये प्रयोग नहीं होने देंगे।"
"अवधिया जी, इतनी जल्दी निर्णय मत ले लीजिये। जरा सोचिये कि आपके इस कार्य के लिये भविष्य में हिन्दी ब्लोगजगत में आपका कितना नाम होगा। फिलहाल तो मैं कुछ दिनों के लिये दिल्ली जा रहा हूँ तब तक आप अच्छे से सोच लीजियेगा फिर अपना निर्णय बताइयेगा।"
इतना कहकर उन्होंने हमसे विदा लिया और हम सोच रहे हैं कि क्या निर्णय लिया जाये।
Saturday, May 15, 2010
क्या अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स में भी कभी बड़े छोटे ब्लोगर्स का विवाद हुआ है?
हम गूगल कर-कर के थक गये यह जानने के लिये कि क्या अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स में भी कभी बड़े छोटे ब्लोगर्स का विवाद हुआ है? अनेक प्रकार से सर्च किया कभी सर्च बॉक्स में history of blogging लिखकर, कभी who is big blogger लिखकर, तो कभी और भी इसी प्रकार के कीवर्ड्स लिखकर किन्तु हमें हमारे प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाया।
इसका निष्कर्ष तो यही निकलता है कि अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स बेवकूफ हैं जो यह तक नहीं बता सकते कि उनमें कौन बड़ा ब्लोगर है और कौन छोटा। उनकी बेवकूफी का एक और उदाहरण यह है कि वे टिप्पणियों की परवाह नहीं करते, उन्हें तो सिर्फ यही चिन्ता खाती है कि मैं ऐसा क्या लिखूँ कि उसे पढ़ने के लिये मेरे ब्लोग में लाखों करोड़ों की संख्या में पाठक आ जायें। है ना बेवकूफी? पाठकों की संख्या का भी भला कोई महत्व है? महत्व तो टिप्पणियों की संख्या का होता है, जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ उतना ही बड़ा ब्लोगर!
इससे सिद्ध होता है कि विद्वान और महान तो हम हिन्दी के ब्लोगर्स ही हैं।
इसका निष्कर्ष तो यही निकलता है कि अन्य भाषाओं के ब्लोगर्स बेवकूफ हैं जो यह तक नहीं बता सकते कि उनमें कौन बड़ा ब्लोगर है और कौन छोटा। उनकी बेवकूफी का एक और उदाहरण यह है कि वे टिप्पणियों की परवाह नहीं करते, उन्हें तो सिर्फ यही चिन्ता खाती है कि मैं ऐसा क्या लिखूँ कि उसे पढ़ने के लिये मेरे ब्लोग में लाखों करोड़ों की संख्या में पाठक आ जायें। है ना बेवकूफी? पाठकों की संख्या का भी भला कोई महत्व है? महत्व तो टिप्पणियों की संख्या का होता है, जितनी ज्यादा टिप्पणियाँ उतना ही बड़ा ब्लोगर!
इससे सिद्ध होता है कि विद्वान और महान तो हम हिन्दी के ब्लोगर्स ही हैं।
Monday, May 10, 2010
प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को माया नहीं व्यापती!
माया याने कि धन याने कि रुपया!
हर किसी को व्यापती है यह, हर कोई दीवाना है इसका और हर कोई भाग रहा है इसके पीछे। सभी को सिर्फ यही चिन्ता खाते रहती है कि चार पैसे कैसे बना लिये जायें? कोई कुछ कार्य करता है तो उस कार्य के बदले में सिर्फ धन की ही अभिलाषा रखता है। जिसे देखो वही "हाय पैसा!" "हाय पैसा!!" कर रहा है। धन कमाने के लिये आदमी अपना सुख-चैन यहाँ तक कि खाना-पीना तक को भी भूल जाता है।
ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता, चिकित्सा आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं।
धन की यह महिमा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों हजारों-वर्षों से चलती चली आ रही है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी लिखते हैं:
कितने महान हैं हम ब्लोगर! माया हमें व्यापती ही नहीं है!!
हर किसी को व्यापती है यह, हर कोई दीवाना है इसका और हर कोई भाग रहा है इसके पीछे। सभी को सिर्फ यही चिन्ता खाते रहती है कि चार पैसे कैसे बना लिये जायें? कोई कुछ कार्य करता है तो उस कार्य के बदले में सिर्फ धन की ही अभिलाषा रखता है। जिसे देखो वही "हाय पैसा!" "हाय पैसा!!" कर रहा है। धन कमाने के लिये आदमी अपना सुख-चैन यहाँ तक कि खाना-पीना तक को भी भूल जाता है।
ऐसा नहीं है कि संसार में रुपया ही सबसे बड़ा है, रुपये से बढ़ कर एक से एक मूल्यवान वस्तुएँ हैं जैसे कि विद्या, शिक्षा, ज्ञान, योग्यता, चिकित्सा आदि, किन्तु मुश्किल यह है कि, आज के जमाने में, वे वस्तुएँ भी केवल रुपये अदा करके प्राप्त की जा सकती हैं।
धन की यह महिमा आज से ही नहीं बल्कि सैकड़ों हजारों-वर्षों से चलती चली आ रही है। लगभग सौ साल पहले लिखी गई पुस्तक "भूतनाथ" में 'खत्री' जी लिखते हैं:
अहा, दुनिया में रुपया भी एक अजीब चीज है! इसकी आँच को सह जाना हँसी-खेल नहीं है। इसे देखकर जिसके मुँह में पानी न भर आवे समझ लो कि वह पूरा महात्मा है, पूरा तपस्वी है और सचमुच का देवता है। इस कमबख्त की बदौलत बड़े-बड़े घर सत्यानाश हो जाते हैं, भाई-भाई में बिगाड़ हो जाता है, दोस्तों की दोस्ती में बट्टा लग जाता है, जोरू और खसम का रिश्ता कच्चे धागे से भी ज्यादे कमजोर होकर टूट जाता है, और ईमानदारी की साफ और सफेद चादर में ऐसा धब्बा लग जाता है जो किसी तरह छुड़ाये नहीं छूटता। इसे देखकर जो धोखे में न पड़ा, इसे देखकर जिसका ईमान न टला, और इसे जिसने हाथ-पैर का मैल समझा, बेशक कहना पड़ेगा कि उस पर ईश्वर की कृपा है और वही मुक्ति का पात्र है।किन्तु प्रसन्नता की बात है कि हम ब्लोगर्स को यह माया नहीं व्यापती! अंग्रेजी तथा अन्य भाषा के ब्लोग्स में भी ब्लोगर्स पोस्ट लिखते हैं तो धन कमाने के लिये। वे लिखते हैं किसी उत्पाद को प्रमोट करने के लिये ताकि उत्पाद उनके ब्लोग के माध्यम से बिके और उनका कमीशन बने। पर हमें भला ब्लोग से कमाई से क्या लेना-देना है? क्यों सोचें हम उन तरीकों के बारे में जिनसे ब्लोग के माध्यम लोगों का भला होने के साथ ही साथ हम ब्लोगर्स की कमाई भी हो? हम तो खुश हैं एक से एक विवाद करके? विवाद करने में, एक-दूसरे की टाँगें खींचने में, छिद्राण्वेशन करने में जो सुख है वह धन प्राप्त करने में भला कहाँ है!
कितने महान हैं हम ब्लोगर! माया हमें व्यापती ही नहीं है!!
Tuesday, May 4, 2010
नापसन्द बटन याने कि बन्दर के हाथ में उस्तरा
कितना लिखें इस नापसन्द के बारे में? अब तो इस विषय में लिखने के लिये हमारी लेखनी भी सकुचाती है। वैसे भी नापसन्द के विषय में बहुत से लोगों के विचार पोस्ट और टिप्पणियों के माध्यम से आ ही चुके हैं। इतना होने के बावजूद भी हमें इस विषय में लिखना ही पड़ रहा है क्योंकि यह नापसन्द बटन कुछ विघ्नसन्तोषियों के लिये वरदान सिद्ध हो रहा है।
भले ही ब्लोगवाणी ने नापसन्द बटन को इसके सदुपयोग के लिये बनाया होगा किन्तु इस बटन का सदुपयोग तो आज तक कहीं नजर नहीं आया, दिखाई देता है तो सिर्फ इसके दुरुपयोग ही दुरुपयोग। डॉ. श्रीमती अजित गुप्ता, पं.डी.के.शर्मा"वत्स", प्रशान्त प्रियदर्शी जैसे और भी कई अन्य ब्लोगर्स, जो बगैर किसी के निन्दाचारी किये सामान्य पोस्टें लिखते हैं, के पोस्टों पर भी नापसन्द के चटके लग चुके हैं। और तो और ब्लोगर्स के जन्मदिन दर्शाने वाले ब्लोग पर प्रायः ही नापसन्द का चटका पाया जाता है, पता नहीं किन लोगों को ब्लोगर्स के जन्मदिन भी नापसन्द हैं?
कल तो हमारा पोस्ट "क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?" ब्लोगवाणी में प्रकाशित होते ही फटाफट दो नापसन्द के चटके लग गये उस पर जबकि हमने उस पोस्ट में ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी जिसे कोई भला आदमी नापसन्द कर पाये। ऐसा लगा हमें कि ये नापसन्दीलाल लोग इन्तिजार करते हुए बैठे थे कि कब हमारा पोस्ट प्रकाशित हो और हम उस पर नापसन्द का चटका लगायें। वैसे इन लोगों के नापसन्द करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो नापसन्द के इन चटकों से निरुत्साहित होने से रहे, उलटे हम और उत्साहित हो कर दस बीस और पोस्ट लिख दें और कहें कि करो नापसन्द जितना कर सकते हो। तुम जितना नापसन्द करोगे उससे दुगुना हम पोस्ट लिख देंगे।
हमारे विचार से तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।
भले ही ब्लोगवाणी ने नापसन्द बटन को इसके सदुपयोग के लिये बनाया होगा किन्तु इस बटन का सदुपयोग तो आज तक कहीं नजर नहीं आया, दिखाई देता है तो सिर्फ इसके दुरुपयोग ही दुरुपयोग। डॉ. श्रीमती अजित गुप्ता, पं.डी.के.शर्मा"वत्स", प्रशान्त प्रियदर्शी जैसे और भी कई अन्य ब्लोगर्स, जो बगैर किसी के निन्दाचारी किये सामान्य पोस्टें लिखते हैं, के पोस्टों पर भी नापसन्द के चटके लग चुके हैं। और तो और ब्लोगर्स के जन्मदिन दर्शाने वाले ब्लोग पर प्रायः ही नापसन्द का चटका पाया जाता है, पता नहीं किन लोगों को ब्लोगर्स के जन्मदिन भी नापसन्द हैं?
कल तो हमारा पोस्ट "क्या आपने कभी आलू, प्याज, टमाटर के विज्ञापन देखे हैं?" ब्लोगवाणी में प्रकाशित होते ही फटाफट दो नापसन्द के चटके लग गये उस पर जबकि हमने उस पोस्ट में ऐसी कोई बात नहीं लिखी थी जिसे कोई भला आदमी नापसन्द कर पाये। ऐसा लगा हमें कि ये नापसन्दीलाल लोग इन्तिजार करते हुए बैठे थे कि कब हमारा पोस्ट प्रकाशित हो और हम उस पर नापसन्द का चटका लगायें। वैसे इन लोगों के नापसन्द करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो नापसन्द के इन चटकों से निरुत्साहित होने से रहे, उलटे हम और उत्साहित हो कर दस बीस और पोस्ट लिख दें और कहें कि करो नापसन्द जितना कर सकते हो। तुम जितना नापसन्द करोगे उससे दुगुना हम पोस्ट लिख देंगे।
हमारे विचार से तो कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि खुन्नस रखने वालों के लिये नापसन्द का यह बटन "बन्दर के हाथों उस्तरा" ही साबित हो रहा है।
Monday, April 12, 2010
नया ब्लोगर आया है स्वागत करो! स्वागत करो!! ... फलाँ ब्लोगर चला गया बिदाई दो! बिदाई दो!! ...
कोई नया ब्लोगर आया और शुरू हो गया धूम-धाम के साथ उसका स्वागत्। दौड़-दौड़ कर पुराने ब्लोगर्स आने लग जाते हैं टिप्पणी कर के उसका स्वागत करने के लिये। उसने क्या लिखा है यह पढ़ें या न पढ़ें किन्तु स्वागत जरूर करेंगे। क्यों ना करें भाई स्वागत्? आखिर नये ब्लोगर के आने से ब्लोगर कुनबा में सदस्य तो बढ़ेगा ही, एक और टिप्पणीकर्ता मिलेगा ही। उसके लेखन से भाषा, समाज, देश का कुछ हित हो रहा है या नहीं इससे हमें भला क्या मतलब है? हमें तो मतलब है सिर्फ उसका स्वागत् करने से।
खैर नये ब्लोगर की स्वागत् की यह प्रथा तो बहुत पहले से ही चली आ रही है पर अब एक नई प्रथा ने जन्म लिया है जाने वाले ब्लोगर को विदाई देने का।
अच्छी प्रथा है! विदाई के रूप में मगरमच्छ के आँसू भी बहा लिये और मन ही मन खुश भी हो लिये कि चलो एक प्रतिद्वन्दी से तो जान छूटी, नाक में दम कर रखा था साले ने? हमसे आगे निकल जाना चाहता था ब्लोगरी में।
खैर नये ब्लोगर की स्वागत् की यह प्रथा तो बहुत पहले से ही चली आ रही है पर अब एक नई प्रथा ने जन्म लिया है जाने वाले ब्लोगर को विदाई देने का।
अच्छी प्रथा है! विदाई के रूप में मगरमच्छ के आँसू भी बहा लिये और मन ही मन खुश भी हो लिये कि चलो एक प्रतिद्वन्दी से तो जान छूटी, नाक में दम कर रखा था साले ने? हमसे आगे निकल जाना चाहता था ब्लोगरी में।
Thursday, March 18, 2010
टॉप ब्लोगर रहस्य
"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"
"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"
"लिख्खाड़ानन्द जी! आप तो ब्लोगिंग के आसमान की ऊँचाइयों को छू रहे हैं! ब्लोगिस्तान में डंका बजता है आपका! ऐसा कोई भी ब्लोगर नहीं है जो आपके नाम से परिचित न हो। आज हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि आखिर आप इस मुकाम तक पहुँचे कैसे?"
"हे हे हे हे, आप तो बस हमें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं।"
"नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह सच है। अब बताइये ना जो हमने पूछा है।"
"वो क्या है टिप्पण्यानन्द जी, हमारी सफलता के पीछे कई बातें हैं। पहली बात तो यह है कि आपको पोस्ट निकालना आना चाहिये। पोस्ट किसी भी चीज से निकाला जा सकता है। जैसे नदी में तरबूज-खरबूज आदि की खेती हो रही है तो उस पर पोस्ट निकाल लो। आपके घर के पास कुतिया ने पिल्ले दिये हैं तो झटपट उन पिल्लों के फोटो ले लीजिये और एक पोस्ट निकाल कर चेप दीजिये उन फोटुओं को। यात्रा के दौरान आपका सूटकेस चोरी हो गया तो उससे भी पोस्ट निकाला जा सकता है। आपको रास्ते में कोई विक्षिप्त दिख गया तो उससे एक पोस्ट निकाल लीजिये। जब लोगों को किसी भी ग्राफिक्स में अल्लाह नजर आ जाता है, सिगरेट के धुएँ में चाँद-सितारे आदि दिख जाते हैं तो किसी भी चीज से पोस्ट क्यों नहीं निकाला जा सकता? हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि पोस्ट कहीं से भी निकल सकता है।
"दूसरी बात है पोस्ट का प्रभावशाली होना। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसे दर्शन का रूप देने से! किसी एक बात से दूसरी किसी ऐसी बात को जोड़ने से जिसका कि पहली बात से दूर-दूर का कुछ भी सम्बन्ध न हो जैसे कि भैंसों के पगुराने को रेलगाड़ी की सीटी से जोड़ दो। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसमें अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द डालने से! बल्कि इन भाषाओं और हिन्दी के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर नये-नये शब्द बनाने से। जैसे कि हिन्दी के शब्द "निश्चित" में अंग्रेजी का प्रत्यय "ली" जोड़कर "निश्चितली" बना दीजिये या अंग्रेजी के शब्द "स्ट्रिक्ट" में हिन्दी का प्रत्यय "ता" जोड़कर "स्ट्रिक्टता" बना दीजिये। कहने का लब्बो-लुआब यह है कि जो कुछ भी आप लिखें उसे भले ही न समझ सके किन्तु उसमें प्रभाव अवश्य होना चाहिये।
"अगली बात है पढ़ने वालों का जुगाड़ करना! आप तो जानते ही हैं कि हमारे पाठक अन्य ब्लोगर्स ही होते हैं। तो सबसे जरूरी है उन्हें खुश रखना ताकि वे आपके पोस्ट में जरूर आयें और सिर्फ आये ही नहीं बल्कि टिप्पणी भी करें। दूसरे ब्लोगर्स खुश होते हैं टिप्पणी पाकर। याद रखिये कि टिप्पणी ही हिन्दी ब्लोगिंग का सार है! हम तो बस यही याद रखते हैं कि यारों टिप्पणी राखिये, बिन टिप्पणी सब सून!
"इन सब के अलावा यह याद रखना जरूरी है कि "विद्या विनयेन शोभते!" विद्या, योग्यता आदि की शोभा विनय से ही होती है अतः हमेशा विनम्र बने रहिये। आपकी विनयशीलता दूसरे ब्लोगर्स पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है।
"अंत में हम आपको यह भी बता दें कि सफलता पाने के लिये थोड़ी बहुत राजनीति भी करनी पड़ती है, कुछ लोगों को अपने साथ मिला कर रखना पड़ता है जो आपकी और आपस में एक दूसरे की पब्लिसिटी करें। इस विषय में विस्तार से फिर कभी आपको बतायेंगे।"
"वाह! वाह!! आज तो आपने हमें बहुत अच्छी जानकारी दी है। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका! अच्छा अब यह तो बताइये कि आप टॉप लिस्ट में सबसे ऊपर कैसे रहते हैं। हमारा मतलब है कि आपका नाम टॉप फाइव्ह में ही कैसे रहता है? और ये पहले पाँच नाम ही क्यों हमेशा ऊपर नीचे होते रहते हैं?"
"आप भी अजीब हो! अरे भाई ये भला हम कैसे बता सकते हैं? ये तो टॉप लिस्ट बनाने वाले ही बता पायेंगे!"
"अब आप हमें बहलाइये मत लिख्खाड़ानन्द जी। आप अवश्य इस रहस्य को जानते हैं पर हमें बताना नहीं चाहते। भाई हम आपके इतने पुराने मित्र हैं, कम से कम हमें तो बता दीजिये।"
"अब हम क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी? टॉप लिस्ट को तो एक स्वचालित तंत्र बनाता है जो चिट्ठों की आवृति, बैकलिंक्स आदि के आधार पर टॉप चिट्ठों की लिस्टिंग करता है।"
"पर हमने तो देखा है कि कई ऐसे ब्लोगर हैं जो दिन में दो-दो पोस्ट लिखते हैं और टॉप लिस्ट से बाहर ही रहते हैं। इधर आप और आपके साथी हैं जो कि सप्ताह में सिर्फ दो पोस्ट लिखकर टॉप फाइव्ह में ही बने रहते हैं। हमने यह भी देखा है कि 88 बैकलिंक्स वाला 1 नंबर पर होता है और 184 बैकलिंक्स वाला 4 नंबर पर होता है। 33 बैकलिंक्स वाला टॉपलिस्ट के भीतर होता है 35 बैकलिंक्स वाला लिस्ट के बाहर। कई सालों से ब्लोगिंग करने वाले ब्लोगर का लिस्ट में नाम ही नहीं होता और जिन्हें ब्लोगिंग में आये जुम्मा-जुम्मा कुछ ही समय हुआ है ऐसे ब्लोगर लिस्ट में जगह पा जाते है। आखिर ये माजरा क्या है? कुछ हम भी तो जानें।"
"छोड़िये इन बातों को टिप्पण्यानन्द जी, आप तो बस इतना समझ लीजिये कि एक सीक्रेट फॉर्मूले के द्वारा हम उन्हीं ब्लोगर को लिस्ट में लेते हैं जिन्हें हमें लेना है। दूसरे चाहे लाख कोशिश कर लें पर हमारे चाहे बगैर लिस्ट में शामिल हो ही नहीं सकते। आखिर हम लोगों ने इतनी मेहनत की है फॉर्मूला बनाने में तो कम से कम उसका फायदा तो हमें ही मिलना चाहिये ना!"
"अच्छा तो ऐसी बात है! मान गये आप लोगों को लिख्खाड़ानन्द जी! जो जानने के लिये आये थे सो जान चुके। अब चलते हैं। नमस्कार!"
"नमस्कार!"
"नमस्काऽर! आइये आइये टिप्पण्यानन्द जी!"
"लिख्खाड़ानन्द जी! आप तो ब्लोगिंग के आसमान की ऊँचाइयों को छू रहे हैं! ब्लोगिस्तान में डंका बजता है आपका! ऐसा कोई भी ब्लोगर नहीं है जो आपके नाम से परिचित न हो। आज हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि आखिर आप इस मुकाम तक पहुँचे कैसे?"
"हे हे हे हे, आप तो बस हमें चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं।"
"नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, मैंने जो कुछ भी कहा है वह सच है। अब बताइये ना जो हमने पूछा है।"
"वो क्या है टिप्पण्यानन्द जी, हमारी सफलता के पीछे कई बातें हैं। पहली बात तो यह है कि आपको पोस्ट निकालना आना चाहिये। पोस्ट किसी भी चीज से निकाला जा सकता है। जैसे नदी में तरबूज-खरबूज आदि की खेती हो रही है तो उस पर पोस्ट निकाल लो। आपके घर के पास कुतिया ने पिल्ले दिये हैं तो झटपट उन पिल्लों के फोटो ले लीजिये और एक पोस्ट निकाल कर चेप दीजिये उन फोटुओं को। यात्रा के दौरान आपका सूटकेस चोरी हो गया तो उससे भी पोस्ट निकाला जा सकता है। आपको रास्ते में कोई विक्षिप्त दिख गया तो उससे एक पोस्ट निकाल लीजिये। जब लोगों को किसी भी ग्राफिक्स में अल्लाह नजर आ जाता है, सिगरेट के धुएँ में चाँद-सितारे आदि दिख जाते हैं तो किसी भी चीज से पोस्ट क्यों नहीं निकाला जा सकता? हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि पोस्ट कहीं से भी निकल सकता है।
"दूसरी बात है पोस्ट का प्रभावशाली होना। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसे दर्शन का रूप देने से! किसी एक बात से दूसरी किसी ऐसी बात को जोड़ने से जिसका कि पहली बात से दूर-दूर का कुछ भी सम्बन्ध न हो जैसे कि भैंसों के पगुराने को रेलगाड़ी की सीटी से जोड़ दो। पोस्ट में प्रभाव उत्पन्न होता है उसमें अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द डालने से! बल्कि इन भाषाओं और हिन्दी के शब्दों को तोड़-मरोड़ कर नये-नये शब्द बनाने से। जैसे कि हिन्दी के शब्द "निश्चित" में अंग्रेजी का प्रत्यय "ली" जोड़कर "निश्चितली" बना दीजिये या अंग्रेजी के शब्द "स्ट्रिक्ट" में हिन्दी का प्रत्यय "ता" जोड़कर "स्ट्रिक्टता" बना दीजिये। कहने का लब्बो-लुआब यह है कि जो कुछ भी आप लिखें उसे भले ही न समझ सके किन्तु उसमें प्रभाव अवश्य होना चाहिये।
"अगली बात है पढ़ने वालों का जुगाड़ करना! आप तो जानते ही हैं कि हमारे पाठक अन्य ब्लोगर्स ही होते हैं। तो सबसे जरूरी है उन्हें खुश रखना ताकि वे आपके पोस्ट में जरूर आयें और सिर्फ आये ही नहीं बल्कि टिप्पणी भी करें। दूसरे ब्लोगर्स खुश होते हैं टिप्पणी पाकर। याद रखिये कि टिप्पणी ही हिन्दी ब्लोगिंग का सार है! हम तो बस यही याद रखते हैं कि यारों टिप्पणी राखिये, बिन टिप्पणी सब सून!
"इन सब के अलावा यह याद रखना जरूरी है कि "विद्या विनयेन शोभते!" विद्या, योग्यता आदि की शोभा विनय से ही होती है अतः हमेशा विनम्र बने रहिये। आपकी विनयशीलता दूसरे ब्लोगर्स पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है।
"अंत में हम आपको यह भी बता दें कि सफलता पाने के लिये थोड़ी बहुत राजनीति भी करनी पड़ती है, कुछ लोगों को अपने साथ मिला कर रखना पड़ता है जो आपकी और आपस में एक दूसरे की पब्लिसिटी करें। इस विषय में विस्तार से फिर कभी आपको बतायेंगे।"
"वाह! वाह!! आज तो आपने हमें बहुत अच्छी जानकारी दी है। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका! अच्छा अब यह तो बताइये कि आप टॉप लिस्ट में सबसे ऊपर कैसे रहते हैं। हमारा मतलब है कि आपका नाम टॉप फाइव्ह में ही कैसे रहता है? और ये पहले पाँच नाम ही क्यों हमेशा ऊपर नीचे होते रहते हैं?"
"आप भी अजीब हो! अरे भाई ये भला हम कैसे बता सकते हैं? ये तो टॉप लिस्ट बनाने वाले ही बता पायेंगे!"
"अब आप हमें बहलाइये मत लिख्खाड़ानन्द जी। आप अवश्य इस रहस्य को जानते हैं पर हमें बताना नहीं चाहते। भाई हम आपके इतने पुराने मित्र हैं, कम से कम हमें तो बता दीजिये।"
"अब हम क्या बतायें टिप्पण्यानन्द जी? टॉप लिस्ट को तो एक स्वचालित तंत्र बनाता है जो चिट्ठों की आवृति, बैकलिंक्स आदि के आधार पर टॉप चिट्ठों की लिस्टिंग करता है।"
"पर हमने तो देखा है कि कई ऐसे ब्लोगर हैं जो दिन में दो-दो पोस्ट लिखते हैं और टॉप लिस्ट से बाहर ही रहते हैं। इधर आप और आपके साथी हैं जो कि सप्ताह में सिर्फ दो पोस्ट लिखकर टॉप फाइव्ह में ही बने रहते हैं। हमने यह भी देखा है कि 88 बैकलिंक्स वाला 1 नंबर पर होता है और 184 बैकलिंक्स वाला 4 नंबर पर होता है। 33 बैकलिंक्स वाला टॉपलिस्ट के भीतर होता है 35 बैकलिंक्स वाला लिस्ट के बाहर। कई सालों से ब्लोगिंग करने वाले ब्लोगर का लिस्ट में नाम ही नहीं होता और जिन्हें ब्लोगिंग में आये जुम्मा-जुम्मा कुछ ही समय हुआ है ऐसे ब्लोगर लिस्ट में जगह पा जाते है। आखिर ये माजरा क्या है? कुछ हम भी तो जानें।"
"छोड़िये इन बातों को टिप्पण्यानन्द जी, आप तो बस इतना समझ लीजिये कि एक सीक्रेट फॉर्मूले के द्वारा हम उन्हीं ब्लोगर को लिस्ट में लेते हैं जिन्हें हमें लेना है। दूसरे चाहे लाख कोशिश कर लें पर हमारे चाहे बगैर लिस्ट में शामिल हो ही नहीं सकते। आखिर हम लोगों ने इतनी मेहनत की है फॉर्मूला बनाने में तो कम से कम उसका फायदा तो हमें ही मिलना चाहिये ना!"
"अच्छा तो ऐसी बात है! मान गये आप लोगों को लिख्खाड़ानन्द जी! जो जानने के लिये आये थे सो जान चुके। अब चलते हैं। नमस्कार!"
"नमस्कार!"
Sunday, March 7, 2010
अरे भाई हम हिन्दी ब्लोगर हैं!
जितने भी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने हमारी रचनाओं को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था उन्हें हम बता देना चाहते हैं कि हमें भी अब उनकी कोई परवाह नहीं है। अब हम उन्हें अपनी कोई भी रचना छापने के लिये नहीं भेजने वाले। बड़े आये थे कहने वाले कि हमारी रचनाएँ कूड़ा-कर्कट हैं, उनका कोई स्तर नहीं है। अब धरे रहो अपनी पत्र-पत्रिकाओं को। नहीं छपना अब हमें तुम्हारी पत्र-पत्रिकाओं में। अब हम हिन्दी ब्लोगर बन गये हैं। किसी में दम है तो रोक ले हमें अपने ब्लोग में छपने से।
क्या कहा? तुम्हारे ब्लोग को पढ़ेगा कौन? अरे तुम लोगों ने क्या सिर्फ हमारी रचनाओं को ही रद्दी की टोकरी में फेंका है? तुमने तो हमारे कई मित्रों की रचनाओं का भी तो यही हाल किया है। तो तुम्हें जान लेना चाहिये कि वे सब भी ब्लोगर बन गये हैं। अब हम सब एक-दूसरे के ब्लोग को पढ़ते हैं और टिपियाते भी हैं। हम तो अभी और भी बहुत से लोगों को ब्लोगर बनाने में जुटे हुए हैं, वो सब भी पढ़ेंगे हमारी रचनाओं को।
येल्लो! अब कहने लग गये कि हमारी पत्र-पत्रिकाओं को तो आम लोग पढ़ते हैं तुम्हारे ब्लोग को नहीं। तो जान लो कि तुम ऐसा कह कर हमें जरा भी हतोत्साहित नहीं कर सकते। भाड़ में जायें आम लोग, न तो वे पहले हमें पढ़ते थे और न अब पढ़ते हैं। दरअसल उनके पास इतनी अकल ही कहाँ है कि हम जो लिख रहे हैं उसे समझ पायें। हमारे लिखे को तो सिर्फ हमारे ब्लोगर मित्र ही समझ सकते हैं और वे ही हमें पढ़ने के काबिल हैं। आखिर हम सब हिन्दी ब्लोगर हैं भाई!
क्या कहा? तुम्हारे ब्लोग को पढ़ेगा कौन? अरे तुम लोगों ने क्या सिर्फ हमारी रचनाओं को ही रद्दी की टोकरी में फेंका है? तुमने तो हमारे कई मित्रों की रचनाओं का भी तो यही हाल किया है। तो तुम्हें जान लेना चाहिये कि वे सब भी ब्लोगर बन गये हैं। अब हम सब एक-दूसरे के ब्लोग को पढ़ते हैं और टिपियाते भी हैं। हम तो अभी और भी बहुत से लोगों को ब्लोगर बनाने में जुटे हुए हैं, वो सब भी पढ़ेंगे हमारी रचनाओं को।
येल्लो! अब कहने लग गये कि हमारी पत्र-पत्रिकाओं को तो आम लोग पढ़ते हैं तुम्हारे ब्लोग को नहीं। तो जान लो कि तुम ऐसा कह कर हमें जरा भी हतोत्साहित नहीं कर सकते। भाड़ में जायें आम लोग, न तो वे पहले हमें पढ़ते थे और न अब पढ़ते हैं। दरअसल उनके पास इतनी अकल ही कहाँ है कि हम जो लिख रहे हैं उसे समझ पायें। हमारे लिखे को तो सिर्फ हमारे ब्लोगर मित्र ही समझ सकते हैं और वे ही हमें पढ़ने के काबिल हैं। आखिर हम सब हिन्दी ब्लोगर हैं भाई!
Friday, January 8, 2010
सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ
"क्या बात है टिप्पण्यानन्द जी? किस सोच में डूबे हुए हैं?"
"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"
"टिप्पणियों की दूकान?"
"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"
"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"
"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?
"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"
"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"
"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"
"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"
"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"
"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"
"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"
"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"
"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"
"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"
"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"
"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"
"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"
"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"
(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)
"भाई लिख्खाड़ानन्द जी! क्या बतायें हाथ बहुत तंग है आज कल। कुछ कमाई-धमाई की जुगत में लगा हुआ हूँ। सोच रहा हूँ कि टिप्पणियों की एक दूकान खोल ही लूँ।"
"टिप्पणियों की दूकान?"
"हाँ भई, टिप्पणियों की दूकान! आजकल हिन्दी ब्लॉगजगत में खूब माँग है टिप्पणियों की। वहाँ पर हाल यह है कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे। होड़ मची है हमारे ब्लोगरों में अधिक से अधिक टिप्पणी पाने के लिये। करोड़ों हिन्दीभाषी इंटरनेट यूजरों के होते हुए भी हिन्दी ब्लोगों के पाठकों की संख्या मात्र कुछ सौ तक ही सीमित है इससे साफ है कि हिन्दी ब्लोगर को हिन्दी ब्लोगर लोग ही पढ़ते हैं। अब जब पाठक ही नहीं हैं तो पाठकों की संख्या को भला पोस्ट की लोकप्रियता और गुणवत्ता का पैमाना कैसे माना जाये? इसलिये टिप्पणियों की संख्या ही इस पैमाने का काम करती हैं। इसीलिये आपस में एक दूसरे के पोस्ट पर टिप्पणी करने का चलन हो गया है। यदि एक ब्लोगर ने किसी दूसरे ब्लोगर के पोस्ट पर टिप्पणी किया है तो दूसरे ब्लोगर का कर्तव्य बनता कि कि वह भी जाकर पहले ब्लोगर के पोस्ट में टिप्पणी करे। टिप्पणियाँ पाने के लिये बहुत से गुट बन गये हैं। जैसे नेता लोग भीड़ बढ़ाने के लिये रुपये देकर ट्रकों में लोगों को लाते हैं उसी प्रकार से टिप्पणियाँ पाने के लिये एक से बढ़कर एक हथकंडे अपनाये जाते हैं, लोग ईमेल और फोन कर के एक दूसरे को बताते हैं कि मेरी पोस्ट लग गई है और अब आपको टिप्पणी करना है। पर बहुत से ऐसे ब्लॉगर भी हैं जो लिखते तो बहुत अच्छे हैं पर उनके पोस्ट में टिप्पणियाँ ही नहीं आती। हम तो ऐसे ब्लोगरों को ही अपना ग्राहक बनायेंगे। जोरदार चलेगी अपनी दूकान। उचित दाम लेकर सही टिप्पणी देंगे तो भला कोई क्यों नहीं खरीदेगा हमसे टिप्पणियाँ?"
"विचार तो आपका बहुत अच्छा है! सच में खूब चलेगी आपकी दूकान। पर यह तो बताइये कि आपने ऐसे कैसे कह दिया कि लोग यही चाहते हैं कि पोस्ट को भले ही कोई मत पढ़े पर टिप्पणी अवश्य कर दे?"
"अरे आप किसी पोस्ट और उसकी टिप्पणियों को पढ़ कर तो देखिये! आप को खुद पता चल जायेगा कि हमने ऐसा क्यों कहा। पोस्ट गम्भीर है तो उसमें टिप्पणी हँसी-मजाक और नोंक-झोंक वाली मिलेंगी। ऐसी टिप्पणियाँ मिलेंगी जिनका पोस्ट के विषय से दूर-दूर का भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो ऐसी टिप्पणी पोस्ट को पढ़ने के बाद तो नहीं की जा सकती ना? और यदि पोस्ट को पढ़ने के बाद की गई होंगी तो स्पष्ट है कि टिप्पणी करने वाला या तो गम्भीर पोस्ट लिखने वाले की खिल्ली उड़ाना चाहता है या फिर उसे नीचा दिखा कर उसका कद छोटा कर देना चाहता है। भाई टिप्पणी करके किसी का सहयोग करने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि हमारे ही सहयोग से सामने वाले का कद हमसे भी ज्यादा ऊँचा हो जाये?
"अच्छा अब यह बताइये कि रेट क्या रखेंगे आप टिप्पणियों के?"
"रेट तो टिप्पणी की क्वालिटी के अनुसार रखेंगे। "nice", "वाह! वाह!!", "बेहतरीन!", "बहुत सुन्दर!", "क्या खूब!" जैसी एक दो शब्दों वाली टिप्पणियों के रेट रहेंगे मात्र दस रुपये प्रति टिप्पणी! "गहरी बात कह गये!", "बहुत अच्छा लिखा है!" जैसी एक वाक्य वाली टिप्पणियों के रेट होंगे बीस रुपये प्रति टिप्पणी!"
"इतने कम रेट टिप्पण्यानन्द जी? भाई माना कि ये टिप्पणियाँ छोटी हैं पर लोगों के ब्लोग में जाने और टिप्पणी करने में समय तो लगता ही है। इतना अधिक समय गवाँ कर इतने सस्ते में कैसे टिप्पणियाँ बेच पायेंगे आप?"
"दिक्कत की कोई बात नहीं है लिख्खाड़ानन्द जी! हमें कौन सा किसी ब्लॉग में जाना है, पोस्ट को पढ़ना है और टिप्पणी करना है? ऐसी टिप्पणियों के लिये ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर आती है ना, बस वही खरीद लेंगे। एक बार उसमें टिप्पणियों और ब्लोगों के यूआरएल को फीड भर कर देना है। फिर तो अपने आप ही टिप्पणियाँ होती रहेंगी। हाँ टिप्पणी खरीदने वाले के लिये शर्त सिर्फ यही रहेगी कि कम से कम एक हजार रुपये की टिप्पणी खरीदना होगा उसे, क्योंकि मात्र पाँच दस टिप्पणियों के लिये तो हम ऑटोमेटेड साफ्टवेयर में बार बार ब्लोगों के यूआरएल तो बदलने से रहे।"
"वाह! तब तो खूब कमाई होगी आपकी!"
"बिल्कुल होगी जी! और फिर किसी की टाँगें खींचने, गाली गलौज करने जैसी स्पेशल टिप्पणियाँ करवाने वाले भी बहुत लोग मिलेंगे। इस प्रकार की स्पेशल टिप्पणियों के रेट भी स्पेशल रखेंगे हम। हमारे नियम के अनुसार टिप्पणियों के दाम मिल जाने के बाद चौबीस घंटे के भीतर टिप्पणियाँ की जायेंगी और यदि कोई तुरन्त टिप्पणी करवाना चाहेगा तो फिर अर्जेंट चार्जेस अलग लगेंगे।"
"अच्छा यदि कोई लंबी टिप्पणी खरीदना चाहे तो?"
"तब तो उनके रेट भी तगड़े रहेंगे, कम से कम एक हजार रुपये प्रति टिप्पणी क्योंकि ऐसी टिप्पणियों के लिये तो ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर से तो काम लिया नहीं जा सकता, खुद ब्लोग में जाकर पोस्ट को पढ़ना पड़ेगा।"
"तो चलिये जल्दी खोलिये अपनी टिप्पणियों की दूकान। हम भी कुछ टिप्पणियाँ खरीद लिया करेंगे आपसे।"
"अरे आपको भला टिप्पणियाँ खरीदने की क्या क्या जरूरत है, आप तो महान और धुरन्धर लिख्खाड़ हैं! लोग तो आपके पोस्ट का इंतजार करते बैठे रहते हैं। इधर पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि टिप्पणियाँ आनी चालू हो जाती हैं।"
"हाँ भाई, टिप्पणियाँ तो खूब मिल जाती हैं हमें! पर ऐसे ही थोड़े मिल जाती हैं हमें ये टिप्पणियाँ। खूब मेहनत करनी पड़ती है हमें इनके लिये। हजारों ब्लोगों में जा जा कर टिप्पणी करते हैं हम तब कहीं जाकर सौ-पचास टिप्पणी मिल पाती है। हाँ तो हम कह रहे थे कि टिप्पणियाँ तो जरूर खरीदेंगे हम आपसे। टिप्पणियाँ जितनी अधिक मिले उतना ही ज्यादा अच्छा होता है।"
"फिर तो लिख्खाड़ानन्द जी हम भी आपके लिये डिस्काउंटेड रेट लगायेंगे। आखिर आप हमारे मित्र जो हैं।"
"तो कब खुल रही है आपकी टिप्पणियों की दूकान?"
"बहुत ही जल्दी! ऑटोमेटेड टिप्पणी करने वाली सॉफ्टवेयर के लिये ऑर्डर दे रखा है। बस सॉफ्टवेयर आई कि दूकान खुली।"
(मेरे लिये हर्ष की बात है कि यह धान के देश में ब्लोग का 401वाँ पोस्ट है!)
Thursday, January 7, 2010
न खुद किसी का सम्मान करेंगे और न ही किसी को करने देंगे
"नमस्कार लिख्खाड़ानन्द जी!"
"नमस्काऽऽर! नमस्कार, टिप्पण्यानन्द जी!!"
"सुना है कि कोई ब्लॉगर सम्मान आयोजित किया जा रहा था पर उसे स्थगित कर दिया गया।"
"अजी काहे का ब्लॉगर सम्मान? हम क्या सम्मान और रुपये के भूखे हैं? क्या हमारा साहित्यिक कद सम्मान, पुरुस्कार वगैरह का मोहताज है? हम क्या समझते नहीं हैं कि ये सम्मान करने वाले तो अपनी प्रसिद्धि के लिये टोटके अपना कर चिरकुटयाई कर रहे हैं। ना जाने कैसे कैसे अजीब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। चले हैं सम्मान करने। आज के जमाने में क्या कोई किसी एक ब्लॉगर के सम्मान को सभी ब्लॉगरों का गौरव समझ सकता है क्या? कुछ ऐरे गैरे ब्लॉगरों की लिस्ट बना दिया वोटिंग के लिये। क्या बाकी ब्लॉगर मूर्ख हैं? अजी ये तो एक चाल थी एक का सम्मान कर के सौ का अपमान करने की, एक को आगे बढ़ा कर सौ को पीछे कर देने की। चाल चलना क्या सम्मान करने वाले ही जानते हैं? हम भी जानते हैं चाल चलना! इसीलिये हमने ऐसी चाल चली कि दाँतों पसीने आ गये सम्मान करने वाले की। पोल खोल कर रख दिया सम्मान करने वाली की टिप्पणियाँ करवा करवा के! बच्चू अब फिर कभी ब्लॉगर सम्मान जैसा कोई आयोजन के पहले सत्रह सौ साठ बार सोचेगा!"
"आपने बहुत ठीक किया लिख्खाड़ानन्द जी! भला हिन्दी ब्लोगिंग भी कोई सम्मान कमाने, रुपया कमाने के लिये है क्या? हिन्दी ब्लॉगिंग तो है दिल की भड़ास निकालने के लिये, नर नारी और धर्म सम्बन्धी विवाद करने के लिये, एक दूसरे की टाँग खींचने के लिये, कोई यदि अच्छा काम करे तो उसका वाट लगाने के लिये और ज्यादा से ज्यादा टिप्पणी पाने के लिये। हिन्दी ब्लोगर को रुपये या किसी सम्मान की कोई जरूरत है क्या? उसकी जरूरत तो मात्र अधिक अधिक से अधिक टिप्पणी पाना है। जिसका सम्मान करना है उसकी पोस्ट पर जाकर अधिक से अधिक टिप्पणियाँ कर दो और देखो कि कितना सम्मानित अनुभव करता है वह अपने आप को।"
"भाई टिप्पण्यानन्द जी! हमारा तो सिद्धान्त है कि न खुद किसी का सम्मान करेंगे और न ही किसी को करने देंगे!"
"बहुत अच्छा सिद्धान्त है जी आपका! अच्छा तो अब चलता हूँ, नमस्कार!"
"नमस्काऽऽऽर!"
"नमस्काऽऽर! नमस्कार, टिप्पण्यानन्द जी!!"
"सुना है कि कोई ब्लॉगर सम्मान आयोजित किया जा रहा था पर उसे स्थगित कर दिया गया।"
"अजी काहे का ब्लॉगर सम्मान? हम क्या सम्मान और रुपये के भूखे हैं? क्या हमारा साहित्यिक कद सम्मान, पुरुस्कार वगैरह का मोहताज है? हम क्या समझते नहीं हैं कि ये सम्मान करने वाले तो अपनी प्रसिद्धि के लिये टोटके अपना कर चिरकुटयाई कर रहे हैं। ना जाने कैसे कैसे अजीब लोग आ गये हैं हिन्दी ब्लोगिंग में। चले हैं सम्मान करने। आज के जमाने में क्या कोई किसी एक ब्लॉगर के सम्मान को सभी ब्लॉगरों का गौरव समझ सकता है क्या? कुछ ऐरे गैरे ब्लॉगरों की लिस्ट बना दिया वोटिंग के लिये। क्या बाकी ब्लॉगर मूर्ख हैं? अजी ये तो एक चाल थी एक का सम्मान कर के सौ का अपमान करने की, एक को आगे बढ़ा कर सौ को पीछे कर देने की। चाल चलना क्या सम्मान करने वाले ही जानते हैं? हम भी जानते हैं चाल चलना! इसीलिये हमने ऐसी चाल चली कि दाँतों पसीने आ गये सम्मान करने वाले की। पोल खोल कर रख दिया सम्मान करने वाली की टिप्पणियाँ करवा करवा के! बच्चू अब फिर कभी ब्लॉगर सम्मान जैसा कोई आयोजन के पहले सत्रह सौ साठ बार सोचेगा!"
"आपने बहुत ठीक किया लिख्खाड़ानन्द जी! भला हिन्दी ब्लोगिंग भी कोई सम्मान कमाने, रुपया कमाने के लिये है क्या? हिन्दी ब्लॉगिंग तो है दिल की भड़ास निकालने के लिये, नर नारी और धर्म सम्बन्धी विवाद करने के लिये, एक दूसरे की टाँग खींचने के लिये, कोई यदि अच्छा काम करे तो उसका वाट लगाने के लिये और ज्यादा से ज्यादा टिप्पणी पाने के लिये। हिन्दी ब्लोगर को रुपये या किसी सम्मान की कोई जरूरत है क्या? उसकी जरूरत तो मात्र अधिक अधिक से अधिक टिप्पणी पाना है। जिसका सम्मान करना है उसकी पोस्ट पर जाकर अधिक से अधिक टिप्पणियाँ कर दो और देखो कि कितना सम्मानित अनुभव करता है वह अपने आप को।"
"भाई टिप्पण्यानन्द जी! हमारा तो सिद्धान्त है कि न खुद किसी का सम्मान करेंगे और न ही किसी को करने देंगे!"
"बहुत अच्छा सिद्धान्त है जी आपका! अच्छा तो अब चलता हूँ, नमस्कार!"
"नमस्काऽऽऽर!"
लेबल:
टिप्पणियाँ,
टिप्पणी,
ब्लॉगर,
ब्लॉगर सम्मान,
ब्लोगर,
ब्लोगर सम्मान
Monday, January 4, 2010
क्या टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड हैं?
टिप्पणियों के मोह से आज कोई भी हिन्दी ब्लोगर अछूता नहीं है। टिप्पणियों का मोह कोई अस्वाभाविक बात नहीं है किन्तु जिस प्रकार से हिन्दी ब्लोगजगत में टिप्पणियाँ पा लेने का मोह है उससे तो लगता है कि टिप्पणियाँ ही किसी पोस्ट की गुणवत्ता का मापदंड है। याने कि जिस पोस्ट में जितनी अधिक टिप्पणियाँ वह उतना ही अच्छा पोस्ट! इस लिहाज से तो विवादास्पद पोस्ट ही सबसे अच्छे हैं जहाँ पर बहुत सारी टिप्पणियाँ मिलती हैं, भले ही उन टिप्पणियों में गाली-गलौज तक शामिल हो।
टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।
मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।
ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।
जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।
टिप्पणी आखिर है क्या? एक प्रतिक्रिया मात्र तो है यह। यह मानव स्वभाव है कि जब कभी भी वह किसी के विचार को पढ़ता या सुनता है तो उसके अंदर भी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कुछ विचार अवश्य उठते हैं। जब लोग अपने भीतर उठने वाले इन विचारों को व्यक्त कर देते हैं तो वह टिप्पणी की संज्ञा प्राप्त कर लेती है। प्रतिक्रियात्मक विचार तो सभी पाठकों के भीतर उठते हैं किन्तु यह जरूरी नहीं है कि वे सभी अपने विचारों को व्यक्त ही करें। विचारों की अभिव्यक्ति के लिये लेखन क्षमता भी चाहिये।
मैं तो समझता हूँ कि किसी पोस्ट की गुणवत्ता तय करने वाले वास्तव में उसके पाठकगण हैं न कि टिप्पणियाँ। नेट में आम पाठकों में एक बड़ा वर्ग ऐसे पाठकों का भी होता है जिनमें लेखन क्षमता नहीं होती और इसी लिये वे पोस्ट पढ़ कर भी टिप्पणी नहीं करते। ऐसे पोस्टों की कमी नहीं है जिनमें टिप्पणियाँ तो नहीं के बराबर हैं किन्तु पढ़े बहुत अधिक लोगों के द्वारा गये हैं और बहुत अधिक पसंद भी किये गये हैं। डिग.कॉम में जाकर देखें तो सैकड़ों की संख्या में डिग (पसंद) प्राप्त करने वाले पोस्टों में टिप्पणी ही नहीं है या है भी तो नहीं के बराबर।
ऐसा लगता है कि हिन्दी ब्लोगजगत में पाठक के ब्लोगर भी होने के कारण उसमें लेखन क्षमता भी होती ही है और वे अच्छी प्रकार से टिप्पणी कर लेते हैं इसीलिये यह भ्रान्ति बन गई है कि टिप्पणियाँ ही पोस्ट का मापदंड है। शायद इसीलिये यहाँ पर टिप्पणी मोह भी अधिक है।
जब हिन्दी ब्लोगों को आम पाठक मिलने शुरू हो जायेंगे तो टिप्पणी मोह अपने आप कम हो जायेगा और लोग अधिक से अधिक पाठक तैयार करने में ही अपनी सफलता मानना शुरू कर देंगे।
Tuesday, December 8, 2009
कल किया था एक सवाल ... जिसका जवाब है महिला ब्लोगर ने किया था कमाल!
अब आप पूछेंगे कि कैसे किया था महिला ब्लोगर ने कमाल? अभी बताता हूँ किन्तु उसके पहले आपको यह बता दूँ कि इस प्रश्न का सम्बन्ध व्यवहार विज्ञान से है और 'विशेष परिस्थिति में मनुष्य किस प्रकार से सोचता है' यही जानने के लिये इस प्रश्न को किया जाता है।
तो परिस्थिति यह थी कि सारे ब्लोगर्स विकट स्थिति में फँसे थे। चारों ओर रेत का विशाल सागर लहरा रहा था। अब बताइये कि ब्लोगर्स के लिये पहली सबसे बड़ी और समस्या क्या थी? वह थी उस विकट स्थिति याने कि रेगिस्तान से हर हाल में जल्दी से जल्दी बाहर निकलना। आखिर खाने पीने का जो भी सामान बचा लिया गया था वह कितने समय तक चलने वाला था?
बिना किसी प्रकार की सहायता के वे बाहर निकल नहीं सकते थे और सहायता देने के लिये वहाँ पर कोई भी नहीं था। तो कैसे मिलती सहायता? चूँकि वह रेगिस्तान एयर रूट के बीच में आता था इसलिये वहाँ पर से किसी न किसी प्लेन के गुजरने की पूरी पूरी सम्भावना थी। अब मान लीजिये कि कोई प्लेन उनके ऊपर से गुजरती भी तो वे उस प्लेन के भीतर के लोगों को अपने वहाँ फँसे होने के विषय में कोई संकेते कैसे दे पाते? संकेत देने का एक ही तरीका था सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके प्लेन के लोगों का ध्यान आकर्षित करना। ध्वनि संकेत कुछ भी काम नहीं आने वाला था। वे लोग कितना भी जोर लगा कर चिल्लाते या बंदूक पिस्तोल दाग कर आवाज करते, उनकी आवाज ऊपर आकाश में उड़ते हुए प्लेन तक पहुँचने वाली नहीं थी। यदि आवाज किसी प्रकार से वहाँ तक पहुँच भी जाती तो प्लेन के इंजिन के आवाज में दब जाने वाली थी। तो संकेते देने का एकमात्र तरीका था सनलाकइट को रिफ्लेक्ट करना जो कि सिर्फ दर्पन की सहायता से ही किया जा सकता था। और दर्पन केवल महिला ब्लोगर के मेकअप बॉक्स में ही मौजूद था।
दर्पन के द्वारा सूर्य के प्रकाश को सभी दिशाओं में परावर्तित करके भी संकेत भेजने का प्रयास किया जा सकता था ताकि यदि आसपास को गाँव, बस्ती या नगर जैसी रिहायशी स्थान हो तो वहाँ के लोगों को संदेश मिल जाये कि कोई रेगिस्तान में फँसा है।
तो बन्धुओं! आधे घंटे के भीतर ही उन ब्लोगर्स के ऊपर से एक प्लेन गुजरी तो उन्होंने दर्पन से सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर के उस प्लेन तक अपना संकेत भेजा। उनका संकेत मिलते ही प्लेन के स्टाफ ने समीप के उन सभी स्थानों में सूचना भेज दी और तत्काल सहायता भेज कर सभी ब्लोगर्स को रेगिस्तान से निकाल लिया गया।
तो किया ना कमाल महिला ब्लोगर ने अपना मेकअप बॉक्स बचा कर!
कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रकाश संकेत तो टार्च से भी भेजा जा सकता था पर दिन में सूर्य के प्रकाश की वजह से टार्च का प्रकाश तो काम करने से रहा और रात में भी यह कहा नहीं जा सकता कि टार्च का प्रकाश काम कर पाता भी कि नहीं क्योंकि वह था तो टार्च ही, कोई शक्तिशाली सर्चलाइट थोड़े ही था।
कल के मेरे पोस्ट "किस ब्लोगर ने किया कमाल?" के सवाल के जवाब तो बहुत लोगों ने दिया टिप्पणी करके, जिसके लिये मैं सभी टिप्पणीकारों का आभारी हूँ, किन्तु लगता है कि सवाल को किसी ने भी गम्भीरता से नहीं लिया। हाँ अन्तर सोहिल जी ने कुछ सही दिशा में सोचते हुए टिप्पणी की थी किः
आखिर में एक बात और। वह यह कि पोस्ट तो हमने किया और दुनिया भर की तारीफ बटोर लिया ललित शर्मा जी ने क्योंकि उन्होंने बंदूक, पिस्तोल, चाकू आदि बचा लिये थे। इसी को कहते हैं "धक्का खाय पुजारी और मजा करे गिरधारी!" :-)
बधाई हो ललित जी!!!
चलते-चलते
एक दिन हम बहुत खुश थे तो खुशी खुशी में खुद ही खाना बनाने में भिड़ गये। श्रीमती जी भी खुश हो गईं कि चलो एक दिन के लिये ही सही खाना पकाने से छुट्टी तो मिली। हम किचन में थे और वे ड्राइंगरूम में बैठकर अपनी एक सहेली से गप शप करने में व्यस्त हो गईं।
कुछ ही देर में हमने किचन से ही चिल्लाकर पूछा, "अरे, नमक कहाँ रखा है?"
श्रीमती जी की ड्राइंगरूम से आवाज आई, "आपको तो कुछ मिलता ही नहीं। वो जो गरममसाला का डिब्बा है ना, जिस पर हल्दी लिखा हुआ कागज चिपका है, उसी में तो है नमक।"
तो परिस्थिति यह थी कि सारे ब्लोगर्स विकट स्थिति में फँसे थे। चारों ओर रेत का विशाल सागर लहरा रहा था। अब बताइये कि ब्लोगर्स के लिये पहली सबसे बड़ी और समस्या क्या थी? वह थी उस विकट स्थिति याने कि रेगिस्तान से हर हाल में जल्दी से जल्दी बाहर निकलना। आखिर खाने पीने का जो भी सामान बचा लिया गया था वह कितने समय तक चलने वाला था?
बिना किसी प्रकार की सहायता के वे बाहर निकल नहीं सकते थे और सहायता देने के लिये वहाँ पर कोई भी नहीं था। तो कैसे मिलती सहायता? चूँकि वह रेगिस्तान एयर रूट के बीच में आता था इसलिये वहाँ पर से किसी न किसी प्लेन के गुजरने की पूरी पूरी सम्भावना थी। अब मान लीजिये कि कोई प्लेन उनके ऊपर से गुजरती भी तो वे उस प्लेन के भीतर के लोगों को अपने वहाँ फँसे होने के विषय में कोई संकेते कैसे दे पाते? संकेत देने का एक ही तरीका था सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करके प्लेन के लोगों का ध्यान आकर्षित करना। ध्वनि संकेत कुछ भी काम नहीं आने वाला था। वे लोग कितना भी जोर लगा कर चिल्लाते या बंदूक पिस्तोल दाग कर आवाज करते, उनकी आवाज ऊपर आकाश में उड़ते हुए प्लेन तक पहुँचने वाली नहीं थी। यदि आवाज किसी प्रकार से वहाँ तक पहुँच भी जाती तो प्लेन के इंजिन के आवाज में दब जाने वाली थी। तो संकेते देने का एकमात्र तरीका था सनलाकइट को रिफ्लेक्ट करना जो कि सिर्फ दर्पन की सहायता से ही किया जा सकता था। और दर्पन केवल महिला ब्लोगर के मेकअप बॉक्स में ही मौजूद था।
दर्पन के द्वारा सूर्य के प्रकाश को सभी दिशाओं में परावर्तित करके भी संकेत भेजने का प्रयास किया जा सकता था ताकि यदि आसपास को गाँव, बस्ती या नगर जैसी रिहायशी स्थान हो तो वहाँ के लोगों को संदेश मिल जाये कि कोई रेगिस्तान में फँसा है।
तो बन्धुओं! आधे घंटे के भीतर ही उन ब्लोगर्स के ऊपर से एक प्लेन गुजरी तो उन्होंने दर्पन से सूर्य के प्रकाश को परावर्तित कर के उस प्लेन तक अपना संकेत भेजा। उनका संकेत मिलते ही प्लेन के स्टाफ ने समीप के उन सभी स्थानों में सूचना भेज दी और तत्काल सहायता भेज कर सभी ब्लोगर्स को रेगिस्तान से निकाल लिया गया।
तो किया ना कमाल महिला ब्लोगर ने अपना मेकअप बॉक्स बचा कर!
कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रकाश संकेत तो टार्च से भी भेजा जा सकता था पर दिन में सूर्य के प्रकाश की वजह से टार्च का प्रकाश तो काम करने से रहा और रात में भी यह कहा नहीं जा सकता कि टार्च का प्रकाश काम कर पाता भी कि नहीं क्योंकि वह था तो टार्च ही, कोई शक्तिशाली सर्चलाइट थोड़े ही था।
कल के मेरे पोस्ट "किस ब्लोगर ने किया कमाल?" के सवाल के जवाब तो बहुत लोगों ने दिया टिप्पणी करके, जिसके लिये मैं सभी टिप्पणीकारों का आभारी हूँ, किन्तु लगता है कि सवाल को किसी ने भी गम्भीरता से नहीं लिया। हाँ अन्तर सोहिल जी ने कुछ सही दिशा में सोचते हुए टिप्पणी की थी किः
अन्तर सोहिल said...सच है कि "खुद के मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता"। क्योंकि घटना काल्पनिक थी और कोई भी ब्लोगर खुद नहीं फँसा था इसलिये किसी ने गम्भीरतापूर्वक सवाल का जवाब भी नहीं सोचा।
कोई न कोई तो उन्हें ढूंढने जरूर आयेगा और संभव है कि हेलीकाप्टर से आये तो रात में तो टार्च से अच्छा साईन कुछ नही हो सकता और दिन के लिये जिसके पास माचिस है वो कुछ जला कर धुआं भी कर सकता है।
आखिर में एक बात और। वह यह कि पोस्ट तो हमने किया और दुनिया भर की तारीफ बटोर लिया ललित शर्मा जी ने क्योंकि उन्होंने बंदूक, पिस्तोल, चाकू आदि बचा लिये थे। इसी को कहते हैं "धक्का खाय पुजारी और मजा करे गिरधारी!" :-)
बधाई हो ललित जी!!!
चलते-चलते
एक दिन हम बहुत खुश थे तो खुशी खुशी में खुद ही खाना बनाने में भिड़ गये। श्रीमती जी भी खुश हो गईं कि चलो एक दिन के लिये ही सही खाना पकाने से छुट्टी तो मिली। हम किचन में थे और वे ड्राइंगरूम में बैठकर अपनी एक सहेली से गप शप करने में व्यस्त हो गईं।
कुछ ही देर में हमने किचन से ही चिल्लाकर पूछा, "अरे, नमक कहाँ रखा है?"
श्रीमती जी की ड्राइंगरूम से आवाज आई, "आपको तो कुछ मिलता ही नहीं। वो जो गरममसाला का डिब्बा है ना, जिस पर हल्दी लिखा हुआ कागज चिपका है, उसी में तो है नमक।"
Monday, December 7, 2009
किस ब्लोगर ने किया कमाल?
प्लेन में सारे हिन्दी ब्लोगर्स थे। अचानक प्लेन के इंजिन में खराबी आ गई और पायलट को रेगिस्तान में क्रैश लैंडिंग करना पड़ गया। प्लेन को सावधानीपूर्वक रेगिस्तान में सुरक्षित उतार लिया गया। प्लेन के क्रैश होने पहले सारे ब्लोगर्स सुरक्षित दूरी तक पहुँच गये। यद्यपि प्लेन क्रैश हो गया और दुर्भाग्य से प्लेन का भी उसके साथ स्टाफ समाप्त हो गया किन्तु सौभाग्य यह रहा कि सारे के सारे ब्लोगर्स बच गये।
सारे ब्लोगर्स सुरक्षित बच तो गये किन्तु स्थिति विकट थी, चारों ओर दूर दूर तक रेत ही रेत था। न कोई आदमी न आदम जात। यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ पर हैं और नजदीक में कोई गाँव, कस्बा या शहर है भी कि नहीं।
खैर साहब, हमारे कुछ ब्लोगर मित्रों ने अपने तत्काल बुद्धि का प्रयोग करते हुए प्लेन से भागते वक्त अपने साथ कुछ न कुछ सामान भी बचा लाये थे जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा हैः
ललित शर्मा जी ने हथियार का बक्सा बचा लिया जिसमें कि बंदूकें, पिस्तोलें और चाकू आदि थे।
हमने तो भाई शानदार व्हिस्की के एक क्रेट बचा लिया था।
एक मित्र ने पानी पाउच की एक बोरी बचा ली थीं।
एक अन्य महोदय ने रेजर और ब्लेड बचाया था।
किसी और ने मोमबत्ती और माचिस का डिब्बा बचाया था।
एक ने अपने साथ एक टार्च रख लिया था।
एक अन्य मित्र ने पैकेज्ड फूड का बक्सा बचा लिया था।
एक महिला ब्लोगर ने अपना मेकअप बॉक्स बचाया था।
एक मित्र ने फर्स्ट एड बॉक्स बचा लिया था।
किसी अन्य ने सामान्य दवाइयों का डब्बा बचाया था जिसमें पैरासीटामॉल, ब्रुफेन, निमुसलाइड जैसे बुखार एवं दर्द निवारक सामान्य दवायें थीं।
एक मित्र ने जो बक्सा बचाया था उसमें दाल, चाँवल, गेहूँ आदि खाना बनाने के सामान थे।
अब आपको बताना है कि उपरोक्त बचाये गये सामानों में से सबसे अधिक काम की चीज कौन सी है? आखिर किस ब्लोगर ने किया था कमाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण चीज बचाकर?
सोचिये! दिमाग लगाइये!! जवाब दीजिये!!!
चलते-चलते
किसी बात से नाराज होकर सभापति ने कहा, "इस सभा मे उपस्थित आधे लोग बेवकूफ हैं।"
इस से लोग और भी नाराज हो गये तो सभापति ने कहा, "कृपया नाराज मत होइये, इस सभा मे उपस्थित आधे लोग बेवकूफ नहीं हैं।"
सारे ब्लोगर्स सुरक्षित बच तो गये किन्तु स्थिति विकट थी, चारों ओर दूर दूर तक रेत ही रेत था। न कोई आदमी न आदम जात। यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ पर हैं और नजदीक में कोई गाँव, कस्बा या शहर है भी कि नहीं।
खैर साहब, हमारे कुछ ब्लोगर मित्रों ने अपने तत्काल बुद्धि का प्रयोग करते हुए प्लेन से भागते वक्त अपने साथ कुछ न कुछ सामान भी बचा लाये थे जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा हैः
ललित शर्मा जी ने हथियार का बक्सा बचा लिया जिसमें कि बंदूकें, पिस्तोलें और चाकू आदि थे।
हमने तो भाई शानदार व्हिस्की के एक क्रेट बचा लिया था।
एक मित्र ने पानी पाउच की एक बोरी बचा ली थीं।
एक अन्य महोदय ने रेजर और ब्लेड बचाया था।
किसी और ने मोमबत्ती और माचिस का डिब्बा बचाया था।
एक ने अपने साथ एक टार्च रख लिया था।
एक अन्य मित्र ने पैकेज्ड फूड का बक्सा बचा लिया था।
एक महिला ब्लोगर ने अपना मेकअप बॉक्स बचाया था।
एक मित्र ने फर्स्ट एड बॉक्स बचा लिया था।
किसी अन्य ने सामान्य दवाइयों का डब्बा बचाया था जिसमें पैरासीटामॉल, ब्रुफेन, निमुसलाइड जैसे बुखार एवं दर्द निवारक सामान्य दवायें थीं।
एक मित्र ने जो बक्सा बचाया था उसमें दाल, चाँवल, गेहूँ आदि खाना बनाने के सामान थे।
अब आपको बताना है कि उपरोक्त बचाये गये सामानों में से सबसे अधिक काम की चीज कौन सी है? आखिर किस ब्लोगर ने किया था कमाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण चीज बचाकर?
सोचिये! दिमाग लगाइये!! जवाब दीजिये!!!
चलते-चलते
किसी बात से नाराज होकर सभापति ने कहा, "इस सभा मे उपस्थित आधे लोग बेवकूफ हैं।"
इस से लोग और भी नाराज हो गये तो सभापति ने कहा, "कृपया नाराज मत होइये, इस सभा मे उपस्थित आधे लोग बेवकूफ नहीं हैं।"
Thursday, December 3, 2009
कभी सोचा भी न था कि लिखने लगूँगा
आज रोज एक पोस्ट लिख लेता हूँ तो मुझे स्वयं के ऊपर बहुत आश्चर्य होता है क्योंकि कभी सोचा भी नहीं था कि लिखने लगूँगा। चार साल पहले मैं नेट में आया था कमाई करने के चक्कर में। साल भर तक नेट को कमाई करने के तरीके जानने के लिये खंगालता रहा। इसी चक्कर में ब्लोगिंग (अंग्रेजी) के बारे में पता चला तो अपने कुछ अंग्रेजी ब्लोग बना डाले और सपने देखने लगा सपना कि एडसेंस से धन बरसने लगेगा और बन जाउँगा मैं धनकुबेर। रोज देखा करता था अपने एडसेंस खाते के बैलेंस को जो कि एक डेढ़ महीनों तक जीरो ही रहा। निराशा तो आती थी पर निराशा से अधिक क्रोध आता था अपने आप पर यह सोच कर कि लोग कमा सकते हैं पर मैं कुछ भी नहीं कमा रहा। फिर धीरे धीरे दो तीन-सेंट रोज के हिसाब से एडसेंस में रकम आने लगी। आठ माह बाद सौ डालर हो जाने पर पहला चेक मिला गूगल से। दूसरा उसके पाँच माह बाद, तीसरा फिर तीन माह बाद। इस प्रकार से कमाई शुरू हो गई।
लगभग एक साल तक तो नेट में हिन्दी और हिन्दी ब्लोग के विषय में पता ही नहीं चला। फिर नेट में हिन्दी के बारे में पता चलने के बाद डोमेननेम, होस्टिंग आदि लेकर अपना एक हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि उन दिनों हिन्दी साइट में भी एडसेंस के विज्ञापन आते थे।
तो मैं बता रहा था कि मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी लिखने लगूँगा। कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार कुछ भी तो नहीं हूँ मैं, कभी रहा भी नहीं था। हाँ, मेरे पिता, स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया, अवश्य साहित्यकार थे, साहित्य की हर विधा में लिखा था उन्होंने। मन में विचार आया कि क्यों न एक हिन्दी ब्लोग बनाकर पिताजी के उपन्यास "धान के देश में" को नेट में डाला जाये। बस बना डाला अपना ब्लोग पिता जी के उपन्यास के नाम पर ही। पिताजी के उपन्यास के पूरा हो जाने पर उनकी अन्य कविता कहानियों को डालने लगा पर धीरे-धीरे वे सब भी मेरे ब्लोग में डल गईं। अब कहाँ से कोई पोस्ट लाता मैं? मजबूर होकर कुछ कुछ लिखने लगा। विश्वास नहीं था कि कोई पसंद करेगा मेरे लिखे को। पर आप लोगों का स्नेह मुझे मिलने लगा और मैंने लिखना जारी रखा। अब तो थोड़ी सी पहचान भी बन गई है मेरी।
इस हिन्दी लेखन के चक्कर में कमाई तो बहुत कम हो गई और रोज हिन्दी लिखने की एक लत अलग से लग गई याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"।
चलते-चलते
धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर से एक व्यक्ति ने आकर कहा, "मोशन क्लियर नहीं हो रहा है डॉ. साब।"
डॉक्टर ने दवा दे दी।
दूसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आज भी मोशन क्लियर नहीं हुआ।"
डॉक्टर ने पिछले दिन से अधिक स्ट्रॉग दवा दी।
तीसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आप की दवा ने आज भी असर नहीं किया।"
डॉक्टर ने और अधिक स्ट्रॉग दवा दी।
चौथे दिन फिर वह आ पहुँचा और बताया कि अभी भी दवा ने असर नहीं किया।
डॉक्टर ने झल्ला कहा, "अरे यार, तुमको मैंने कल जो जुलाब दिया था उसको घोड़े को भी खिला दो तो उसकी टट्टी निकल जाये! आखिर तुम हो क्या बला? करते क्या हो तुम?"
"मैं हिन्दी ब्लोगर हूँ साहब।"
सुनकर डॉक्टर साहब कुछ नरम पड़े और जेब से बीस का एक नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, "ये बीस रुपये लो और जाकर खाना खा लो, कल जरूर मोशन क्लियर हो जायेगा।"
लगभग एक साल तक तो नेट में हिन्दी और हिन्दी ब्लोग के विषय में पता ही नहीं चला। फिर नेट में हिन्दी के बारे में पता चलने के बाद डोमेननेम, होस्टिंग आदि लेकर अपना एक हिन्दी वेबसाइट भी बना लिया क्योंकि उन दिनों हिन्दी साइट में भी एडसेंस के विज्ञापन आते थे।
तो मैं बता रहा था कि मैंने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी लिखने लगूँगा। कवि, लेखक, साहित्यकार, पत्रकार कुछ भी तो नहीं हूँ मैं, कभी रहा भी नहीं था। हाँ, मेरे पिता, स्व. श्री हरिप्रसाद अवधिया, अवश्य साहित्यकार थे, साहित्य की हर विधा में लिखा था उन्होंने। मन में विचार आया कि क्यों न एक हिन्दी ब्लोग बनाकर पिताजी के उपन्यास "धान के देश में" को नेट में डाला जाये। बस बना डाला अपना ब्लोग पिता जी के उपन्यास के नाम पर ही। पिताजी के उपन्यास के पूरा हो जाने पर उनकी अन्य कविता कहानियों को डालने लगा पर धीरे-धीरे वे सब भी मेरे ब्लोग में डल गईं। अब कहाँ से कोई पोस्ट लाता मैं? मजबूर होकर कुछ कुछ लिखने लगा। विश्वास नहीं था कि कोई पसंद करेगा मेरे लिखे को। पर आप लोगों का स्नेह मुझे मिलने लगा और मैंने लिखना जारी रखा। अब तो थोड़ी सी पहचान भी बन गई है मेरी।
इस हिन्दी लेखन के चक्कर में कमाई तो बहुत कम हो गई और रोज हिन्दी लिखने की एक लत अलग से लग गई याने कि "आये थे हरि भजन को और ओटन लगे कपास"।
चलते-चलते
धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर से एक व्यक्ति ने आकर कहा, "मोशन क्लियर नहीं हो रहा है डॉ. साब।"
डॉक्टर ने दवा दे दी।
दूसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आज भी मोशन क्लियर नहीं हुआ।"
डॉक्टर ने पिछले दिन से अधिक स्ट्रॉग दवा दी।
तीसरे दिन फिर वह आ गया और बोला, "आप की दवा ने आज भी असर नहीं किया।"
डॉक्टर ने और अधिक स्ट्रॉग दवा दी।
चौथे दिन फिर वह आ पहुँचा और बताया कि अभी भी दवा ने असर नहीं किया।
डॉक्टर ने झल्ला कहा, "अरे यार, तुमको मैंने कल जो जुलाब दिया था उसको घोड़े को भी खिला दो तो उसकी टट्टी निकल जाये! आखिर तुम हो क्या बला? करते क्या हो तुम?"
"मैं हिन्दी ब्लोगर हूँ साहब।"
सुनकर डॉक्टर साहब कुछ नरम पड़े और जेब से बीस का एक नोट निकाल कर उसे देते हुए कहा, "ये बीस रुपये लो और जाकर खाना खा लो, कल जरूर मोशन क्लियर हो जायेगा।"
लेबल:
ब्लोग,
ब्लोगर,
हिन्दी,
हिन्दी ब्लोग,
हिन्दी ब्लोगर
Sunday, September 27, 2009
अपने ब्लोग के अक्षरों को बड़ा कैसे करें
मैने देखा है कि बहुत से हिन्दी ब्लोग्स में अक्षर इतने छोटे होते हैं कि पढ़ने में तकलीफ होने लगती है। यह सत्य है कि इसमें हमारे ब्लोगर बन्धुओं की कहीं भी कोई गलती नहीं है क्योंकि उन्हें तो बना बनाया ब्लोग टेम्प्लेट ही मिलता है और उनमें फोंट की साइज नियत रहती है। हाँ यह जरूर है कि हमारे ब्लोगर साथियों को यह जानकारी यदि मिल जाए कि फोंट साइज कैसे बढ़ाया जाए तो वे अपने ब्लोग के अक्षरों का आकार अवश्य बड़ा कर सकते हैं। मैं इस पोस्ट को यही जानकारी देने के लिए लिख रहा हूँ।
यहाँ पर मैं ब्लोगर के ब्लोग टेम्प्लेट्स की ही बात करूँगा क्योंकि हमारे अधिकांश हिन्दी ब्लोग ब्लोगर में ही स्थित हैं।
ब्लोगर में फोंट साइज को निम्न तरीके से बढ़ाया जा सकता हैः
ब्लोगर खाते में लागिन करें।
डैशबोर्ड में जिस ब्लोग के अक्षरों को बढ़ाना है उसके लेआउट को क्लिक करें।
नये खुलने वाले विंडो में "एडिट एचटीएमएल" को क्लिक करें।
यहाँ दिखने वाले बॉक्स में है आपके ब्लोग के टेम्प्लेट का पूरा कोड! सबसे पहले इसकी एक कॉपी बना कर रख लें अर्थात् बैकअप ले लें ताकि यदि कोई गलती हो जाए तो फिर से पुराना कोड वापस डाल सकें।
अब उस कोड में वहाँ चले जाइए जहाँ
body {
लिखा हो।
इसके नीचे आपको कहीं पर font या font-size या text-font लिखा हुआ मिलेगा जिसके आगे फोंट का साइज या तो पिक्सल्स में (जैसे कि 9 या 10) या फिर यह प्रतिशत में (जैसे कि 90%) लिखा दिखेगा। यदि यह पिक्सल्स में है तो इसे 14 और यदि यह प्रतिशत में है तो इसे 100% करके सेव्ह टेम्प्लेट बटन को क्लिक कर दें।
बस हो गया आपका काम!
यहाँ पर मैं ब्लोगर के ब्लोग टेम्प्लेट्स की ही बात करूँगा क्योंकि हमारे अधिकांश हिन्दी ब्लोग ब्लोगर में ही स्थित हैं।
ब्लोगर में फोंट साइज को निम्न तरीके से बढ़ाया जा सकता हैः
ब्लोगर खाते में लागिन करें।
डैशबोर्ड में जिस ब्लोग के अक्षरों को बढ़ाना है उसके लेआउट को क्लिक करें।
अब उस कोड में वहाँ चले जाइए जहाँbody {
लिखा हो।
इसके नीचे आपको कहीं पर font या font-size या text-font लिखा हुआ मिलेगा जिसके आगे फोंट का साइज या तो पिक्सल्स में (जैसे कि 9 या 10) या फिर यह प्रतिशत में (जैसे कि 90%) लिखा दिखेगा। यदि यह पिक्सल्स में है तो इसे 14 और यदि यह प्रतिशत में है तो इसे 100% करके सेव्ह टेम्प्लेट बटन को क्लिक कर दें।
बस हो गया आपका काम!
Subscribe to:
Posts (Atom)